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गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

( ४ ) प्रस्तावना ।
और वरेण्यराजाका संवाद है जिसमें गणेशजीने राजाको
ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया है और उसके प्रभावसे राजा मुक्ति
पदवीको प्राप्त हुआहै उसी गणेशगीताकी भाषाटीका श्रीयुत
परमगुणग्राही वैश्यवंशादिवाकर सेठजी श्रीखेमराज-श्रीकृष्ण-
दासजीकी आज्ञासे सरल भाषामें जो सबकी समझमें आसके
किया है और अक्षरार्थ स्पष्टरीतिसे लिख दिया है जिससे जिन्हें
पढनेका थोडाभी ज्ञान है वह भली प्रकार समझ सकें और
तदनुकूल आचरणकर शान्ति लाभ करें. यद्यपि यह ग्रंथ
छोटाहै परन्तु सांख्ययोगवेदान्तका सार इसमें मथकर श्रीगणे-
शजीने वर्णन कियाहै इसके अनुसार कर्त्तव्य करनेसे परम
शान्तिलाभ होती है। इसके देखनेसे यह स्पष्ट विदित होता है
कि ब्रह्ममय होनेसे क्या दशा होजाती है और वह किस
प्रकारके वचन कहता है यह सब कुछ भगवान् गणेशजीके
वचनोंने स्पष्ट कर दिया है जो गणेशजीके भक्तोंका सर्वस्व है.
महात्माओंसे निवेदन है कि इसका अवलोकनकर मेरे परि-
श्रमको सफल कीजिये और दृष्टिदोषसे कहीं त्रुटि रहगई हो
उसे क्षमा कीजिये कारण कि सर्वज्ञ तो परमेश्वर है ॥
पं० ज्वालाप्रसाद मिश्र
मुहल्ला दिनदारपुरा,
मुरादाबाद.

॥ श्रीः ॥
श्रीगणेशाय नमः ।
गणेशगीता
भाषाटीका सहित
दोहा-विघ्नहरण मंगलकरण, शरण सुखददातार ॥
श्रीगणेश पदकमलयुग, वन्दौं वारंवार ॥ १ ॥
श्लोक-ब्रह्माणमथ विष्णुं च शिवं गणपतिं तथा ॥
अम्बिकां शारदां चापि वन्दे विघ्नोपशांतये ॥१॥
शुक उवाच ।
एवमेव पुरा पृष्टः शौनकेन महात्मना ॥
स सूतः कथयामास गीतां व्यासमुखाच्छ्रुताम् १

( ६ ) गणेशगीता-अ० १.
इसीप्रकारसे पूर्वकालमें महात्मा शौनकके पूछनेपर सूत-
जीने व्यासजीके मुखसे श्रवण कीहुई गीताको वर्णन कियाथा १
सूत उवाच ।
अष्टादशपुराणोक्तममृतं प्राशितं त्वया ॥
ततोऽतिरसवत्पातुमिच्छाम्यमृतमुत्तमम् ॥२॥
सूतजी बोले हे भगवन् ! वेदव्यासजी आपने अष्टादश पुरा-
णका साररूप अमृत मुझे पान कराया, परन्तु अब उससेभी
अधिक रसीले उत्तम अमृतपान करनेकी मुझे इच्छा है ॥२॥
येनामृतमयो भूत्वा पुमान्ब्रह्मामृतं यतः ॥
योगामृतं महाभाग तन्मे करुणया वद ॥३॥
जिस अमृतको पानकर योगी ब्रह्मरूपको प्राप्त होजाते हैं
हे महाभाग ! वह कृपाकर आप मुझसे वर्णन कीजिये ॥ ३ ॥
व्यास उवाच ।
अथ गीतां प्रवक्ष्यामि योगमार्गप्रकाशिनीम्॥
नियुक्ता पृच्छते सूत राज्ञे गजमुखेन या ॥४॥
व्यासजी बोले हे सूतजी ! योग मार्गकी प्रकाश करने-
वाली गीताका तुमसे वर्णन करताहूं कि जिसको वरेण्य

