ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
या स्वर्गके सुंदर भोग । रोक रखते हैं जो याग ।
अथवा दुःखके प्रसंग । बालत्वमें जैसे ॥ ७९ ॥
होनेमें जैसे दीपकी सिद्धि । कठिनाई घूमकी है आदि ।
अथवा होती है दिव्योोषधि । जीभको दुःखद ॥ ७८० ॥
इस प्रकार सुन अर्जुन । जिस सुखका उगम-स्थान ।
यम दम आदिके कारण । होता है विषम ॥ ८१ ॥
करना सभी स्नेहका दमन । वैराग्य उत्पन्न होता अर्जुन ।
स्वर्ग संसार सीमाका बंधन । रहता है दूर ॥ ८२ ॥
विवेक श्रवणका अति त्रास । तथा व्रताचरण है कर्कश ।
करते हैं बुद्धि आदिका नाश । रात्रिदिवस ॥ ८३ ॥
मुखसे सुषुम्नाके । ढेर प्राणायामके ।
पडते हैं ढेर ढेरके । निगलना तब ॥ ८४ ॥
जैसे चक्रवाकके विरहमें होता । या शिशुको स्तनसे छुडानेमें होता ।
भूखेको थालीसे उठानेमें जो होता । उससे अधिक दुःख ॥ ८५ ॥
माताके सामनेसे बालक । छीनता है काल जब एक ।
अथवा छूटता है उदक । मीनसे जब ॥ ८६ ॥
वैसे विषयोंका घर है पार्थ । तजनेमें इंद्रियोंको युगांत ।
होता तब धीर सहता नित । वैराग्यशाली ॥ ८७ ॥
ऐसे जिस सुखका प्रारंभ । दिखाता है काठिण्यका क्षोभ ।
फिर होता क्षीराब्धिमें लाभ । अमृतसा अंतमें ॥ ८८ ॥
प्रथम आया वैराग्यका गरल । उसको दिया धैर्य शंभुने गला ।
तभी होता ज्ञानामृतका निर्मल । महदानंद ॥ ८९ ॥
चुभता अगसे भी तीखा । कच्चापन हरे द्राक्षका ।
पक्तामें जैसे उसका । माधुर्य रहता ॥ ७९० ॥
इस वैराग्यादिका भी वैसा । सुपक्व आत्म-प्रकाशमें वैसा ।
वैराग्य सह होता हे नाशसा । अविद्याजातका ॥ ९१ ॥
तब जैसे गंगा सागरमें । बुद्धि विलीन होती आत्मामें ।
अद्वयानंदकी अपनेमें । खुलती खान ॥ ९२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७८०
ऐसे स्वानुभव विश्राम। वैराग्य-मूलका परिणाम ।
उस सुखको सात्विक नाम । दिया गया है ॥ ९३ ॥
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥
राजस सुखके लक्षण-
मिलती जब विषय इंद्रियां । छूता है जो सुख उस समय ।
दोनों किनारोंको हे धनंजय । उफानमें आकर ॥ ९४ ॥
अधिकारी आते जब गांव । होता है जब जैसा उत्सव ।
अथवा ऋण लेके विवाह । विस्तार होता ॥ ९५ ॥
या रोगीकी जीभमें जैसे । केला-बूरा भाता है वैसे ।
बचनाग पहले जैसे । लगता मीठा ॥ ९६ ॥
प्रवास-चौर्यके पहले मित्र । या हाट बातका कलत्र ।
होते उनके विनोद विचित्र । उसी प्रकार ॥ ९७ ॥
वैसे जो विषयेंद्रियोंका मिलन । करता जीवके सुखमें पोषण ।
फिर जैसे चट्टानको रत्न मान । मरता हंस जैसे ॥ ९८ ॥
वैसे खर्चके सारा उत्पन्न । मिटता जीवन संपन्न ।
क्षीण होता सुकृतका धन । जीवका सारा ॥ ९९ ॥
तथा जब सब भोग मिटता । तब वह मात्र स्वप्नसा होता ।
फिर केवल मात्र जो रहता । हानिका भार ॥ ८०० ॥
विपत्ति है ऐसे जो सुख । ऐहिक परिणाम देख ।
परमें बनके जो विष । उलटता है ॥ १ ॥
करनेसे लाड़ विषयोंके । जला करके खेत धर्मके ।
भोग किये नाना उत्सवके । विषयोंसे वहां ॥ २ ॥
पहला लगता मीठा अंतमें विष मारक ।
विषय योगसे पाती इंद्रियां सुख राजस ॥ ३८ ॥
७८१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
पातकोंमें तब आता बल । नरकमें देते हैं वे खल ।
उस सुखने किया है छल । अंतमें ऐसे ॥ ३ ॥
बछनाग विष है मधुर । किंतु अंतमें मारक क्रूर ।
वैसे पहले होता मधुर । अंतमें कटु ॥ ४ ॥
यह सुख निःसंदेह पार्थ । रजो गुणसे बना है सार्थ ।
इसीलिये न छूना सुखार्थ । इसका अंग ॥ ५ ॥
यदग्रे चानुबंधे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥
तामसिक सुखके लक्षण—
करके अपेयका पान । तथा अखाद्यका भोजन ।
और पर-स्त्री-सन्निधान । देता है जो सुख ॥ ६ ॥
