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दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

११५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
एकादशोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ बालरविद्युतिमिन्दुकिरीटां तुंगकुचां नयन त्रय युक्ताम् ।
स्मेरमुखीं वरदांकुश पाशामीति करां प्रभजे भुवनेशीम् ॥
प्रातः कालीन सूर्य कान्ति के समान देदीप्यमान, चन्द्र -
मुकुट धारिणी, उच्च स्तनों से युक्त, तीनों नेत्र-सूर्य, चन्द्र, अग्नि
धारिणी, मन्द-मन्द मुसकान मुख छटा प्रसारिणी तथा हाथों में
अंकुश, पाश, अभय और वरद मुद्रा धारिणी माँ भुवनेश्वरी को
मैं नमन करता हूँ ।
महामुनि मेधा ऋषि कहते हैं कि असुरों के समापन होने
पर प्रसन्नचित्त होकर देवताओं ने स्तुति की-हे विश्वेश्वरी !
शरणागत संकट निवारिणी, भक्त जन कल्याणिनी माँ जगदम्बे
प्रसन्न होकर विश्व की रक्षा करो, तुम ही इस संसार की आधार
हो, क्योंकि तुम ही पृथ्वी रूपा हो, तुम ही जल रूप होकर जगत
को तृप्त करती हो । तुम ही अनन्त बलशालिनी, वैष्णवी शक्ति
तथा जगत की कारण रूपा माया हो, तुमसे ही यह जगत मोहित
है । तुम्हीं मुक्ति दायिनी हो ।
हे माँ ! सम्पूर्ण विद्यायें तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं ।
जगत की सम्पूर्ण स्त्रियाँ तुम्हारी मूर्तियाँ हैं । तुमने ही विश्व को
व्याप्त किया है । तुम्हीं परा वाणी होने के कारण अवर्णनीया
हो ।
सर्व स्वरूपा देवि, बुद्धिरूप से सब लोगों के हृदय में
विराजमान रहने वाली, स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदायिनी, कला-काष्ठादि
के रूप में उत्पत्ति, स्थिति एवं संहारकारिणी, मंगलमयी, मंगल
दायिनी, सर्व सिद्धि प्रदात्री, शरणागत वत्सला नारायणी आपको
नमस्कार है । यहाँ ‘वत्सला’ शब्द बड़ा महत्वपूर्ण है । जैसे सद्यप्रसूता
धेनु (गाय) अपने बछड़े को अपनी जीभ से चाटकर शुद्ध और

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ११६
स्वच्छ कर देती है । उसे अपने वत्स के शरीर पर लगे हुए मल-
मूत्र के छुड़ाने में घृणा न होकर प्यार उमड़ता है, इसीलिए
'वत्सला' कहते हैं ।
एक बालक मल-मूत्रावेष्टित पड़ा है, उसकी आँखों और
नाक से भी मैल निकल रहा है, रोता हुआ दीन-हीन अवस्था में
पड़ा हुआ है । ऊपर की ओर हाथ उठाये हुये माँ-माँ पुकारता
है । उसके आर्त स्वर को सुनकर ऐसी कौन माँ है जो दौड़कर
उसे छाती से न लगा ले और अपनी करुणामयी दृष्टि तथा
कोमल स्पर्श से निहाल न कर दे । संसार का नियम है कि साफ,
स्वच्छ, हँसते-खेलते बालक को तो सभी लोग गले लगा लेते हैं,
किन्तु वैसे बालक की शरणागत माँ ही है । इसी प्रकार सर्व -
विध साधन सम्पन्न साधक को सभी अपना बना सकते हैं किन्तु
जो दीन-हीन साधन विहीन अनाथ है, उसे तो करुणामयी माँ ही
गले लगाती है । अपना असीम प्यार बरसाती है और स्वयं उसे
शुद्ध कर लेती है ।
दीनों-हीनों, पीड़ितों की रक्षिके माँ, तुम ही ब्रह्माणी हो,
रुद्राणी हो, माहेश्वरी, वैष्णवी, कौमारी, नारसिंही, वाराही भी
तुम ही हो, अपने अनेक आभूषण और आयुध धारण करके तुम्हीं
प्रकट होती हो । तुम्हें बारम्बार नमस्कार है । वृत्रासुर पर इन्द्र
की शक्ति होकर उसकी संहारिणी रूपा तुम्हीं हो । हे चण्ड-मुण्ड
विनाशिनी देवी ! तुम्हीं लक्ष्मी लज्जा, श्रद्धा, पुष्टि, स्वाहा,
स्वधा, ध्रुवा, महारात्रि, महा विद्या, महा अविद्या रूपा नारायणी
हो, तुम्हें नमस्कार है । मेधा, सरस्वतो ऐश्वर्यरूपा, वाग्मी,
पार्वती, तामसी, महाकाली, नियता, संयता, ईशा सबको
अधीश्वरी तुम ही हो । हे सर्वस्वरूपे ! शक्ति सम्पन्ने ! दिव्य
रूपे माँ दुर्गे तुम्हें नमस्कार है । हे कल्याणी ! हे भद्र कालो !
हे जगदम्बे, सर्व प्रकार अपने आयुधों से रक्षा करने वालो
तुम्हें नमस्कार है ।

