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सर्वकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 22

भाषाटीकासमेत । ( २१ )
अनुभव बना रहता है परन्तु वैराग्यसे ब्रह्मकी प्राप्ति होनेसे
वह राग भी नष्ट हो आता है ॥ ५६ ॥
विपश्चिद्यतते भूप स्थितिमास्थाय योगिनः ॥
मन्थयित्वेन्द्रियाण्यस्य हरंति बलतो मनः ५७
हे राजन् ! जिनके इन्द्रिय वशमें नहीं हैं, वे स्थिर प्रज्ञा-
वाले नहीं होते हैं, इन्द्रियगण मोक्षके प्रयत्न करनेवाले
विद्वान् पुरुषका भी मन हर लेती हैं,इसकारण इंद्रियोंको वशमें
करनेका यत्न करना ॥ ५७ ॥
युक्तस्तानि वशे कृत्वा सर्वदा मत्परो भवेत् ॥
संयतानीन्द्रियाणीह यस्यासौ कृतधीर्मतः ५८॥
इन्द्रियोंको वशमें करके सदा योगीको मेरा परायण होना
चाहिये, कारण कि जिसकी इन्द्रियें वशमें होगई हैं उसीको
स्थिरप्रज्ञ कहते हैं ॥ ५८ ॥
चिन्तयानस्य विषयान्संगस्तेषूपजायते ॥
कामःसंजायते तस्मात्ततः क्रोधोऽभिवर्द्धते ५९॥
विषयोंकी चिन्ता करनेवाले पुरुषको उन सबोंमें अनुराग
होजाता है, आसक्तिसे कामना होती है, उससे क्रोधकी
उत्पत्ति होती है ॥ ५९ ॥