गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६ ) गणेशगीता-अ १.
तस्मात्कर्माणि कुर्वीत बुद्धियुक्तो नराधिप ॥
न त्वकर्मा भवेत्कोऽपि स्वधर्मत्यागवांस्तथा ३८
हे राजन् ! इसकारण जो कर्मकरे वह बुद्धियुक्त है अर्थात्
मेरे अर्पण करे, कारण कि जिस कर्मका त्याग होनेसे स्वध-
र्मका त्याग होता है वह त्याग उचित नहीं है ॥ ३८ ॥
जहाति यदि कर्माणि ततः सिद्धिं न विंदति ॥
आदौ ज्ञानेनाधिकारः कर्मण्येव स युज्यते३९॥
जो कर्मका त्याग करेगा तौ चित्तशुद्धि नहीं होगी, चित्त-
शुद्धि न होनेसे ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होगी, और सिद्धिकीभी
प्राप्ति नहीं होगी, विना चित्तशुद्धिके ज्ञानमें अधिकार नहीं है,
इसकारण प्रथम आसक्तिरहित होकर कर्म करना उचित है ३९॥
कर्मणा शुद्धहृदयोऽभेदबुद्धिमुपैष्यति ॥
स च योगः समाख्यातोऽमृतत्वाय हि कल्पते४०
कर्मसे शुद्ध हृदय होकर अभेद बुद्धिको प्राप्त होता है,
उसीका नाम योग है, जिससे प्राणी अमर होजाता है ॥ ४० ॥
योगमन्यं प्रवक्ष्यामि शृणु भूप तदुत्तमम् ॥
पशौ पुत्रे तथा मित्रे शत्रौ बन्धौ सुहृज्जने॥४१॥