११७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
सर्व रोग विनाशिनी, सर्वमनोरथ सिद्धिदायिनी, विपद्
विदारिणी, सर्व शरण प्रदायिनी, माँ तुम्हें नमस्कार है । हे
देवि ! दैत्यों के विनाश हेतु आपने विविध रूप धारण किये थे,
आपको नमस्कार है ! विद्याओं में, ज्ञान को प्रकाशित करने
वाले शास्त्रों में; तथा वेदों में तुम्हारा ही वर्णन है । तुम्हीं
संसार को अविद्या द्वारा बांधने वाली और विद्या द्वारा मुक्त
करने वाली हो, अतः तुम्हें नमस्कार है ।
जहाँ राक्षस, शत्रु, सर्प आदि विषैले जीव, डाकू और
भयंकरतम परिस्थितियों में रहकर तुम ही विश्व की रक्षा करती
हो । हे विश्वनाथ वन्दनीये ! जो तुम्हें प्रेम से प्रणाम करते हैं;
उन्हें आपके आश्रय का अनुभव होता है । अभी आसुरी
सम्पत्ति का विनाश कर दैवि-सम्पति का विकास किया है । हम
सब आपकी शरण में हैं; कोटि-कोटि नमन करते हैं प्रसन्न होकर
वरदान दीजिए ।
हे मातु भवानी, जगजननी, संकट हरणी, जन मन भरने दो ।
माँ हम सब तेरे बालक हैं, चरण तले निज तुम रहने दो ॥ हे०
देव पड़े जब विपदा में थे, तब मिलकर शरण तेरी आये ।
चढ़ सिंह पीठ रण में गरजो, फिर रूप वही दरसाने दो ॥ हे०
शुम्भ निशुम्भ को तुमने मारा, महिषासुर को तूने पछाड़ा ।
तूने रक्त बीज संहार किया, वह परम छटा बरसाने दो ॥ हे०
तूने जीवन दान दिया है, तूने उबारा, तुम्ही उबारो ।
भव पार लगे जीवन नैया, सब जन-मन को हरषाने दो ॥ हे०
इस प्रकार देवताओं की स्तुति को सुनकर माँ जगदम्बे
बड़ी प्रसन्न हुई और उन्हें वरदान मांगने के लिये कहा । तब
देवों ने कहा—
सर्व बाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद् वैरिविनाशनम् ॥ ११/३६

