गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
पृष्ठ 210, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ें१५६ ] गणितसारसंग्रहः [ ६. २५३½-
अत्रोद्देशकः
वैश्यैस्त्रिभिः परस्परहस्तगतं याचितं धनं प्रथमः ।
चत्वार्यथ द्वितीयं पञ्च तृतीयं नरं प्रार्थ्य ॥ २५३½ ॥
द्विगुणोऽभवद् द्वितीयः प्रथमं चत्वारि षट् तृतीयमगात् ।
त्रिगुणं तृतीयपुरुषः प्रथमं पञ्च द्वितीयं च ॥ २५४½ ॥
षट् प्रार्थ्याभूतपञ्चकगुणः स्वहस्तस्थितानि कानि स्युः ।
कथयाशु चित्रकुट्टीमिश्रं जानासि यदि गणक ॥ २५५½ ॥
पुरुषास्त्रयोऽतिकुशलाश्चान्योन्यं याचितं धनं प्रथमः ।
स द्वादश द्वितीयं त्रयोदश प्रार्थ्य तत्त्रिगुणः ॥ २५६½ ॥
प्रथमं दश त्रयोदश तृतीयमभ्यर्थ्य च द्वितीयोऽभूत ।
पञ्चगुणितो द्वितीयं द्वादश दश याचयित्वायम् ॥ २५७½ ॥
सप्तगुणितस्तृतीयोऽभवन्नरो वाञ्छितानि लब्धानि ।
कथय सखे विगणय्य च तेषां हस्तस्थितानि कानि स्युः ॥ २५८½ ॥
अन्त्यस्योपान्त्यतुल्यधनं दत्त्वा समधनानयनसूत्रम्—
वाञ्छाभक्तं रूपं स उपान्त्यगुणः सरूपसंयुक्तः ।
शेषाणां गुणकारः सैकोऽन्यः करणमेतत्स्यात् ॥ २५९½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
तीन व्यापारियों ने एक दूसरे से उनके पास की रकमों में से रकमें माँगी । पहिला व्यापारी
दूसरे से ४ और तीसरे से ५ माँगकर शेष के कुल धन से दुगुना धन वाला बन गया । दूसरा पहिले से
४ और तीसरे से ६ मांग कर शेष के कुल धन से तिगुना धनवाला बन गया । तीसरा पहिले से ५ और
दूसरे से ६ मांग कर उन दोनों से पाँचगुना धनवाला बन गया । हे गणितज्ञ, यदि तुम विचित्र कुट्टीकार
विधि से परिचित हो, तो मुझे शीघ्र ही उनके हाथों की रकमें बतलाओ ॥२५३½-२५५½॥ तीन अति-
कुशल पुरुष थे । उन्होंने एक दूसरे से रकमें मांगीं । पहिला पुरुष दूसरे से १२ और तीसरे से १३
लेकर उन दोनों से ३ गुना धनवाला बन गया । दूसरा पहिले से १० और तीसरे से १३ लेकर शेष
दोनों से ५ गुना धनवाला बन गया तीसरा दूसरे से १२ और पहिले से १० लेकर शेष दोनों से ७
गुना धनवाला बन गया । उनकी वांछाएं पूर्ण हो गईं । हे मित्र ! गणना कर उनके हाथों की रकमों
को बतलाओ ॥२५६½-२५८½॥
समान धन राशियों को निकालने के लिये नियम,जब कि अन्तिम मनुष्य अपने खुद के धन में से
उपअन्तिम को उसी के धन के बराबर दे देता है । और फिर, यह उपांतिम मनुष्य बाद में आनेवाले
मनुष्य के सम्बन्ध में यही करता है, इत्यादि—
एक के द्वारा दूसरे को दिये जानेवाले धन के सम्बन्ध में मन से चुनी हुई गुणज ( multi-
ple ) राशि द्वारा १ को विभाजित करो । यह उपअंतिम मनुष्य के धन के सम्बन्ध में गुणज हो जाता
है । यह गुणज एक द्वारा बढ़ाया जाकर दूसरे के हस्तगत धनों का गुणज बन जाता है । इस अन्तिम
व्यक्ति के इस प्रकार प्राप्त धन में १ जोड़ा जाता है । यही रीति उपयोग में लाई जाती है ॥२५९½॥
( २५९½ ) गाथा २६३½ के प्रश्न को निम्नलिखित रीति से हल करने पर यह नियम स्पष्ट हो