गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४ ) गणेशगीता-अ० १.
जो माया सदा कामक्रोधादि छः विकारोंमें इन प्राणियोंको
लगादेती है, योगसे जब शनैः शनैः अनेक जन्मके मायाके
कपाट दूर हो जाते हैं ॥ ३० ॥
विरज्य विन्दति ब्रह्म विषयेषु सुबोधतः ॥
अच्छेद्यं शस्त्रसंघातैरदाह्यमनलेन च ॥ ३१ ॥
तब यह प्राणी विषयोंसे जागकर और उनसे विरक्तहो पर-
ब्रह्मको जानते हैं, जो ब्रह्म शस्त्र समूहोंसे छेदन नहीं होसक्ता
अग्निसे दग्ध नहीं होसक्ता ॥ ३१ ॥
अक्लेद्यं भूप भुवनैरशोष्यं मारुतेन च ॥
अवध्यं वध्यमानेऽपि शरीरेऽस्मिन्नराधिप ।३२।
जलसे गल नहीं सक्ता पवनसे सूख नहीं सकता, हे
राजन् ! जो इस शरीरके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता वही
ब्रह्म है ॥ ३२ ॥
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रशंसन्ति श्रुतीरिताम्॥
त्रयीवादरता मूढास्ततोऽन्यन्मन्वतेऽपि न ३३॥
वेदत्रयीमें प्रीति करनेहारे केवल कर्म करनेहारे मूढलोग
श्रुतिकी कही हुई फल प्रतिपादक वाणीकीही प्रशंसा करते हैं
दूसरी बातको नहीं मानने हैं ॥ ३३ ॥