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ११८
हे तीनों लोकों की अधीश्वरी माँ ! हमारी समस्त बाधाओं
को दूर करते हुए शत्रुओं का विनाश करो। यह सुनकर
देवी ने कहा—“हे देवगण ! अठारहवें मन्वन्तर में (१)
शुम्भ-निशुम्भ के वध हेतु नन्द यशोदा के प्रकट होकर विन्ध्याचल
में निवास करूंगी (२) फिर वैप्रचित्त दानवों का विनाश
करने के लिए भयंकर रूप में 'रक्त-दन्तिका' के नाम से
अवतरित होऊँगी (३) दुर्भिक्ष काल में मुनियों के स्तवन से
अयौनिजा अवतरित होकर उन्हें सौ नेत्रों से देखने के कारण
'शताक्षी' तथा प्राणियों को शाक खिलाकर प्राणों की रक्षा के
कारण 'शाकुम्भरी' नाम से विख्यात होऊँगी। उसी अवतार में
दुर्गम नामक महादैत्य का वध करने के कारण 'दुर्गा' नाम से
पूजी जाऊँगी (४) ऋषियों की रक्षा हेतु 'भीमा' देवी के नाम
से प्रकट होकर हिमालय पर रहने वाले राक्षसों का भक्षण
करूंगी। तब मुनिवृन्द नत मस्तक होकर मेरी स्तुति करेंगे (५)
तीनों लोकों को संतापित करने वाले 'अरुण' दैत्य का वध
करने तथा तीनों लोकों के कल्याण हेतु भ्रामरी के रूप में
अवतरित होऊंगी। उस समय सब लोग 'भ्रामरी' नाम से
मेरी स्तुति करेंगे।
इस प्रकार जब-जब जगत् में दानवी शक्ति बढ़ेगी तब-
तब उन शत्रुओं के विनाश तथा तुम्हारे कल्याण के लिये मैं
आती रहूँगी। माँ जगदम्बा ने अपने मुख से देवों को आश्वासन
दिया, अपने अवतारों का प्रयोजन तथा नामों का वर्णन किया।
यही उनकी करुणा है।

११६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
द्वादशोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ विद्युद्दाम समप्रभां मृगपतिस्कन्ध स्थितां भीषणाम् ।
कन्याभिः करवालखेट विलसद् हस्ताभिरासेविताम् ॥
हस्तैश्चक्र गदासिखेट विशिखांश्चापं गुणं तर्जनीम् ।
विभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गा त्रिनेत्रां भजे ॥
विद्युत् प्रभा के समान श्री अङ्गों से द्युतिमान, सिंह के
कंधों पर बैठने के कारण भयंकर प्रतीत होने वाली, हाथों में
ढाल और तलवार लिए हुए अनेक कन्याओं द्वारा सेवित, अपने
हाथों में चक्र, गदा, तलवार, ढाल, धनुष, बाण, पाश और
तर्जनी मुद्रा धारण किये हुए, मस्तक पर चन्द्रमुकुट शोभिता,
अग्निमय स्वरूपा, त्रिनेत्र धारिणी दुर्गा देवी को मैं शत-शत नमन
करता हूँ ।
बारहवें अध्याय में पराम्बा ने स्वयं अपने मुख से इस
ग्रंथ के पाठ, मंत्रों के जप की, यज्ञ की पूजा उपासना की
फल-श्रुति कही है । अतः साधकों के लिए बड़ा ही महत्वपूर्ण है ।
इस दुर्गा सप्तशती में तेरह अध्याय और तीन चरित्र हैं
उनमें दैत्यों का विनाश माँ के शौर्य की अद्भुत लीलाओं का
गान है; जिसके द्वारा पराम्बा ने देवों की सुरक्षा और जगत्
का कल्याण किया है । इसका पाठ सिद्धिप्रद है । माँ ने स्वयं
देवों से इस प्रकार कहा-
एभिः स्तवैश्च माँ नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः ।
तस्यां सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम् ॥ १२/२
देवताओं ! जो एकाग्र चित्त होकर प्रतिदिन इन स्तुतियों
द्वारा मेरी स्तुति करेगा, उसकी सारी बाधा मैं निश्चय ही दूर
कर दूँगी । अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी में 'दुर्गा सप्तशती' के पाठ