भाषाटीकासमेत । (७)
राजाके पूछनेपर सम्पूर्ण विघ्नोंके नाशक गणेशजीने
कहाथा ॥ ४ ॥
वरेण्य उवाच ।
विघ्नेश्वर महाबाहो सर्वविद्याविशारद ॥
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञ योगं मे वक्तुमर्हसि ॥५॥
वरेण्य राजा बोला कि हे विघ्न दूर करने हारे ! हे महा-
भुज ! हे सर्व विद्याओंके पंडित ! हे संपूर्ण शास्त्रके तत्त्वको
जानने वाले, आप मुझसे योगमार्गका वर्णन कीजिये ॥ ५ ॥
श्रीगजानन उवाच ॥
सम्यग्व्यवसिता राजन्मतिस्तेऽनुग्रहान्मम ॥
शृणु गीतां प्रवक्ष्यामि योगामृतमयीं नृप ॥६॥
श्रीभगवान् बोले. राजन्! मेरी कृपासे तुम्हारी बुद्धि निर्मल
और शास्त्रको ग्रहण करनेवाली है, सुनो मैं योगाऽमृत गीता
तुमसे कहताहूं ॥ ६ ॥
न योगं योगमित्याहुर्योगो योगो न च श्रियः॥
न योगो विषयैर्योगो न च मात्रादिभिस्तथा॥७॥
‘योग” इस शब्दकाही नाम योग नहीं, लक्ष्मीकी
प्राप्ति होनेका नाम योग नहीं, विषय सुखकी प्राप्ति होनेका

( ८ ) गणेशगीता-अ० १.
नाम योग नहीं, इंद्रिय सम्पन्न होनेका नाम योग
नहीं है ॥ ७ ॥
योगो यः पितृमात्रादेर्न स योगो नराधिप ॥
यो योगो बन्धुपुत्रादेर्यश्चाष्टभूतिभिः सह ॥८॥
हे राजन् ! माता पिताके समागमका नाम योग नही,
आठ प्रकारकी सिद्धि और बंधुपुत्रादिकी प्राप्तिका नामभी
योग नहीं है ॥ ८ ॥
न स योगः स्त्रिया योगो जगदद्भुतरूपया ॥
राज्ययोगश्च नो योगो न योगो गजवाजिभिः९॥
अत्यन्त रूपवती स्त्रीकी प्राप्तिका नाम योग नहीं है,
राज्यकी प्राप्ति तथा हाथी घोडेकी प्राप्तिका नाम योग
नहीं है ॥ ९ ॥
योगो नेन्द्रपदस्यापि योगो योगार्थिनः प्रियः॥
योगो यःसत्यलोकस्य न स योगो मतो मम १० .
इन्द्रपदकी प्राप्तिका नाम योग नहीं है, योगद्वारा प्रिय
सिद्धिकी इच्छा करनेका नाम योग नहीं है, सत्यलोककी
प्राप्तिकोभी मैं योग नहीं मानता ॥ १० ॥

भाषाटीकासमेत। ( ९ )
शैवस्य योगो नो योगो वैष्णवस्य पदस्य यः ॥
न योगो भूप सूर्य्यत्वं चन्द्रत्वंन कुबेरता ॥११॥
शिवपदकी प्राप्तिहोनी, वैष्णवपदकी प्राप्तिहोनी उसका भी
नाम योग नहीं, हे राजन् ! सूर्य चंद्र और कुबेरके पदकी
प्राप्ति होनेकाभी नाम योग नहीं ॥ ११ ॥
नानिलत्वं नानलत्वं नामरत्वं न कालता ॥
न वारुण्यं न नैर्ऋत्यं योगो न सार्वभौमता ॥१२॥
वायुस्वरूप, अग्निस্বরূপ, देवस्वरूप, कालस्वरूप, वरुणस्व-
रूप, निर्ऋतिस्वरूप, सम्पूर्ण पृथ्‍वीके राजपानेका नाम भी
योग नहीं है ॥ १२ ॥
योगं नानाविधं भूप युञ्जन्ति ज्ञानिनस्ततम् ॥
भवंति वितृषा लोके जिताहारा विरेतसः ॥१३॥
हे राजन् ! योग अनेक प्रकारका है, परन्तु योग वही है,
जिसको प्राप्त होकर ज्ञानी लोग संसारसे विरक्त होते हैं
तथा आहार जीतकर इच्छा रहित होते हैं ॥ १३ ॥
पावयन्त्यखिलांल्लोकान्वशीकृतजगत्त्रयाः ॥
करुणापूर्णहृदया बोधयन्त्यपि कांश्चन ॥१४॥