या दूसरोंका कर संहार । और कर परस्वापहार ।
होता है सुखका अवतार । भाटोंके मुखसे ॥ ७ ॥
आलस्यमें होता जिसका पोषण । या निद्रामें होते हैं अनुभव जान ।
जिसका आद्यंत भुलाता अर्जुन । अपने पथको ॥ ८ ॥
जो कुछ है वह पार्थ । तामस मान यथार्थ ।
इसमें सुखकी बात । असंभाव्य ॥ ९ ॥
मूलमें कर्मके तीन प्रकार । इससे सुख भी तीन प्रकार ।
यह सब तुझे शास्त्रानुसार । कह दिया मैंने ॥ ८१० ॥
कर्ता कर्म तथा कर्म-फल । यह त्रिपुटि एक केवल ।
इसके बिना न सूक्ष्म-स्थूल । कुछ भी यहां ॥ ११ ॥
तथा यह जो त्रिपुटि । तीनों गुणोंमें किरीटी ।
बुनी गयी है जो पर्टी । तंतु समान ॥ १२ ॥
निद्रा प्रमाद आलस्य आत्माको घेरके सदा ।
आदि औ' अंतमें जो है भुलाता सुख तामस ॥ ३९ ॥
ज्ञानेश्वरी ७८२
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥
प्रकृतिके ये गुण सर्वव्यापी और सबको बंधनकारक हैं—
तभी जो प्रकृतिसे प्रकट होता । तथा सत्वादिकसे नहीं बंधता ।
स्वर्ग या मृत्यु लोकमें नहीं होता । ऐसा कुछ भी कहीं ॥ १३ ॥
उनके बिना कहीं कंबल । मृत्तिका बिन कर्दम गोल ।
अथवा जल बिन कल्लोल । होता है क्या ॥ १४ ॥
वैसे कहीं गुणके बिन । नहीं है सृष्टिकी रचना ।
ऐसे नहीं हुवा अर्जुन । प्राणिजातमें ॥ १५ ॥
इसीलिये यह सकल । तीन गुणोंसे है केवल ।
बनाया गया है अखिल । ऐसे जान ॥ १६ ॥
गुणोंसे देवोंके तीन प्रकार । तथा लोकके भी तीन आकार ।
गुणोंसे समाजको दिये चार । व्यापार वर्णके ॥ १७ ॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ४१ ॥
वर्ण-व्यवस्थाका आधार भी तीन गुण ही है—
वही जो चार वर्ण । पूछेगा तू कौन कौन ।
वहां जो मुख्य ब्राह्मण । आधार ही है ॥ १८ ॥
यहां जो क्षत्रिय वैश्य दोन । मानमें ब्राह्मणोंके समान ।
योग्य हैं वे वैदिक विधान । करनेमें जो ॥ १९ ॥
शूद्रका है चतुर्थ वर्ण । वेदसे नाता नहीं जान ।
तभी त्रिवर्णके आधीन । उसकी वृत्ति ॥ ८२० ॥
पृथ्वी पर यहां या तो देवोंमें स्वर्गमें कहीं ।
प्रकृतिके गुणोंमेंसे कोई भी छूटता नहीं ॥ ४० ॥
ब्राह्मणादिक वर्णोंका किया कर्म विभाजन ।
गुण है जिसके जैसे उनके अनुसारही ॥ ४१ ॥
७८३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग.
वृत्तिका निकट संबंध । ब्राह्मणादिसे होता सिद्ध ।
उससे शूद्र जो प्रसिद्ध । हुवा चौथा ॥ २१ ॥
जैसे फूलोंके साथ ही साथ । सूत्रकी गंध लेते श्रीमंत ।
द्विज संग शूद्रको भी पार्थ । स्वीकारते वेद ॥ २२ ॥
ऐसी है अजी पार्था । चातुर्वर्ण्य व्यवस्था ।
दिखाऊं कर्म पथ । इसका मैं ॥ २३ ॥
जिन गुणोंसे ये वर्ण हैं चार । जन्म-मृत्यू कैंचीसे छूटकर ।
ईश्वरके निकट धनुर्धर । पहुंचेंगे ही ॥ २४ ॥
जिस आत्म-प्रकृतिने यहां । सत्वा दिक गुणोंमें है जहां ।
लोगोंको ये चार कर्म यहां । बांट दिये हैं ॥ २५ ॥
पिताने बांटा जैसे जो संचित धन । सूर्यने राहीको पथ दिखाया जान ।
या उनके कर्म सेवकोंको अर्जुन । दिखाये हैं स्वामीने ॥ २६ ॥
इस भांति प्रवृत्तिने गुण । फैलाकर किये चार वर्ण ।
कर्म रूपसे जान अर्जुन । किया विस्तार ॥ २७ ॥
यहां तू सत्व-गुणसे जान । कम अधिक मिश्रण बन ।
हुवा इन दोनोंका नियोजन । ब्राह्मण क्षत्रिय ॥ २८ ॥
तथा है जो रज सात्विक । उससे रचे वैश्य लोक ।
रज तम मिलाके देख । हुए शूद्र ॥ २९ ॥
ऐसा एकही प्राणि वृंद । किया चतुवर्ण भेद ।
सुन वह गुण प्रबुद्ध । पांडुकुमार ॥ ८३० ॥
किया आप रखा जो जैसे । दीप-ज्योत दिखाती जैसे ।
गुण भिन्न कर्म भी वैसे । दिखाते शास्त्र ॥ ३१ ॥
वैसे अब कौन कौन । वर्ण विहित लक्षण ।
कहता कर श्रवण । सौभाग्य निधि तू ॥ ३२ ॥