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १२०
का विशेष महत्त्व है। (कृष्ण पक्ष में चन्द्रक्षीण होता है। इन
तिथियों में क्रमशः मन भी लीन होता है। अतः मन तन्मय
होने पर पाठ की स्वाभाविक महिमा होगी।) मेरे पाठ से पाप,
दरिद्रता, शत्रुभय, त्रिताप, सब विघ्न, भयंकर ग्रह पीड़ायें शान्त
हो जाती हैं। पीठों में मेरा नित्य निवास रहेगा। नव दुर्गा
पाठ के वर्ष में चार अवसर हैं आश्विन शुक्लपक्ष, माघ शुक्लपक्ष
चैत्र शुक्लपक्ष तथा आषाढ़ शुक्लपक्ष प्रतिपदा से नवमी तक
विशेष पूजन करना चाहिये। बाल-ग्रह-पीड़ा, दुःस्वप्न-निवृत्ति
तथा हर प्रकार के भय नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार विस्तार
से माहात्म्य बतलाकर माँ जगदम्बे अन्तर्धान हो गयीं। देवता भी
प्रसन्न होकर अपने-अपने कार्य में लग गये। शेष दैत्य लोग
पाताल लोक में चले गये।
मेधा ऋषि ने कहा-राजन् इस प्रकार समय-समय पर
देवी प्रकट होती हैं समृद्ध करती हैं। प्रलय में कालो, महामारी
में सनातनी देवी। वे ही अभ्युदय हेतु लक्ष्मी रूप में प्रकट
होती हैं।
स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्धूप गन्धादिभिस्तथा।
ददाति वित्तं पुत्रांश्च मतिं धर्मे गतिं शुभाम् ॥ १२/४१
विधिवत् पूजन करने से धन, धान्य, पुत्रादि की प्राप्ति
होती ही है; सद्बुद्धि भी मिलतो है जिससे सत् धर्म करने में
प्रवृत्ति होती है।

१२१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
त्रयोदशोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ बालार्क मण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम् ।
पाशाङ्कुश वराभीतीर्धारयन्तीं शिवां भजे ॥
रवि-शिशु की प्रथम कोमल रश्मियों के समान कान्ति
युक्त, तीन नेत्र तथा चार भुजायें धारण किये हुए हैं; जो अपनी
भुजाओं में क्रमशः पाश, अंकुश वर एवं अभय मुद्रा धारण किये
रहती हैं, मैं उन शिवा देवी का ध्यान करता हूँ ।
ध्यानोपरान्त ऋषि मेधा ने कहा—हे राजन् ! इस जगत्
को कारण करने वाली, ज्ञान उत्पन्न करने वाली, जिस देवी के
उत्तम माहात्म्य का वर्णन किया है, भगवान् विष्णु की माया
स्वरूपा उन भगवती के द्वारा ही तुम, ये वैश्य तथा दूसरे
विवेकी जन मोहित होते हैं हुए, हैं और होंगे । अतः तुम उन्हीं
परमेश्वरी की शरण में जाओ; उनकी आराधना करो क्योंकि
वे पराम्बा आराधना से प्रसन्न होकर भोग; स्वर्ग तथा मोक्ष
प्रदान करती हैं । महर्षि के वचन सुन तथा चरणों में प्रणाम
कर राजा तथा वैश्य दोनों ही ममता का परित्याग कर तपस्या
में लग गये । माँ भगवती के दर्शनों की महत्त्वाकांक्षा को लेकर
पावन नदी के तट पर मृतिका-मिट्टी की प्रतिभा बनाकर
पुष्प, धूप, दीप, गन्ध आदि से विधिवत पूजन करते तथा व्रत
उपवास करते हुए कठिन आराधना में लग गये थे ।
घोर तप से प्रसन्न हो माँ ने दर्शन दिए और वरदान
मांगने को कहा—राजा की वासना राज्य के प्रति बनी हुई थी
अतः उसने इस जन्म में राज्य मिले और अगले जन्म में भी
राजा बनूं यह वर मांगा । समाधि ने विरक्त एवं मुमुक्षु होने

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १२२
के कारण मुक्ति का वर प्राप्त किया। अत राजा सुरथ को
राज्य तथा समाधि वैश्य को दिव्य ज्ञान मिला, जिससे वह मुक्त
हो गया। यही सुरथ अगले जन्म में राजा बन कर सावर्णि
मनु होंगे।
स्पष्ट है करुणामयी माँ भक्त की अभिलाषानुसार
भक्ति एवं मुक्ति दायिनी हैं।