(१०) गणेशगीता-अ १.
ज्ञानीलोग तीनों जगत्को अपने वशमें करके सम्पूर्ण
जगत्को पवित्र करते हैं, उनका हृदय दयासे पूर्ण होता है,
वह किसीको बोधभी करते हैं ॥ १४ ॥
जीवन्मुक्ता ह्रदे मग्नाः परमानन्दरूपिणी ॥
निमील्याक्षीणि पश्यंतः परं ब्रह्म हृदिस्थितम् १५
वह जीवन्मुक्त होकर परमानन्दरूपी पदमें मग्न होते हैं,
और नेत्रमूंदकर हृदयमें स्थित परब्रह्मका दर्शन करते हैं॥१५॥
ध्यायन्तः परमं ब्रह्म चित्ते योगवशीकृतम् ॥
भूतानि स्वात्मना तुल्यं सर्वाणि गणयन्ति ते १६
योगसे वशीभूत किये चित्तमें परब्रह्मका ध्यान करते हैं,
सम्पूर्ण प्राणियोंको ज्ञानी अपनी तुल्य जानते हैं ॥ १६ ॥
येन केनचिदाच्छिन्ना येनकेनचिदाहताः ॥
येन केन चिदाकृष्टा येन केनचिदाश्रिताः ॥ १७॥
कहीं किसी कारणसे आच्छन्न कहीं किसीसे ताडित, कहीं
किसीसे आकर्षित, कहीं किसीसे आश्रित ॥ १७ ॥
करुणापूर्णहृदया भ्रमन्ति धरणीतले ॥
अनुग्रहाय लोकानां जितक्रोधा जितेंद्रियाः।१८॥

भाषाटीकासमेत । ( ११ )
दयापूर्ण हृदय होकर पृथ्वीमें भ्रमण करते हैं, क्रोधको
जीते जितेन्द्रिय हुए, लोकोंपर अनुग्रह करनेको विचरते हैं १८
देहमात्रभृतो भूप समलोष्टाश्मकाञ्चनाः ॥
एतादृशा महाभाग्याःस्युश्चक्षुर्गोचराःप्रिय॥१९॥
हे राजन् ! वे केवल देहमात्रकोही धारण करनेहारे, मिट्टी,
पत्थर सुवर्णमें समान दृष्टि करनेवाले, इस प्रकारके महाभाग
पुरुष जिस योगके द्वारा दृष्टिगोचर होजाते हैं ॥ १९ ॥
तमिदानीमहं वक्ष्ये शृणु योगमनुत्तमम् ॥
श्रुत्वा यं मुच्यते जन्तुःपापेभ्यो भवसागरात् २०
उस श्रेष्ठ योगको मैं तुमसे इस समय कहता हूं जिसके
श्रवण करनेसे यह प्राणी पापोंसे और भवसागरसे पार हो
जाता है ॥ २० ॥
शिवे विष्णौ च शक्तौ च सूर्ये मयि नराधिप॥
याऽभेदबुद्धिर्योगःस सम्यग्योगो मतो मम २१॥
हे राजन् ! शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और मुझमें जो ,अभेद
बुद्धि करनी है उसीका नाम मैं यथार्थ योग मानताहूं ॥२१॥
अहमेव जगद्यस्मात्सृजामि पालयामि च ॥
कृत्वा नानाविधं वेषं संहरामि स्वलीलया २२॥