सर्वेंद्रियोंकी सभी प्रवृत्तियां । अपने हाथमें ले धनंजया ।
बुद्धि मिलती है आत्मासे प्रिया । पतिव्रता जैसे ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७८४
शमो दमस्तपः शौचं क्षांतिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ ४२ ॥
ब्राह्मणोंका स्वभाव धर्म—
बुद्धिका जो ऐसे उपराम । इसके साथ जान तू राम ।
यह गुणोंका है उपक्रम । जिन कर्मोंमें ॥ ३४ ॥
बाह्य इंद्रियोंका यह जो झुंड । होता है धर्म-विरुद्ध उदंड ।
तब रोक लेता जो विधि-दंड । वही है दम ॥ ३५ ॥
करता जो शममें सहाय । वह गुण दम धनंजय ।
यह दूसरे गुणका कार्य । ब्रह्मकर्ममें ॥ ३६ ॥
जैसे है छठीकी रात । नहीं भूलते हैं ज्योत ।
वैसे ईश्वरकी बात । चितमें रखना ॥ ३७ ॥
इसका नाम है तप । तीसरे गुणका रूप ।
वैसे शौच भी निष्पाप । द्विविध यहां ॥ ३८ ॥
भावशुद्धिसे भरा हुवा मन । विहित कर्मसे भूषित तन ।
ऐसे जिसका सबाह्य जीवन । सजा हुवा है ॥ ३९ ॥
इसका नाम शौच है पार्था । ब्राह्मण-कर्मका गुण चौथा ।
तथा पृथ्वीके भांति सर्वथा । सभी सहना ॥ ८४० ॥
इसका नाम पांडव । गुण है कहा पांचवा ।
स्वरमें जैसे सुहाव । पंचम स्वर ॥ ४१ ॥
तथा टेडेमेडे किनारोंसे । सरल बहती गंगा जैसे ।
अथवा टेडे ईखमें जैसे । रहता रस सरल ॥ ४२ ॥
विश्वमें जीवोंके विषयमें । सरलतासे बरतनेमें ।
दीखता गुण जो कर्ममें । आर्जव है छटा ॥ ४३ ॥
तप शांति क्षमा श्रद्धा ज्ञान विज्ञान निग्रह ।
ऋजुता और पावित्र्य ब्रह्मकर्म स्वभावसे ॥ ४२ ॥
(४७) ७८५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
जिस भांति माली संपन्न । जड़को सींचता अर्जुन ।
फलमें उसका दर्शन । करता है फिर ॥ ४४ ॥
वैसे शास्त्रानुसार आचरण । कर करना ईश्वर दर्शन ।
यही एक निश्चय अर्जुन । करना ज्ञान है ॥ ४५ ॥
ब्राह्मण कर्ममें ज्ञान । सातवा गुण है जान ।
विज्ञानका रूप सुन । कहता अब ॥ ४६ ॥
अंतःकरण शुद्धिके समय । शास्त्रका ध्यान बलसे विलय ।
ईश्वर तत्वमें होना निश्चय । बुद्धिका जान ॥ ४७ ॥
वास्तविक यह विज्ञान । आठवा है जो गुणरत्न ।
तथा आस्तिक्य भी सुन । गुण है नौवा ॥ ४८ ॥
राज-मुद्रा जिसके पास होती । जनता उसीको है मान देती ।
सच्छात्रोंसे जो भी स्वीकार होती । उसी राहको ॥ ४९ ॥
अति आदरसे जो मानता । उसीको मैं आस्तिक्य कहता ।
उसे नौवा गुण मैं कहता । इस स्थानपे ॥ ८५० ॥
ऐसे शमदमादिक । गुण हैं नौ निर्दोष ।
कर्म जान स्वाभाविक । ब्राह्मणके ये ॥ ५१ ॥
यह नौ गुण-रत्नाकर । या नवरत्नोंका है हार ।
प्रकाशको जैसे भास्कर । धारण करता ॥ ५२ ॥
या चंपक पुष्पसे चंपा पूजता । या चांदनीसे ही चंद्र उजलता ।
अथवा चंदन निजको चर्चिता । सौरभसे अपने ॥ ५३ ॥
नौ गुणोंका जड़ावू भूषण । धारण करता जो ब्राह्मण ।
कभी न छोड़ता तन मन । ब्राह्मणका उसे ॥ ५४ ॥
अब क्षत्रियको जो उचित । कर्म कहता तुझे निश्चित ।
बुद्धि सह तू देकर चित्त । सुन तू अब ॥ ५५ ॥
क्षत्रियोंका स्वभाव-धर्म—
तेजमें कभी किसीका भानु । सहाय न चाहता अर्जुन ।
शिकारीमें सिंह कभी न- । चाहता सहाय ॥ ५६ ॥
ज्ञानेश्वरी ७८६
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥
ऐसे जो स्वाभाविक सशक्त । सहाय बिन उद्भट पार्थ ।
ऐसे श्रेष्ठ शौर्य विकसित । गुण है प्रथम ॥ ५७ ॥
तथा जैसे सूर्यका प्रताप । कोटि नक्षत्र करता लोप ।
किंतु उनसे न होता लोप । चंद्र सह भी वे हो तो ॥ ५८ ॥
ऐसे प्रौढ गुणमें पार्थ । विश्वको करता विस्मित ।
किंतु आप न विचलित । होता है कभी ॥ ५९ ॥
ऐसा प्रगल्भ रूप जो तेज । क्षात्र-धर्मका गुण है दूजा ।
इसी भांति धैर्य है सहज । गुण तीसरा ॥ ८६० ॥