१२३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
उपसंहार
इस प्रकार इन तेरह अध्यायों के मनन करने से पाठकों
को पराम्बा के असली स्वरूप का बोध तो होगा ही, साथ ही
अपौरुषेय वेद प्रतिपाद्य जैसे अन्य भक्ति शास्त्र विद्वानों ने बताये
हैं वैसे ही दुर्गा-सप्तशती ग्रन्थ को स्थान देंगे । आइये, चिन्तकों
को कुछ प्रमाणों से अवगत करा दें—भक्ति वेद प्रति पाद्य है ।
शांडिल्य ने स्वयं कहा है—भक्ति प्रमेया श्रुतिभ्यः
पुराणेति हासाभ्यां च । १-२/६-१० । इसका अभिप्राय है कि
ईश्वर ने स्वयं अपनी वाणी रूप श्रुति से आज्ञा की है कि श्रुति
तथा इतिहास पुराणों से भक्ति का स्वरूप जानना चाहिए ।
इन सूत्रों की व्याख्या में नारायण तीर्थ ने ऋग्वेद के ऐसे अनेक
मंत्र उद्धृत किए हैं, जिनमें नाम स्मरण, श्रवण, कीर्तन,
भगवदर्पण, शरणागति, भगवत्प्रसाद, आत्म समर्पण आदि का
वर्णन है । न केवल साधन रूपा श्रवण कीर्तनादि लक्षणा भक्ति
का ही वर्णन है, अपितु वेदों में भावमयी रागात्मिका, रसमयौ
भक्ति का वर्णन है । ऋग्वेद के ६, १, ५ में परमेश्वर का एक
रक्षक एवं माता पिता के रूप में वर्णन मिलता है । ऋग्वेद के
८, ६८, ११ में अत्यन्त भक्ति भाव के साथ माता-पिता के रूप
में वर्णन किया गया है । वहाँ इन्द्र को पिता ही नहीं, पितृतम
एवं श्रेष्ठ सखा के रूप में निर्दिष्ट किया गया है । किसी-किसी
मन्त्र में ऐसे अनुराग का वर्णन है जैसे पत्नी अपने पतिदेव का
आलिङ्गन कर रही है-परिष्वजन्ते जनः यो यथा पतिम् (१०,
४३,१) । ऋग्वेद (१०, ४०, २) में तो परमेश्वर के प्रति
प्रेयसी-प्रियतम भाव की पराकाष्ठा ही कर दी गई है । ऐसा
लगता है मानो परकीया भाव से उपासना का वही बीज हो ।
भक्ति क्या है ?
सभी भक्ति-दर्शन तात्पर्यतः परमेश्वर के प्रति परमानुरक्ति

