गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २० ) गणेशगीता-अ० १.
मानसानखिलान्कामान्यदा धीमांस्त्यजेत्प्रिय ।
स्वात्मनि स्वेन संतुष्टःस्थिरबुद्धिस्तदोच्यते ५३
हे प्रिय ! जब यह बुद्धिमान् मनके सम्पूर्ण कामोंको त्यागन
कर दे, अपने आत्मामें आपहीसे संतुष्ट हो तब यह स्थिर-
बुद्धि कहाता है ॥ ५३ ॥
वितृष्णः सर्वसौख्येषु नोद्विग्नो दुःखसंगमे ॥
गतसाध्वसरुड्रागः स्थिरबुद्धिस्तदोच्यते ॥५४॥
किसीप्रकारके भी संसारी सुखोंमें तृष्णा न करनी,दुःखमें
उद्विग्न न होना, भय, क्रोध और राग न होना यही स्थिर-
बुद्धिका लक्षण है ॥ ५४ ॥
यथाऽयं कमठोऽङ्गानि संकोचयति सर्वतः ॥
विषयेभ्यस्तथा खानि संकर्षेद्योगतत्परः ॥५५॥
जिसप्रकारसे कछुआ सब ओरसे अपने अंग सिकोड लेता है
इसीप्रकारसे योगीको उचित है कि विषयोंसे इंद्रियोंको खींचे५५
व्यावर्तन्तेऽस्य विषयास्त्यक्ताहारस्यवार्ष्मणः ॥
विना रागं च रागोऽपि दृष्ट्वा ब्रह्म विनश्यति५६
भोजन त्यागनेवालेके विषय नष्ट होजाते हैं परन्तु उनका