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सर्वकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 18

भाषाटीकासमेत । ( १७ )
हे राजन् ! मैं और भी उत्तम योग कहताहूं,तुम उसे सुनो,
पशु, मित्र, पुत्र, शत्रु, बंधु तथा सज्जन पुरुष ॥ ४१ ॥
बहिर्दृष्ट्या च समया हृत्स्थयालोकयेत्पुमान् ॥
सुखे दुःखे तथाऽमर्षे हर्षे भीतौ समो भवेत्॥४२॥
इन सबमें समान दृष्टि करनी चाहिये, बाहर भीतर एकसी
दृष्टि रखनी, सुख, दुःख, क्रोध, हर्ष, भय इनमें समान रहना
चाहिये ॥ ४२ ॥
रोगाप्तौ चैव भोगाप्तौ वा जये विजयेऽपि च ॥
श्रियोऽयोगे च योगे च लाभालाभेमृतावपि॥४३॥
रोगकी प्राप्ति हो, चाहे भोगकी प्राप्तिहो, जयहो, विजयहो
लक्ष्मीकी प्राप्ति, अप्राप्ति, हानि, लाभ, जन्म, मरण, इन सबमें
मनको समान रखना उचित है ॥ ४३ ॥
समो मां वस्तुजातेषु पश्यन्नन्तर्बहिः स्थितम् ॥
सूर्ये सोमे जले वह्नौ शिवे शक्तौ तथानिलेज४४
सम्पूर्ण वस्तुओंमें समान भावसे बाहर भीतर मुझे स्थित
जानना, सूर्य, चन्द्रमा, जल, अग्नि, शिव, शक्ति, वायु॥४४॥
द्विजे हृदे महानद्यां तीर्थे क्षेत्रेऽघनाशिनि ॥
विष्णौ च सर्वदेवेषु तथा यक्षोरगेषु च ॥४५॥