टूट पडा भी यदि आकाश । बुद्धिकी आंखें कभी मानुस ।
मिटता नहीं है स-साहस । वही है धैर्य ॥ ६१ ॥
तथा पानी कितना ही गहरा होता । कमल ऊपर आकर ही खिलता ।
या आकाश किसीसे नहीं हारता । ऊंचाईमें कभी ॥ ६२ ॥
कैसी ही विवश अवस्था । जीवनमें पाकर पार्था ।
न छेदती प्रज्ञा सर्वथा । स्थिर बुद्धिकी ॥ ६३ ॥
ऐसी दक्षता है जो चोख । यह है चौथा गुण देख ।
तथा जूझ जो अलौकिक । गुण पांचवा ॥ ६४ ॥
जैसे सूर्यमुखीका पुष्पक । सदा सूर्यकी ओर उन्मुख ।
वैसे वह शत्रुके सन्मुख । होता है सदा ॥ ६५ ॥
यत्न-पूर्वक गर्भिणी जैसे । टालती है पुरुषको वैसे ।
समरमें पीठ दिखानेसे । बचता रहता ॥ ६६ ॥
क्षत्रियोंका यह आचार । पांचवा गुणेंद्र धनुर्धर ।
पुरुषार्थीके सिरपर । भक्ति है जैसे ॥ ६७ ॥
शौर्य धैर्य प्रजा रक्षा युद्धमें अपलायन ।
दातृत्व दक्षता तेज क्षात्र-धर्म स्वभावसे ॥ ४३ ॥
७८७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
लगे हुए अपने फल फूल । देनेमें वृक्ष उदार सरल ।
अथवा देता जैसा परिमल । कमलवन ॥ ६८ ॥
जितना जो चाहता उतना । चंद्रका उसे चांदनी देना ।
वैसे चाहनेवालेको देना । इच्छानुसार ॥ ६९ ॥
ऐसा अपरमित दान । जहां है छटा गुण रत्न ।
तथा आज्ञाका एक स्थान । होता है सदा ॥ ८७० ॥
करके अवयवोंका पोषण । उनसे सेवा लेता अनुदिन ।
ऐसे करके प्रजानुरंजन । भोगना प्रजासुख ॥ ७१ ॥
उसका नाम है ईश्वर-भाव । सब सामर्थ्यका है वही ठाव ।
सब गुणोंमें यह महाराव । क्षत्रियोंके ॥ ७२ ॥
ऐसे हैं शौर्यादि सात गुण । जिससे हैं विशेष भूषण ।
सप्त ऋषीसे शोभता गगन । वैसे ही है यह ॥ ७३ ॥
सात गुणोंसे जो विचित्र । विश्वमें है कर्म पवित्र ।
यह जान सहज क्षात्र- । धर्म है क्षत्रियोंका ॥ ७४ ॥
ऐसे क्षत्रिय नहीं है नर । स्वत्व-स्वर्णका मेरु डोंगर ।
तमी है स्वर्गके वे आधार । गुण है सात ॥ ७५ ॥
अथवा जो सात गुणार्णव । घेरे हैं पृथ्वि सह वैभव ।
भोगता है क्षत्रिय पांडव । इस प्रकार ॥ ७६ ॥
अथवा है इस गुण-प्रवाहसे । क्रिया-गंगा उसके अंगमें जैसे ।
मिलके जगमें महा सागरसे । शोभती है ॥ ७७ ॥
किंतु यह रहने दे देख । शौर्यादिक जो हैं गुणात्मक ।
सात कर्म हैं जो स्वाभाविक । क्षत्रिय जनके ॥ ७८ ॥
अब जो वैश्यको उचित । गुण कहता जो निश्चित ।
उनको सुन अब पार्थ । ध्यान पूर्वक ॥ ७९ ॥
वैश्य तथा शूद्रोंका कर्म—
भूमि बीज और हल । इसका लेकर बल ।
जोड़ना लाभ अतुल । जिनका काम ॥ ८८० ॥
ज्ञानेश्वरी ७८८
अध्याय १४: गुणत्रयविभागयोग
कृषिगोरक्षवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥
अथवा कृषिसे है जीना । गोधनकी रक्षा करना ।
अधिक मूल्यमें बेचना । स्वस्त वस्तु ॥ ८१ ॥
इतना ही है धनंजय । वैश्य-कर्मका समुदाय ।
वैश्यका गुण-समुच्चय । इतना जान ॥ ८२ ॥
तथा वैश्य क्षत्रिय ब्राह्मण । द्विजन्मके हैं ये तीनों वर्ण ।
इन सबका जो शुश्रूषण । कर्म है शूद्रका ॥ ८३ ॥
द्विज-सुश्रूषासे पर । शूद्र कर्म ना यहांपर ।
वर्णोचित है धनुर्धर । दिखाये कर्म ॥ ८४ ॥
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विंदति तच्छृणु ॥ ४५ ॥
वर्णानुसार सहज कर्म ही अधिकार है—
भिन्न भिन्न वर्णोंको उचित । कर्म इसी प्रकार हैं पार्थ ।
जैसे इंद्रियोंको है उचित । शब्दादिक विषय ॥ ८५ ॥
अथवा मेघसे जो चूता । पानीको उचित सरिता ।
सरिताको है पांडुसुता । उचित है सिंधु ॥ ८६ ॥
वर्णाश्रम वश जैसे । करणीय कार्य ऐसे ।
गोरेकी गौरता जैसे । होती स्वाभाविक ॥ ८७ ॥
वह है जो स्वाभाविक कर्म । शास्त्रानुसार ही वीरोत्तम ।
करनेमें ही उत्कट प्रेम । ऐसे रहता ॥ ८८ ॥
