गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २२ ) गणेशगीता-अ० १.
क्रोधादज्ञानसंभूतिर्विभ्रमस्तु ततः स्मृतेः ॥
भ्रंशात्स्मृतेर्मतेर्ध्वंसस्तद्ध्वंसात्सोऽपि नश्यति६०
क्रोधसे अज्ञान और इससे स्मृतिभ्रंश होता है, स्मृति-
भ्रंशसे बुद्धि नष्ट होती है, और बुद्धि नष्ट होनेसे यह प्राणी
नष्ट होजाता है ॥ ६० ॥
विना द्वेषं च रागं च गोचरान्यस्तु खैश्चरेत् ॥
स्वाधीनहृदयो वश्यैः संतोषं स समृच्छति ६१॥
अनुराग और द्वेषसे रहित अपने वशमें आई इन्द्रियोंसे
विषयोंका भोग करके भी चित्तको वशीभूत किये जन
शान्तिको प्राप्त होते हैं ॥ ६१ ॥
त्रिविधस्यापि दुःखस्य संतोषं विलयो भवेत् ॥
प्रज्ञया संस्थितश्चायं प्रसन्नहृदयो भवेत् ॥६२॥
एक संतोषकी प्राप्ति होनेसे तीनों प्रकारके दुःख नष्ट होजाते
हैं, इसीप्रकार स्थिरप्रज्ञावालेका मन प्रसन्न होजाता है ॥६२॥
विना प्रसादं न मतिर्विना मत्या न भावना ॥
विना तां न समो भूप विना तेन कुतः सुखम् ६३
विना चित्तप्रसन्न हुए बुद्धिकी प्राप्ति नहीं और बुद्धिके