गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(१०) गणेशगीता-अ १.
ज्ञानीलोग तीनों जगत्को अपने वशमें करके सम्पूर्ण
जगत्को पवित्र करते हैं, उनका हृदय दयासे पूर्ण होता है,
वह किसीको बोधभी करते हैं ॥ १४ ॥
जीवन्मुक्ता ह्रदे मग्नाः परमानन्दरूपिणी ॥
निमील्याक्षीणि पश्यंतः परं ब्रह्म हृदिस्थितम् १५
वह जीवन्मुक्त होकर परमानन्दरूपी पदमें मग्न होते हैं,
और नेत्रमूंदकर हृदयमें स्थित परब्रह्मका दर्शन करते हैं॥१५॥
ध्यायन्तः परमं ब्रह्म चित्ते योगवशीकृतम् ॥
भूतानि स्वात्मना तुल्यं सर्वाणि गणयन्ति ते १६
योगसे वशीभूत किये चित्तमें परब्रह्मका ध्यान करते हैं,
सम्पूर्ण प्राणियोंको ज्ञानी अपनी तुल्य जानते हैं ॥ १६ ॥
येन केनचिदाच्छिन्ना येनकेनचिदाहताः ॥
येन केन चिदाकृष्टा येन केनचिदाश्रिताः ॥ १७॥
कहीं किसी कारणसे आच्छन्न कहीं किसीसे ताडित, कहीं
किसीसे आकर्षित, कहीं किसीसे आश्रित ॥ १७ ॥
करुणापूर्णहृदया भ्रमन्ति धरणीतले ॥
अनुग्रहाय लोकानां जितक्रोधा जितेंद्रियाः।१८॥