१. अध्याय १-३: राजा वरेण्य-गजानन संवाद, सांख्य-योग व कर्म-योग

( १२ ) गणेशगीता-अ० १.
मैंही इस जगत्की उत्पत्ति पालन और संहार अपनी
लीलासेही अनेक वेषधारणपूर्वक करताहूं ॥ २२ ॥
अहमेव महाविष्णुरहमेव सदाशिवः ॥
अहमेव महाशक्तिरहमेवार्यमा प्रिय ॥ २३ ॥
मैंही महाविष्णु, मैंही सदाशिव, मैंही महाशक्ति और
मैंही सूर्य और यम हूं ॥ २३ ॥
अहमेको नृणां नाथो जातः पञ्चविधः पुरा ॥
अज्ञानान्मां न जानन्ति जगत्कारणकारणम् २४
मैंही एक मनुष्योंका स्वामी, इन पांच प्रकारसे पूर्वकालमें
उत्पन्न हुआहूं, मैं जगत्की कारण मायाका भी कारणहूं
मुझको अज्ञानी लोग नहीं जानते ॥ २४ ॥
मत्तोऽग्निरापो धरणी मत्त आकाशमारुतौ ॥
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च लोकपाला दिशो दश२५॥
मुझहीसे अग्नि जल आकाश धरणी पवन ब्रह्मा विष्णु रुद्र
लोकपाल दशों दिशा उत्पन्न हुई हैं ॥ २५ ॥
वसवो मुनयो गावो मनवः पशवोऽपि च ॥
सरितः सागरा यक्षा वृक्षाः पक्षिगणा अपि२६॥

भाषाटीकासमेत । ( १३ )
इसी प्रकार आठ वसु, मुनि, गौ, मनु, पशु, नदी, समुद्र,
यज्ञ, वृक्ष, पक्षियोंके समूह ॥ २६ ॥
तथैकविंशतिः स्वर्गा नागाः सप्त वनानि च ॥
मनुष्याःपर्वताःसाध्याःसिद्धा रक्षोगणास्तथा २७
इक्कीस स्वर्ग, सात नाग, वन मनुष्य पर्वत साध्य सिद्ध
राक्षस इत्यादिक सब मुझसे हुए हैं ॥ २७ ॥
अहं साक्षी जगच्चक्षुरलिप्तः सर्वकर्मभिः ॥
अविकारोऽप्रमेयोऽहमव्यक्तो विश्वगोऽव्ययः २८
मैंही सबका साक्षी हूं तथा सब जगत्का नेत्र, सब
कर्मोंसे अलिप्तहूं निर्विकार, अप्रमेय अर्थात् प्रमाणों द्वाराभी
जाननेमें नहीं आता, अव्यक्त, सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त और
अविनाशी हूं ॥ २८ ॥
अहमेव परं ब्रह्माव्ययानन्दात्मकं नृप ॥
मोहयत्यखिलान्माया श्रेष्ठान्मम नरानमूनू॥२९
हे राजन् ! मैंही परब्रह्म अव्यय आनन्दस्वरूप हूं मेरी माया
सम्पूर्ण जगत्‌को तथा श्रेष्ठ पुरुषोंकोभी मोहित करती है ॥२९॥
सर्वदा षड्विकारेषु तानियं योजयेद्भृशम् ॥
हित्वाजापटलं जन्तुरनेकैर्जन्मभिः शनैः ॥३०॥

( १४ ) गणेशगीता-अ० १.
जो माया सदा कामक्रोधादि छः विकारोंमें इन प्राणियोंको
लगादेती है, योगसे जब शनैः शनैः अनेक जन्मके मायाके
कपाट दूर हो जाते हैं ॥ ३० ॥
विरज्य विन्दति ब्रह्म विषयेषु सुबोधतः ॥
अच्छेद्यं शस्त्रसंघातैरदाह्यमनलेन च ॥ ३१ ॥
तब यह प्राणी विषयोंसे जागकर और उनसे विरक्तहो पर-
ब्रह्मको जानते हैं, जो ब्रह्म शस्त्र समूहोंसे छेदन नहीं होसक्ता
अग्निसे दग्ध नहीं होसक्ता ॥ ३१ ॥
अक्लेद्यं भूप भुवनैरशोष्यं मारुतेन च ॥
अवध्यं वध्यमानेऽपि शरीरेऽस्मिन्नराधिप ।३२।
जलसे गल नहीं सक्ता पवनसे सूख नहीं सकता, हे
राजन् ! जो इस शरीरके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता वही
ब्रह्म है ॥ ३२ ॥
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रशंसन्ति श्रुतीरिताम्॥
त्रयीवादरता मूढास्ततोऽन्यन्मन्वतेऽपि न ३३॥
वेदत्रयीमें प्रीति करनेहारे केवल कर्म करनेहारे मूढलोग
श्रुतिकी कही हुई फल प्रतिपादक वाणीकीही प्रशंसा करते हैं
दूसरी बातको नहीं मानने हैं ॥ ३३ ॥