खेती व्यापार गोरक्षा वैश्यकर्म स्वभावसे ।
करना प्राप्त सेवा जो शूद्र-कर्म स्वभावसे ॥ ४४ ॥
जो है स्व-कर्ममें दक्ष पाता है मोक्ष निश्चित ।
मोक्ष कैसा सुनो पाता स्वकर्म दक्ष जो नर ॥ ४५ ॥
७८९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
होता है यदि अपना ही रत्न । कराता जौहरीसे परीक्षण ।
वैसे शास्त्रानुसार निरीक्षण । करना कर्मका ॥ ८९ ॥
जैसे दृष्टि होती है अपने पास । दीपके बिन उपयोग न खास ।
या पथ नहीं जानने पर विशेष । जैसे हैं पैर ॥ ८९० ॥
तभी जो है वर्णानुसार । सहज होता अधिकार ।
आप हो शास्त्रोंसे गोचर । करता आप ॥ ९१ ॥
जो है घरकी ही धरोहर । दीप दिखाता है धनुर्धर ।
उठानेमें कह तू फिर । आलस कैसे ॥ ९२ ॥
स्वाभाविक ही जो पाया । शास्त्रोंसे सही कहा गया ।
विहित कर्म अपनाया । आचरणमें जो ॥ ९३ ॥
आलसको छोड़कर । फलाशाको तज कर ।
तन मन एक कर । देना आरंभमें ॥ ९४ ॥
प्रवाह-बद्ध होकर बहता । पानी भिन्न दिशामें नहीं जाता ।
वैसे ही शास्त्रोचित आचरता । अपना कर्म ॥ ९५ ॥
इस प्रकारसे जो पार्थ । स्वयं कर्म करता विहित ।
करता है मोक्ष-द्वार प्राप्त । इस ओरका ॥ ९६ ॥
अकरणीय और निषिद्ध । कर्मसे न रखना संबंध ।
तभी तो वह भव-बद्ध । नहीं होता ॥ ९७ ॥
शास्त्रोक्त निष्काम कर्मसे आत्म-ज्ञान मिलता है—
तथा काम्य-कर्मकी ओर । दृष्टिपात भी नहीं कर ।
स्वर्गका भी चंदन-द्वार । रोकता वह ॥ ९८ ॥
वैसे ही अन्य जो है नित्य-कर्म । फल-त्यागसे किये निष्काम ।
इसीलिये है मोक्षकी सीम । पायी उसने ॥ ९९ ॥
ऐसे शुभाशुभ संसार । तज कर जो धनुर्धर ।
वैराग्य मोक्ष-द्वार पर । आ के खडा हुवा ॥ ९०० ॥
ज्ञानेश्वरी ७९०
सकल भाग्यकी है जो सीमा । तथा है मोक्ष लाभकी प्रमा ।
विविध कर्ममागोंका श्रम । शांत होता यहां ॥ १ ॥
मोक्ष-फलका जो दिया हुवा ओल । अथवा सुकृत तरुका है फूल ।
वैराग्य कमल पर अलिकुल । बैठता जैसे ॥ २ ॥
जैसे आत्म-ज्ञान सुदिनका । वार्ता देनेवाले अरुणका ।
उदय होता है वैराग्यका । उस समय ॥ ३ ॥
अथवा मानो वह आत्म-ज्ञान । हाथमें जिससे आता निधान ।
उस वैराग्यका है दिव्यांजन । आता है बुद्धिमें ॥ ४ ॥
ऐसी जो मोक्षकी योग्यता । सिद्ध होती है पांडुसुता ।
विहित कर्म जो करता । उसको सदैव ॥ ५ ॥
यह विहित कर्म जो अर्जुन । अपना मानो अनन्य जीवन ।
गुरु सर्वात्मकका है पूजन । श्रेष्ठ तम जो ॥ ६ ॥
या संपूर्ण भोग सह् जैसे । पतिव्रता रमती पतिसे ।
उसी क्रियाको कहते वैसे । किया सभी तप ॥ ७ ॥
या बालकको माताके बिन । दूसरा क्या है अन्य साधन ।
तभी है माताकी गोद मान । उसका धर्म ॥ ८ ॥
केवल पानी ही मान मीन । गंगाको नहीं तजके जान ।
पाता जैसे सभी तीर्थ स्थान । सागर सहज ॥ ९ ॥
वैसे है अपने जो विहित । उपाय स्मरनेसे सतत ।
ऐसे करता कि जगन्नाथ । मानले भार ॥ ९१० ॥
अजी ! जिसको जो विहित । ईश्वरका है मनोगत ।
मान करनेसे निभ्रांत । मिलता वह ॥ ११ ॥
अजी ! मनमें जो उतरती । दासी भी है स्वामिनी बनती ।
शीस देकर होती जो प्राप्ति । स्वामीकी कृपा ॥ १२ ॥
वैसे स्वामीका है मनोभाव । न चूकता है परम सेवा ।
यह छोड दूसरा पांडव । केवल वाणिज्य ॥ १३ ॥
७९१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विंदति मानवः ॥ ४६
मोक्षके लिये स्वधर्ममें आस्था अनिवार्य है—
तभी है विहित क्रिया करना । मानो ईश्वरकी आज्ञा पालना ।
जिससे प्राप्त हुवा है अर्जुन । आकार भूतोंको ॥ १४ ॥
टुकडोंसे जो अविद्याके । बनाकर गुड्डे उनके ।
खिलाता है तीन गुणोंके । अहंकार सूत्रसे ॥ १५ ॥
जिससे यह विश्व समस्त । अंतर्बाह्य संपूर्ण भरित ।
रहते हैं जैसे दीप जात । तेजसे वैसे ॥ १६ ॥
