दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १२४
को ही 'भक्ति' कहते हैं। नारद ने भक्ति का रूप परमप्रेम और
स्वरूप अमृत कहा है। शाण्डिल्य ने अमृत को फल कहा है।
अंगिरा ने स्नेह-प्रेम, एवं श्रद्धा के अतिरिक्त ईश्वर के प्रति
अलौकिक अनुराग को ही 'भक्ति' की संज्ञा दी है। अज्ञातकर्तृक
भक्ति-मीमांसा में भक्ति को मन के 'उल्लास-विशेष' का नाम
दिया गया है। ये आचार्य भक्ति को भाव कहना पसन्द नहीं
करते। उनके मत में रस की समग्र सामग्री से भक्ति का
आविर्भाव होता है, इसलिए वह रस है। वह जन्य नहीं है, स्वयं
उल्लसित रस हैं। स्वामी श्री हरिहरानंदारण्य भक्ति के दो भेद
मानते हैं। जिसमें सुखोपलब्धि होती है वह 'अपरा भक्ति' होतो
है और जिसमें शान्ति होती है वह 'परा'। अपरा भक्ति से परा
भक्ति निष्पन्न होती है। दृढरति से अन्य के प्रति वैराग्य हो
जाता है और केवल भजनीय के स्वरूपख्याति होकर उसमें
निष्ठा हो जाती है। यह परा भक्ति है और इसी से शाश्वती
शान्ति मिलती है।
यह भक्ति ज्ञानरूप नहीं है; अनुराग रूप है। अनुरागी
पर भगवान् की कृपा होती है और पूर्ण निःश्रेयस की प्राप्ति हो
जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि प्रयोजन की पूर्ति के लिए
भक्ति सर्वथा समर्थ है जिनका यह कथन है कि भक्ति एक क्रिया
है और उससे प्राप्त होने वाला फल अनन्त नहीं हो सकता।
उनका यह आक्षेप यथार्थ नहीं है क्योंकि भक्ति प्रयत्नानुविधायी
नहीं है।
इस प्रकार संपूर्ण पाठ के बाद नवार्ण जप और देवी सूक्त
का पाठ करना चाहिये। इसके पश्चात् प्राधानिक रहस्य,
वैकृतिक रहस्य एवं मूर्ति रहस्य क्रमशः तीनों रहस्य दिए गये
हैं। इन रहस्यों की भी बड़ी महिमा है।