भाषाटीकासमेत । ( १५ )
कुर्व्वन्ति सततं कर्म जन्ममृत्युफलप्रदम् ॥
स्वर्गैश्वर्यरता ध्वस्तचेतना भोगवृद्धयः ॥३४॥
इसी कारण वे जन्म और मृत्युके फल देनेहारे कर्मोंको
सदा करते रहते हैं वे स्वर्गके ऐश्वर्योंमेंही लगे रहते हैं, उन
भोगबुद्धिवालोंकी चेतना नष्ट होजाती है ॥ ३४ ॥
सम्पादयन्ति ते भूप स्वात्मना निजबन्धनम् ॥
संसारचक्रं युञ्जन्ति जडाः कर्मपरा नराः॥३५॥
हे राजन् ! वे आपही अपने निमित्त बंधन बनाते हैं, मूढ
और कर्मपरायण मनुष्य संसारचक्रमें पडते हैं ॥ ३५ ॥
यस्य यद्विहितं कर्म तत्कर्तव्यं मदर्पणम् ॥
ततोऽस्य कर्मबीजानामुच्छिन्नाः स्युर्महांकुराः ३६
जिसको जो कर्म विधान किया है, वह मेरे अर्पण करना
चाहिये, तब इन प्राणियोंके कर्मरूप बीजोंके महा अंकुर
नष्ट हों ॥ ३६ ॥
चित्तशुद्धिश्च महती विज्ञानसाधिका भवेत् ॥
विज्ञानेन हि विज्ञातं परं ब्रह्म मुनीश्वरैः ॥३७॥
चित्तकी शुद्धि होनेसेही विज्ञानकी प्राप्ति होती है, विज्ञानके
द्वाराही ऋषियोंने परब्रह्मको जाना है ॥ ३७ ॥

( १६ ) गणेशगीता-अ १.
तस्मात्कर्माणि कुर्वीत बुद्धियुक्तो नराधिप ॥
न त्वकर्मा भवेत्कोऽपि स्वधर्मत्यागवांस्तथा ३८
हे राजन् ! इसकारण जो कर्मकरे वह बुद्धियुक्त है अर्थात्
मेरे अर्पण करे, कारण कि जिस कर्मका त्याग होनेसे स्वध-
र्मका त्याग होता है वह त्याग उचित नहीं है ॥ ३८ ॥
जहाति यदि कर्माणि ततः सिद्धिं न विंदति ॥
आदौ ज्ञानेनाधिकारः कर्मण्येव स युज्यते३९॥
जो कर्मका त्याग करेगा तौ चित्तशुद्धि नहीं होगी, चित्त-
शुद्धि न होनेसे ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होगी, और सिद्धिकीभी
प्राप्ति नहीं होगी, विना चित्तशुद्धिके ज्ञानमें अधिकार नहीं है,
इसकारण प्रथम आसक्तिरहित होकर कर्म करना उचित है ३९॥
कर्मणा शुद्धहृदयोऽभेदबुद्धिमुपैष्यति ॥
स च योगः समाख्यातोऽमृतत्वाय हि कल्पते४०
कर्मसे शुद्ध हृदय होकर अभेद बुद्धिको प्राप्त होता है,
उसीका नाम योग है, जिससे प्राणी अमर होजाता है ॥ ४० ॥
योगमन्यं प्रवक्ष्यामि शृणु भूप तदुत्तमम् ॥
पशौ पुत्रे तथा मित्रे शत्रौ बन्धौ सुहृज्जने॥४१॥