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १२४
को ही 'भक्ति' कहते हैं। नारद ने भक्ति का रूप परमप्रेम और
स्वरूप अमृत कहा है। शाण्डिल्य ने अमृत को फल कहा है।
अंगिरा ने स्नेह-प्रेम, एवं श्रद्धा के अतिरिक्त ईश्वर के प्रति
अलौकिक अनुराग को ही 'भक्ति' की संज्ञा दी है। अज्ञातकर्तृक
भक्ति-मीमांसा में भक्ति को मन के 'उल्लास-विशेष' का नाम
दिया गया है। ये आचार्य भक्ति को भाव कहना पसन्द नहीं
करते। उनके मत में रस की समग्र सामग्री से भक्ति का
आविर्भाव होता है, इसलिए वह रस है। वह जन्य नहीं है, स्वयं
उल्लसित रस हैं। स्वामी श्री हरिहरानंदारण्य भक्ति के दो भेद
मानते हैं। जिसमें सुखोपलब्धि होती है वह 'अपरा भक्ति' होतो
है और जिसमें शान्ति होती है वह 'परा'। अपरा भक्ति से परा
भक्ति निष्पन्न होती है। दृढरति से अन्य के प्रति वैराग्य हो
जाता है और केवल भजनीय के स्वरूपख्याति होकर उसमें
निष्ठा हो जाती है। यह परा भक्ति है और इसी से शाश्वती
शान्ति मिलती है।
यह भक्ति ज्ञानरूप नहीं है; अनुराग रूप है। अनुरागी
पर भगवान् की कृपा होती है और पूर्ण निःश्रेयस की प्राप्ति हो
जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि प्रयोजन की पूर्ति के लिए
भक्ति सर्वथा समर्थ है जिनका यह कथन है कि भक्ति एक क्रिया
है और उससे प्राप्त होने वाला फल अनन्त नहीं हो सकता।
उनका यह आक्षेप यथार्थ नहीं है क्योंकि भक्ति प्रयत्नानुविधायी
नहीं है।
इस प्रकार संपूर्ण पाठ के बाद नवार्ण जप और देवी सूक्त
का पाठ करना चाहिये। इसके पश्चात् प्राधानिक रहस्य,
वैकृतिक रहस्य एवं मूर्ति रहस्य क्रमशः तीनों रहस्य दिए गये
हैं। इन रहस्यों की भी बड़ी महिमा है।

१२५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
क्षमा प्रार्थना
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया ।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि ॥ १
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि ॥ २
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि ।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे ॥ ३
अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत् ।
यां गतिं समवाप्नोति न तां ब्रह्मादयः सुराः ॥ ४
सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके ।
इदानीमनुकम्प्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ५
अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम् ।
तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ॥ ६
कामेश्वरि जगन्मातः सच्चिदानन्दविग्रहे ।
गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरी ॥ ७
गुह्याति गुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् ।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि ॥ ८
भगवती दुर्गा जी के बत्तीस नाम भी बहुत प्रसिद्ध हैं।
उनमें नामों का स्मरण कर लेने से भी सभी प्रकार का लाभ
होता है ।
एक समय देवताओं की पूजा से प्रसन्न हुई पराम्बा ने
स्वयं अपने आप कृपा कर देवताओं को यह बत्तीस नामों की
माला सभी आपत्तियों का नाश करने वाली बतलाई थी । इन
नामों द्वारा मधु (शहद) मिलाकर सफेद तिलों से लाख आहुति
करे तो सभी विपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं । इसका पुरश्चरण
तीस हजार का है । गुरुजनों से पूछकर विधिवत् पुरश्चरण
करने से सब प्रकार का लाभ होता है ।

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १२६
अथ दुर्गाद्वात्रिंशन्नाममाला
दुर्गा दुर्गार्तिशमनी दुर्गापद्वि निवारिणी ।
दुर्गमच्छेदिनी दुर्गसाधिनी दुर्गनाशिनी ॥
दुर्गतोद्धारिणी दुर्गनिहन्त्री दुर्ग मापहा ।
दुर्गमज्ञानदा दुर्गदैत्यलोकदवानला ॥
दुर्गमा दुर्गमालोका दुर्गमात्म स्वरुपिणी ।
दुर्गमार्गप्रदा दुर्गमविद्या दुर्गमाश्रिता ॥
दुर्गमज्ञानसंस्थाना दुर्गमध्यानभासिनी ।
दुर्गमोहा दुर्गमगा दुर्गमार्थ स्वरूपिणी ॥
दुर्गमासुरसंहन्त्री दुर्गसायुधधारिणी ।
दुर्गमाङ्गी दुर्गमता दुर्गम्या दुर्गमेश्वरी ॥
दुर्गभीमा दुर्गभामा दुर्गभा दुर्गदारिणी ।
नामावलिमिमां यस्तु दुर्गाया मम मानवः ॥
पठेत् सर्वभयान्मुक्तो भविष्यति न संशयः ॥
इसके पश्चात् निम्न स्तोत्र बहुत प्रसिद्ध है :
अथ देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम्
न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।