वह सर्वात्मक ईश्वर । स्वकर्म कुसुमसे वीर ।
पूजा जाता जब अपार । तोषता वह ॥ १७ ॥
तब है जैसी पूजासे । संतुष्ट आत्म-रामसे ।
मिलता अति प्रेमसे । वैराग्य-प्रसाद ॥ १८ ॥
उस वैराग्य-प्रसादके कारण । होता है सतत ईश-चिंतन ।
नहीं सुहाता अन्य कुछ मान । वमन है सारा ॥ १९ ॥
जैसे प्राणनाथके वियोगमें । वियोगिनी दुःख पाती जीनेमें ।
चुभते सारे सुख भोगनेमें । दुःख रूप ॥ १२० ॥
उदय न होते सम्यग्ज्ञान । ध्यानसे तन्मयता अर्जुन ।
आती है ऐसी योग्यता जान । बोधसे ही ॥ २१ ॥
इसीलिये जो मोक्ष-लाभार्थ । तनसे आचरता है व्रत ।
उसे स्वधर्ममें आस्था पार्थ । रखनी ही होगी ॥ २२ ॥
स्वधर्मसे नियत-कर्म स्वभावके दोषोंको दूर कहता है—
अजी है अपना जो स्वधर्म । आचरणमें यदि विषम ।
तो भी देखना है परिणाम । फळता जो ॥ २३ ॥
विस्तार जिसका विश्व प्रेरता प्राणिमात्र जो ।
उसको पूजके मोक्ष पाता स्वकर्म पुष्पसे ॥ ४६ ॥
ज्ञानेश्वरी ७९२
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४७ ॥
अपने हितके लिये सब । नीम है सुख दायक जब ।
उसके तीतापनसे तब । उक्तायें कैसे ॥ २४ ॥
फलनेसे प्रथम जैसे । आशा भंग होता केलेसे ।
इसीलिये उखाडनेसे । फल मिलेगा क्या ॥ २५ ॥
स्वधर्मका आचरण । करना जान कठिन ।
तजा तो मोक्ष अर्जुन । मिलेगा कहां ? ॥ २६ ॥
तथा अपनी जो माता । कुलटा होनेसे पार्था ।
तो भी होते हैं जीविता । स्नेह न होता टेढा ॥ २७ ॥
अथवा जो है परकीय । रंभासे सुंदर काय ।
उससे मिले क्या स्तन्य । बालकको कभी ॥ २८ ॥
अजी ! पानीसे भी बहुत । गुणमें उत्तम घृत ।
इससे कह मीन पार्थ । रहेगा क्या उसमें ॥ २९ ॥
विश्वको होता है जो विष । जंतुओंका वह पीयूष ।
तथा विश्वका गुड देख । विष है उनको ॥ ९३० ॥
इसीलिये है जो शास्त्र-विहित । कर्मसे खुलता भव अंकित ।
तभी कष्टदायक भी विहित । करना कर्म ॥ ३१ ॥
अपना विहित-कर्म तजकर । दूसरोंका भला जो अपनाकर ।
जैसे पैरोंसे चलना छोडकर । चलना सिरसे ॥ ३२ ॥
इसीलिये जो कर्म अपना । स्वभावसे मिला हुवा मान ।
करनेसे ही कर्म-बंधन । छूटता पार्थ ॥ ३३ ॥
तथा स्वधर्मको पालना । पर-धर्म जान तजना ।
यह नियम न पालना । उस समय ॥ ३४ ॥
हलका अपना धर्म भला है पर धर्मसे ।
जलता दोष जो कर्म नियुक्त जो स्वभावसे ॥ ४७ ॥
७९३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
जब न होता आत्मानुभव । कर्म नहीं छूटता पांडव ।
उन्हे भोगना दुःख सदैव । मिलता मात्र ॥ ३५ ॥
सहजं कर्म कौंतेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारंभा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥
प्रत्येक कर्म करते समय प्रारंभमें आयास होते हैं—
इसीलिये किसी भी कर्ममें । आयास होते हैं प्रारंभमें ।
तब कह तू क्या स्वधर्ममें । रहा दोष ॥ ३६ ॥
अजी ! सरल मार्ग चलना । पैरोंका यदि है थक जाना ।
तो घने जंगलमें घुसना । तब भी वही ॥ ३७ ॥
शिला या साथ लिया पाथेय । एक ही भार है धनंजय ।
विश्रांतिमें जो सुखका होय । लेना है वही ॥ ३८ ॥
वैसे तो दाना और भूसा । कूटनेमें श्रम एक-सा ।
पकानेमें श्वानका मांस । तथा हविष्यान्न ॥ ३९ ॥
दधि तथा जलका मंथन । व्यापार जैसा एक समान ।
बालू तथा तिलोंका पेरना । एक ही जैसा ॥ ९४० ॥
करनेमें नित्यका होम हवन । जलाके आग करना दहन ।
फूंकके धूम सहना है अर्जुन । एक जैसा ही ॥ ४१ ॥
धर्म-पत्नी या वारांगना । पोसनेमें कष्ट समान ।
वारांगना रुख करना । अन्याथ क्या दूसरा ॥ ४२ ॥
पीठमें लगके हथियार । आती जब मृत्यु धनुर्धर ।
तब सम्मुख हो लडकर । करना विक्रम ॥ ४३ ॥
अकुल की मारके भयसे । परगृहमें खाती है वैसे ।