भाषाटीकासमेत । ( १७ )
हे राजन् ! मैं और भी उत्तम योग कहताहूं,तुम उसे सुनो,
पशु, मित्र, पुत्र, शत्रु, बंधु तथा सज्जन पुरुष ॥ ४१ ॥
बहिर्दृष्ट्या च समया हृत्स्थयालोकयेत्पुमान् ॥
सुखे दुःखे तथाऽमर्षे हर्षे भीतौ समो भवेत्॥४२॥
इन सबमें समान दृष्टि करनी चाहिये, बाहर भीतर एकसी
दृष्टि रखनी, सुख, दुःख, क्रोध, हर्ष, भय इनमें समान रहना
चाहिये ॥ ४२ ॥
रोगाप्तौ चैव भोगाप्तौ वा जये विजयेऽपि च ॥
श्रियोऽयोगे च योगे च लाभालाभेमृतावपि॥४३॥
रोगकी प्राप्ति हो, चाहे भोगकी प्राप्तिहो, जयहो, विजयहो
लक्ष्मीकी प्राप्ति, अप्राप्ति, हानि, लाभ, जन्म, मरण, इन सबमें
मनको समान रखना उचित है ॥ ४३ ॥
समो मां वस्तुजातेषु पश्यन्नन्तर्बहिः स्थितम् ॥
सूर्ये सोमे जले वह्नौ शिवे शक्तौ तथानिलेज४४
सम्पूर्ण वस्तुओंमें समान भावसे बाहर भीतर मुझे स्थित
जानना, सूर्य, चन्द्रमा, जल, अग्नि, शिव, शक्ति, वायु॥४४॥
द्विजे हृदे महानद्यां तीर्थे क्षेत्रेऽघनाशिनि ॥
विष्णौ च सर्वदेवेषु तथा यक्षोरगेषु च ॥४५॥

( १८ ) गणेशगीता-अ० १.
ब्राह्मण, छोटे सरोवर,महानदी,तीर्थ पापहारी क्षेत्र, विष्णु,
सम्पूर्ण देवता, यक्ष, उरग ॥ ४५ ॥
गन्धर्वेषु मनुष्येषु तथा तिर्यग्भवेषु च ॥
सततं मां हि यः पश्येत्सोऽयं योगविदुच्यते ४६
गन्धर्व, मनुष्य, तिरछे चलनेहारे जीव, इन सबमें जो मुझे
सदा समान दृष्टिसे देखता है वही योगका जाननेहारा
कहाता है ॥ ४६ ॥
संप्राहृत्य स्वार्थेभ्य इन्द्रियाणि विवेकतः ॥
सर्वत्र समताबुद्धिः स योगो भूप मे मतः ॥४७॥
हे राजन् ! जो ज्ञानद्वारा इन्द्रियोंको स्वार्थसे हटाकर
सर्वत्र समान बुद्धि रखता है, वही योग मानागया है ॥ ४७॥
आत्मानात्मविवेकेन या बुद्धिर्दैवयोगतः ॥
स्वधर्मासक्तचित्तस्य तद्योगो योग उच्यते॥४८॥
अपने धर्ममें आसक्त चित्त प्राणीकी दैवयोगसे जो
आत्मा और अनात्माके विचारकी बुद्धि उत्पन्न होती है,
उस बुद्धिके योगकाही नाम योग है ॥ ४८ ॥
धर्माधर्मौ जहातीह तया त्यक्त उभावपि ॥
अतो योगाय युञ्जीत योगो वैधेषु कौशलम्४९