१२७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ॥
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥
परित्यक्ता देवा विविधविधिसेवाकुलतया
मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥
श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥
न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव-शिव भवानीति जपतः ॥
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः ।
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १२८
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥
जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।
अपराधपरम्पराऽऽवृत्तं न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥
श्री दुर्गा जी की आरती
जय अम्बे गौरी मैया जय मंगल मूर्ती,
मैया जय मंगल करणी, मैया जय आनन्द करणी ।
तुमको निशिदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ जय अम्बे ॥ १ ॥
मांग सिन्दूर विराजत टीको मृगमद को, मैया टीको ⋯ ।
उज्जवल से दोऊ नैना चन्द्रबदन नीको ॥ जय अम्बे ॥ २ ॥
कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजे, मैया ⋯ ।
रक्त पुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै ॥ जय अम्बे ॥ ३ ॥
केहरि वाहन राजत खड्ग खप्पर धारी, मैया ⋯ ।
सुर नर मुनि जन सेवत, तिनके दुःख हारी ॥ जय अम्बे ॥ ४ ॥
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती, मैया ⋯ ।
कोटि चन्द्र दिवाकर राजत समज्योति ॥ जय अम्बे ॥ ५ ॥
शुम्भ-निशुम्भ विदारे, महिषासुर घाती, मैया ⋯ ।
धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती ॥ जय अम्बे ॥ ६ ॥
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे, मैया ⋯ ।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर नर भयहीन करे ॥ जय अम्बे ॥ ७ ॥
ब्रह्माणी, रुद्राणि, तुम कमला रानी, मैया ⋯ ।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥ जय अम्बे ॥ ८ ॥
चौसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरो, मैया ⋯ ।
बाजत ताल मृदंग, अरु बाजत डमरू ॥ जय अम्बे ॥ ९ ॥
तुम हो जग की माता तुम ही हो भरता, मैया ⋯ ।
भक्तन के दुःख हरता, सुख सम्पति करता ॥ जय अम्बे ॥ १० ॥
भुजा चार अति शोभित, वर अभय धारी, मैया ⋯ ।
मन वांछित फल पावत, सेवत नर-नारी ॥ जय अम्बे ॥ ११ ॥
कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती, मैया ⋯ ।
श्री माल केतु में राजत, कोटि रतन ज्योति ॥ जय अम्बे ॥ १२ ॥
अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावै, मैया ⋯ ।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख-सम्पत्ति पावै ॥ जय अम्बे ॥ १३ ॥

१२६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
अथ बगलाअष्टोत्तरनामस्तोत्रम्
नारद उवाच
भगवन् ! देवदेवेश ! सृष्टि-स्थिति-लयात्मक ! ।
शतमष्टोत्तरं नाम्नां बगलाया वदाऽधुना ॥ १
श्रीभगवानुवाच
शृणु वत्स ! प्रवक्ष्यामि नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ।
पीताम्बर्या महादेव्याः स्तोत्रं पापप्रणाशनम् ॥ २
यस्य प्रपठनात् सद्यो वादी मूको भवेत् क्षणात् ।
रिपूणां स्तम्भनं याति सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ ३
विनियोगः
ॐ अस्य श्रीपीताम्बर्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रस्य सदाशिव-ऋषिरनु-
ष्टुप्छन्दः, श्रीपीताम्बरी देवता श्रीपीताम्बरीप्रीतये जपे विनियोगः ।
ॐ बगला विष्णु-वनिता विष्णु-शङ्कर-भामिनी ।
बहुला वेदमाता च महाविष्णुप्रसूरपि ॥ १
महामत्स्या महाकूर्मा महावाराहरूपिणी ।
नरसिंहप्रिया रम्या वामना वडुरूपिणी ॥ २
जामदग्न्यस्वरूपा च रामा रामप्रपूजिता ।
कृष्णा कपर्दिनो कृत्या कलहा कलविकारिणी ॥ ३
बुद्धिरूपा बुद्धभार्या बौद्ध-पाखण्ड-खण्डिनी ।
कलिकरूपा कलिहरा कलिदुर्गतिनाशिनी ॥ ४
कोटिसूर्यप्रतीकाशा कोटि-कन्दर्प-मोहिनी ।
केवला कठिना काली कलाकैवल्यदायिनी ॥ ५
केशवी केशवाराध्या किशोरी केशवस्तुता ।
रुद्ररूपा रुद्रमूर्ती रुद्राणी रुद्रदेवता ॥ ६
नक्षत्ररूपा नक्षत्रा नक्षत्रेश-प्रपूजिता ।
नक्षत्रेश-प्रिया नित्या नक्षत्रपति-वन्दिता ॥ ७