अपने पतिको तजनेसे । मिला ही क्या अपना ॥ ४४ ॥
सहज प्राप्त जो कर्म न छोडना सदोष भी ।
दोष हैं सब कर्मोंमें जैसे हैं धूम आगमें ॥ ४८ ॥
ज्ञानेश्वरी ७९५
वैसे कमी कोई कर्म । नहीं होता बिना श्रम ।
तब है विहित कर्म । करना क्या बुरा ॥ ४५ ॥
लेनेसे जब अल्प अमृत । मिलता है अमर जीवित ।
तब सर्वस्व देनेमें पार्थ । जाता क्या अपना ॥ ४६ ॥
अजी ! क्यों मूल्य देकर । पीना विष खरीद कर ।
मरना आत्म-दाह कर । पड़ता है जो ॥ ४७ ॥
वैसे कष्ट देकर इंद्रियोंको । खर्च कर आयुष्यके दिनोंको ।
और क्या इकट्ठा किया पापको । दुःखके लिये ॥ ४८ ॥
इसलिये पालना स्वधर्म । पालनेसे दूर होते श्रम ।
तथा उचित देता परम- । पुरुषार्थ राज ॥ ४९ ॥
यह कारण है अर्जुन । स्वधर्मका ही आचरण ।
संकट समयमें स्मरण । सिद्ध मंत्रका जैसे ॥ ९५० ॥
या नांव जैसे समुद्रमें । दिव्यौषधि महारोगमें ।
तथा स्वधर्म जगतमें । नहीं भूलना ॥ ५१ ॥
फिर करना कपिध्वजा । स्वकर्मसे ही महापूजा ।
तुष्ट हो ईश तम रज । करेगा दूर ॥ ५२ ॥
शुद्ध सत्वकी है बाट । तथा अपनी उत्कंठा ।
भव स्वर्ग कालकूट । दिखांती ऐसे ॥ ५३ ॥
जिस वैराग्यके कहे लक्षण । यही पहले संसिद्धि लक्षण ।
वहां पहुंचना है विलक्षण । जिस स्थान पर ॥ ५४ ॥
इस भूमिकाको प्राप्त कर । साधक वैसे होता है फिर ।
सर्वत्र क्या पाना धनुर्धर । कहता हूं अब ॥ ५५ ॥
निर्मल स्नेह पक्व-फलकी भांति अलिप्त होता है—
देहादिक है संसारमें । तन ही पड़ा है फंदेमें ।
फंस भी न आता जालमें । वायु जैसे ॥ ५६ ॥
७९५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग'
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥
जैसे आता है पकताका काल । न डांड फल या फल डंटल ।
न धरता वैसे स्नेह निर्मल । होता है सर्वत्र ॥ ५७ ॥
पुत्र संपदा कलत्र । इससे होता स्वतंत्र ।
मेरा न कहता पात्र । विषका जैसे ॥ ५८ ॥
रहने दे यह विषय-मात्रसे । बुद्धि मुडती है पीछे चली जैसे ।
पीछे लौटकर एकांतमें ऐसे । रहती है हृदयमें ॥ ५९ ॥
ऐसे है उसका अंतःकरण । बाहर आनेसे डरता जान ।
राजाकी सौगंधसे लेके प्रण । न आती दासी जैसे ॥ १६० ॥
इस प्रकार जो चित्त । एकाग्र करके पार्थ ।
आत्म-चिंतनमें नित । लगाता है ॥ ६१ ॥
दृष्टादृष्ट कामना तब । जैसे नष्ट हो जाती हैं सब ।
आग राखमें दबती तब । धुंवा नहीं आता ॥ ६२ ॥
मन होता ऐसा अंतर्मुख । इच्छाएं नष्ट होती हैं देख ।
तब प्राप्त करता साधक । भूमिका ऐसी ॥ ६३ ॥
अनासक्त कर्मयोगीकी संन्यस्त अवस्था—
विपरीत ज्ञान संपूर्ण । नष्ट हो करके अर्जुन ।
ज्ञानमें ही अंतःकरण । होता है स्थिर ॥ ६४ ॥
संचित जैसे व्ययसे चुकता । वैसे प्राचीन भोगसे मिटता ।
नया क्रियमाण नहीं होता । किसी कर्मसे ॥ ६५ ॥
ऐसी जो कर्म-समय दशा । वहां बनती है वीरेशा ।
फिर श्रीगुरु आप ऐसा । मिल जाता है ॥ ६६ ॥
न कहीं रख आसक्ति जीतके मन निःस्पृह ।
नैष्कर्मकी महासिद्धि पाता संन्यास साधके ॥ ४९ ॥
ज्ञानेश्वरी ७९६
रातके जो चार प्रहर । होते ही मिटाके अंधार ।
आंखोंको दीखता भास्कर । उसी भांति ॥ ६७ ॥
अथवा आकर फलकी घौंद । करता केलेका बढ़ना बंद ।
श्रीगुरु मिल साधकको छंद । जगाते हैं मोक्षका ॥ ६८ ॥
चंद्र जो पूर्णिमासे आलिंगित । तजता जैसे सभी व्यंग पार्थ ।
वैसे उसको मिलती सतत । श्रीगुरुकी कृपा ॥ ६९ ॥
अज्ञान मात्र तब जो रहता । उस कृपासे है सभी मिटता ।
रजनी सहित है जैसे जाता । अंधार सारा ॥ ९७० ॥
अज्ञानके गर्भमें जैसे । कर्म कर्ता औ' कार्य ऐसे ।
यह त्रिपुटी रहनेसे । गर्भिणी ही मरी ॥ ७१ ॥
ऐसे अज्ञान नाशके साथ । नष्ट होते हैं सभी क्रिया जात ।
ऐसे समूल संभव पार्थ । होता संन्यास ॥ ७२ ॥