भाषाटीकासमेत । ( १९ )
और उसी बुद्धिके न होनेसे यह प्राणी धर्म अधर्मका
त्याग करता है, इसकारण योगमें बुद्धि लगानी उचित है,
निष्काम कर्ममें कुशलता ही योग है ॥ ४९ ॥
धर्माधर्मफले त्यक्त्वा मनीषी विजितेन्द्रियः ॥
जन्मबन्धविनिर्मुक्तः स्थानं संयात्यनामयम् ५०
जितेन्द्रिय बुद्धिमान् धर्म और अधर्मके फलको त्यागन
करके जन्म बन्धनसे मुक्त होकर अनामय ( ब्रह्मलोक ) को
प्राप्त होता है ॥ ५० ॥
यदा ह्यज्ञानकालुष्यं जन्तोर्बुद्धिः क्रमिष्यति ॥
तदासौ याति वैराग्यं वेदवाक्यादिषु क्रमात् ५१
जब इस प्राणीकी बुद्धि मोहरूपी अविद्यासे रहित होगी
तब क्रमसे इस प्राणीका श्रवणयोग्य वेदवाक्यादिकोंमें जो
फल प्रतिपादन करते हैं उनमें क्रमसे वैराग्य होगा ॥ ५१ ॥
त्रयीविप्रतिपन्नस्य स्थाणुत्वं यास्यते यदा ॥
परात्मन्यचला बुद्धिस्तदासौ योगमाप्नुयात् ५२
जब तीनों वेदोंमें प्रतिपादन किये कर्मसे यह बुद्धि परमा-
त्मामें लगकर निश्चल होजाय तब इस प्राणीको योगकी
प्राप्ति होती है ॥ ५२ ॥

( २० ) गणेशगीता-अ० १.
मानसानखिलान्कामान्यदा धीमांस्त्यजेत्प्रिय ।
स्वात्मनि स्वेन संतुष्टःस्थिरबुद्धिस्तदोच्यते ५३
हे प्रिय ! जब यह बुद्धिमान् मनके सम्पूर्ण कामोंको त्यागन
कर दे, अपने आत्मामें आपहीसे संतुष्ट हो तब यह स्थिर-
बुद्धि कहाता है ॥ ५३ ॥
वितृष्णः सर्वसौख्येषु नोद्विग्नो दुःखसंगमे ॥
गतसाध्वसरुड्रागः स्थिरबुद्धिस्तदोच्यते ॥५४॥
किसीप्रकारके भी संसारी सुखोंमें तृष्णा न करनी,दुःखमें
उद्विग्न न होना, भय, क्रोध और राग न होना यही स्थिर-
बुद्धिका लक्षण है ॥ ५४ ॥
यथाऽयं कमठोऽङ्गानि संकोचयति सर्वतः ॥
विषयेभ्यस्तथा खानि संकर्षेद्योगतत्परः ॥५५॥
जिसप्रकारसे कछुआ सब ओरसे अपने अंग सिकोड लेता है
इसीप्रकारसे योगीको उचित है कि विषयोंसे इंद्रियोंको खींचे५५
व्यावर्तन्तेऽस्य विषयास्त्यक्ताहारस्यवार्ष्मणः ॥
विना रागं च रागोऽपि दृष्ट्वा ब्रह्म विनश्यति५६
भोजन त्यागनेवालेके विषय नष्ट होजाते हैं परन्तु उनका

भाषाटीकासमेत । ( २१ )
अनुभव बना रहता है परन्तु वैराग्यसे ब्रह्मकी प्राप्ति होनेसे
वह राग भी नष्ट हो आता है ॥ ५६ ॥
विपश्चिद्यतते भूप स्थितिमास्थाय योगिनः ॥
मन्थयित्वेन्द्रियाण्यस्य हरंति बलतो मनः ५७
हे राजन् ! जिनके इन्द्रिय वशमें नहीं हैं, वे स्थिर प्रज्ञा-
वाले नहीं होते हैं, इन्द्रियगण मोक्षके प्रयत्न करनेवाले
विद्वान् पुरुषका भी मन हर लेती हैं,इसकारण इंद्रियोंको वशमें
करनेका यत्न करना ॥ ५७ ॥
युक्तस्तानि वशे कृत्वा सर्वदा मत्परो भवेत् ॥
संयतानीन्द्रियाणीह यस्यासौ कृतधीर्मतः ५८॥
इन्द्रियोंको वशमें करके सदा योगीको मेरा परायण होना
चाहिये, कारण कि जिसकी इन्द्रियें वशमें होगई हैं उसीको
स्थिरप्रज्ञ कहते हैं ॥ ५८ ॥
चिन्तयानस्य विषयान्संगस्तेषूपजायते ॥
कामःसंजायते तस्मात्ततः क्रोधोऽभिवर्द्धते ५९॥
विषयोंकी चिन्ता करनेवाले पुरुषको उन सबोंमें अनुराग
होजाता है, आसक्तिसे कामना होती है, उससे क्रोधकी
उत्पत्ति होती है ॥ ५९ ॥