श्रीदुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १३०
नागिनी नागजननी नागराज-प्रवन्दिता ।
नागेश्वरी नागकन्या नागरी च नगात्मजा ॥ ८
नगाधिराज-तनया नगराज-प्रपूजिता ।
नवीना नीरदा पीता श्यामा सौन्दर्यकारिणी ॥ ९
रक्ता नीला धना शुभ्रा श्वेता सौभाग्यदायिनी ।
सुन्दरी सौभगा सौम्या स्वर्णभा स्वगतिप्रदा ॥ १०
रिपुत्रासकरी रेखा शत्रुसंहारकारिणी ।
भामिनी च तथा माया स्तम्भिनी मोहिनी शुभा ॥ ११
राग-द्वेषकरी रात्री रौरव-ध्वंसकारिणी ।
यक्षिणी सिद्धनिवहा सिद्धेशा सिद्धिरूपिणी ॥ १२
लङ्कापति-ध्वंसकरी लङ्केशरिपु-वन्दिता ।
लङ्कानाथ-कुलहरा महारावणहारिणी ॥ १३
देव-दानव-सिद्धौघ-पूजिता परमेश्वरी ।
पराणुरूपा परमा परतन्त्रविनाशिनी ॥ १४
वरदा वरदाराध्या वरदान-परायणा ।
वरदेशप्रिया वीरा वीरभूषण-भूषिता ॥ १५
वसुदा बहुदा वाणी ब्रह्मरूपा वरानना ।
बलदा पीतवसना पीतभूषण-भूषिता ॥ १६
पीतपुष्प-प्रिया पीतहारा पीतस्वरूपिणी ।
इति ते कथितं विप्र ! नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥ १७
यः पठेद् पाठयेद् वापि शृणुयाद् वा समाहितः ।
तस्यं शत्रुः क्षयं सद्यो याति नैवात्र संशयः ॥ १८
प्रभातकाले प्रयतो मनुष्यः
पठेत् सुभक्त्या परिचिन्त्य पीताम् ।
द्रुतं भवेत् तस्य समस्त - वृद्धि-
विनाशमायाति च तस्य शत्रुः ॥ १६
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१३१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
अथ सप्तश्लोकी दुर्गा
शिव उवाच-
देवि त्वं भक्त सुलभे सर्व कार्य विधायिनी ।
कलौ ही कार्य सिद्ध्यर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः ॥
देव्युवाच-
शृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्ट साधनम् ।
मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बा स्तुतिः प्रकाश्यते ॥
ॐ अस्य श्री दुर्गा सप्तश्लोकी स्तोत्रमंत्रस्य नारायण ऋषिः, अनुष्टुप् छंदः
श्री महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वत्यो देवताः,
श्री दुर्गा प्रीत्यर्थं सप्तश्लोकी दुर्गापाठे विनियोगः ।
ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥१॥
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।
दारिद्र्य दुःख भय हारिणि कात्वदन्या,
सर्वोपकार करणाय सदार्द्र चित्ता ॥२॥
सर्व मङ्गल माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बिके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते ॥३॥
शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे ।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तुते ॥४॥
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्व-शक्ति-समन्विते ।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तुते ॥५॥
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा,
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां,
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥६॥
सर्व बाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥७॥
“श्री श्री सप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्णा ॥

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् ।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानिसहितं नमामि ॥
पुनीत शादमां के प्रबन्ध में सरस्वती प्रेस, ठठेरवाड़ा, निकट सर्राफा
मेरठ शहर में मुद्रित । फोन (०१२१) २३४८६, २३७३३