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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 421 में से

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पृष्ठ 213

-६. २७०१/२ ] मिश्रकव्यवहारः [ १५९
वणिजश्चत्वारस्तेऽन्योन्यधनार्धमात्रमन्यस्मात् ।
स्वीकृत्य परस्परतः समवित्ताः स्युः कियत्करस्थधनम् ॥ २६७१/२ ॥
जयापजययोर्लाभानयनसूत्रम् —
स्वस्वच्छेदांशयुती स्थाप्योर्ध्वाधर्यतः क्रमोत्क्रमशः ।
अन्योन्यच्छेदांशकगुणितौ वज्रापवर्तनक्रमशः ॥ २६८१/२ ॥
छेदांशक्रमवत्स्थिततदन्तराभ्यां क्रमेण संभक्तौ ।
स्वांशहरघ्नान्यहरौ वाञ्छाघ्नौ व्यस्ततः करस्थामितिः ॥ २६९१/२ ॥
अत्रोद्देशकः
दृष्ट्वा कुक्कुटयुद्धं प्रत्येकं तौ च कुक्कुटिकौ । उक्तौ रहस्यवाक्यैर्मन्त्रौषधशक्तिमन्महापुरुषेण ॥२७०१/२॥
पास की आधी उस ( रकम देने के ) समय थी । तब वे सब समान धनवाले बन गये । आरम्भ में
प्रत्येक के पास कितनी-कितनी रकम थी ? ॥ २६७१/२ ॥
( किसी जुए में ) जीत और हार से ( बराबर ) लाभ निकालने के लिये नियम—
( प्रश्न में दी गई दो भिन्नीय गुणज ) राशियों के अंशों और हरों के दो योगों को एक दूसरे
के नीचे नियमित क्रम में लिखा जाता है, और तब व्युत्क्रम में लिखा जाता है । ( दो योगों के कुलकों
( sets ) में से पहिले की ) इन राशियों को वज्रापवर्तन क्रिया के अनुसार हर द्वारा गुणित करते हैं,
और दूसरे कुलक की राशियों को उसी विधि से दूसरी संकलित ( summed up ) राशि की संगत
भिन्नीय राशि के अंश द्वारा गुणित करते हैं । प्रथम कुलक सम्बन्धी प्राप्त फलों को हरों के रूप में लिख
लिया जाता है, तथा दूसरे कुलक सम्बन्धी प्राप्त फलों को अंशों के रूप में लिख लिया जाता है ।
प्रत्येक कुलक के हर और अंश का अंतर भी लिख लिया जाता है । तब इन अंतरों द्वारा ( प्रश्न में दिये
गये प्रत्येक गुणज भिन्नों के ) अंश और हर के योग को दूसरे के हर से गुणित करने से प्राप्त फलों को
क्रमशः भाजित किया जाता है । ये परिणामी राशियाँ, इष्ट लाभ के मान से गुणित होने पर, ( दाँव पर
लगाने वाले जुआड़ियों के ) हाथ की रकमों को व्युत्क्रम में उत्पन्न करती हैं ॥२६८१/२–२६९१/२॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
मन्त्र और औषधि की शक्ति वाले किसी महापुरुष ने मुर्गों की लड़ाई होती हुई देखी, और
मुर्गों के स्वामियों से अलग-अलग रहस्यमयी भाषा में मन्त्रणा की । उसने एक से कहा, "यदि तुम्हारा
पक्षी जीतता है, तो तुम मुझे दाँव में लगाया हुआ धन दे देना । यदि तुम हार जाओगे, तो मैं तुम्हें
दाँव में लगाये हुए धन का ३/२ दे दूंगा ।” वह फिर दूसरे मुर्गे के स्वामी के पास गया, जहाँ उसने

( २६८१/२–२६९१/२ ) बीजीय रूप से,
( स + द ) ब ( अ + ब ) द
क = ───────────────────────── × प, और ख = ───────────────────────── × प, जहाँ
( स + द ) ब - ( अ + व ) स ( अ + ब ) द - ( स + द ) अ
क और ख जुआड़ियों के हाथ की रकमें हैं, और अ/ब, स/द, उनमें से लिये गये भिन्नीय भाग हैं, और प
लाभ है । इसे समीकार से भी प्राप्त किया जा सकता है, यथा—
क - (स/द) ख = प = ख - (अ/ब) क, जहाँ क और ख अज्ञात राशियाँ हैं ।