( २२ ) गणेशगीता-अ० १.
क्रोधादज्ञानसंभूतिर्विभ्रमस्तु ततः स्मृतेः ॥
भ्रंशात्स्मृतेर्मतेर्ध्वंसस्तद्ध्वंसात्सोऽपि नश्यति६०
क्रोधसे अज्ञान और इससे स्मृतिभ्रंश होता है, स्मृति-
भ्रंशसे बुद्धि नष्ट होती है, और बुद्धि नष्ट होनेसे यह प्राणी
नष्ट होजाता है ॥ ६० ॥
विना द्वेषं च रागं च गोचरान्यस्तु खैश्चरेत् ॥
स्वाधीनहृदयो वश्यैः संतोषं स समृच्छति ६१॥
अनुराग और द्वेषसे रहित अपने वशमें आई इन्द्रियोंसे
विषयोंका भोग करके भी चित्तको वशीभूत किये जन
शान्तिको प्राप्त होते हैं ॥ ६१ ॥
त्रिविधस्यापि दुःखस्य संतोषं विलयो भवेत् ॥
प्रज्ञया संस्थितश्चायं प्रसन्नहृदयो भवेत् ॥६२॥
एक संतोषकी प्राप्ति होनेसे तीनों प्रकारके दुःख नष्ट होजाते
हैं, इसीप्रकार स्थिरप्रज्ञावालेका मन प्रसन्न होजाता है ॥६२॥
विना प्रसादं न मतिर्विना मत्या न भावना ॥
विना तां न समो भूप विना तेन कुतः सुखम् ६३
विना चित्तप्रसन्न हुए बुद्धिकी प्राप्ति नहीं और बुद्धिके

भाषाटीकासमेत । ( २३ )
विना श्रद्धा नहीं, श्रद्धाके विना शान्ति नहीं और शान्तिके
विना सुख नहीं होता ॥ ६३ ॥
इंद्रियाणांन्विचरतो विषयाननुवर्तते ॥
यन्मनस्तन्मतिं हन्यादप्सु नावं मरुद्यथा॥६४॥
पवन जिसप्रकार नावको जलमें डुबो देती है वैसेही मन
विषयोंमें विचरनेवाले अवशीभूत इंद्रियरूपी घोडोंमेंसे जिसके
अनुकूल चलता, वही उसकी प्रज्ञाको हर लेता है ॥ ६४ ॥
या रात्रिः सर्वभूतानां तस्यां निद्राति नैव सः॥
न स्वपंतीह ते यत्र ता रात्रिस्तस्य भूमिप ६५
अज्ञानसे आच्छादित सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये जो आत्म-
ज्ञान रात्रि स्वरूप है, उसमें इन्द्रिय वश करनेहारे संयमी
योगी जागते हैं, और जिस विषयबुद्धिमें संपूर्ण प्राणी जागते
हैं, वह विषय भोग ज्ञानियोंके लिये रात्रि स्वरूप है ॥ ६५ ॥
सरितां पतिमायांति वनानि सर्वतो यथा ॥
आयांति यं तथा कामा न स शांतिं क्वचिल्लभेत् ६६
जिसप्रकारसे सब नदियें और जल समुद्रमें प्रवेश कर
जाते हैं और उसकी तृप्ति नहीं होती, इसीप्रकार सब कामना
पूर्ण होनेवालेको भी शान्ति नहीं होती ॥ ६६ ॥