मूल अज्ञान संन्याससे ऐसे । दृश्यका स्थान ही मिट जानेसे ।
वहां जानना रहता है ऐसे । आत्मतत्व ॥ ७३ ॥
जगने पर जैसे अर्जुन । डूबे थे ऐसे स्थान ।
करना पड़ता क्या गमन । बचानेको ॥ ७४ ॥
जो न मैं जानता वह जानूंगा । ऐसा दुष्ट स्वप्न जब मिटेगा ।
ज्ञाता ज्ञान विरहित जो होगा । चिदाकाश केवल ॥ ७५ ॥
सुखाभास सह वह दर्पण । दूर करनेसे अर्जुन ।
रहता देखनेके बिन । देखनेवाला जो ॥ ७६ ॥
वैसे न जानना जो गया । साथ जानना भी ले गया ।
फिर निष्क्रिय रह गया । चिन्मात्रा ही ॥ ७७ ॥
स्वभावसे वहां धनंजय । न रही किसी भांतिकी क्रिया ।
इसीलिये वह कहा गया । नैष्कर्म्य ऐसा ॥ ७८ ॥
होता है जब वायुका लोप । उससे होता तरंग लोप ।
तब जैसे रहता है आप । समुद्र मात्र ॥ ७९ ॥
७९७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
ऐसे होना जब नहीं घड़ता । वह नैष्कर्म्य सिद्धि है कहाता ।
सभी सिद्धियोंमें यह जो होता । परम श्रेष्ठ ॥ ९८० ॥
मंदिरके कार्यमें कलश । गंगाकी सीमा सिंधु-प्रवेश ।
वैसे सुवर्ण-सिद्धिमें कस । सोलहवा अंतिम ॥ ८१ ॥
ऐसे अपना अज्ञान । मिटा देता जो वह ज्ञान ।
वह भी निगल अर्जुन । रहनेकी दशा ॥ ८२ ॥
इसके पर कुछ नहीं । पाना ऐसे रहता नहीं ।
इसीलिये कहना यही । परम-सिद्धि ॥ ८३ ॥
किंतु यही जो आत्म-सिद्धि । जैसे है कोई भाग्य-निधि ।
श्रीगुरुकृपा-उपलब्धि । होती तब मिलती ॥ ८४ ॥
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।
समासेनैव कौंतेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥ ५० ॥
ब्रह्मत्व-सिद्धिका विवेचन—
उदय होते ही दिनकर । प्रकाश ही होता है अंधार ।
अथवा दीप सह् कर्पूर । होता है दीप ॥ ८५ ॥
अथवा लवण-कणिका । मिलकर जैसे उदका ।
होती है आप भी उदक । उसी प्रकार ॥ ८६ ॥
या निद्रित होता है जागृत । स्वप्न सह् नींद होती व्यर्थ ।
तथा अपना रूप जागृत । पाना जैसे ॥ ८७ ॥
जिस किसीके सुदैवसे । श्रीगुरु-वाक्य श्रवणसे ।
द्वैत निगल स्थिरतासे । रहता स्ववृत्तिमें ॥ ८८ ॥
श्रवण वचनका मिलन । होते ही जैसे सुन अर्जुन ।
स्वयं-स्वरूप हो जाना मान । अपने आपमें ॥ ८९ ॥
मिला है सिद्धिमें ब्रह्म कैसे किस प्रकारसे ।
ज्ञानकी श्रेष्ठ जो निष्ठा अल्पमें कहता सुन ॥ ५० ॥
ज्ञानेश्वरी ७९८
उसको फिर कुछ करना । रहता क्या कह अर्जुन ।
आकाशको आना तथा जाना । रहता है क्या ॥ ९९० ॥
इसीलिये उसको कहीं । त्रिशुद्धि करना है नहीं ।
न हुवा ऐसे कुछ कहीं । उसके लिये ॥ ९१ ॥
उन्हे स्व-कर्मकी अग्निमें । काम्य निषेध ईंधनमें ।
रज तमको जलानेमें । करना प्रारंभ ॥ ९२ ॥
पुत्र वित्त तथा परलोक । इन तीनोंका जो अभिलाष ।
हुवा जैसे अपना सेवक । ऐसे होगा ॥ ९३ ॥
स्वैर इंद्रियोंमें सर्व-स्पर्शसे । आई हुई जिस मलिनतासे ।
मुक्त करनेमें प्रत्याहारसे । किया जाता स्नान ॥ ९४ ॥
तथा स्वधर्मका जो फल । ईश्वरार्पण करके बल ।
लेकर किया है गरल । वैषम्यका वह ॥ ९५ ॥
आत्म-साक्षात्कारमें ऐसे । ज्ञानका उत्कर्ष हो कैसे ।
इसकी सामग्री जो ऐसे । पाता है वह ॥ ९६ ॥
तथा है ऐसे ही समय । सद्गुरु मिले धनंजय ।
उसने ज्ञान-दान कार्य । सही किया तो भी ॥ ९७ ॥
वैराग्यका लाभ और श्रीगुरुके लोभसे अनुभव-अंकुर फूटता है-
औषध लेते ही तत्क्षण । रोगमें आयेगा क्या गुण ।
या सूर्योदयसे तत्क्षण । मध्यान्ह होगा क्या ॥ ९८ ॥
सुक्षेत्र तथा है जो तर । बोया बीज गला सुंदर ।
किंतु फल आनेमें देर । लगेगा ही ॥ ९९ ॥
चले मार्ग पर जो सरल । वहां मिला सत्संगका मेल ।
पहुंचने तक कुछ काल । लगेगा ही ॥ १००० ॥
ऐसे हुवा वैराग्यका लाभ । तथा मिला श्रीगुरुका लोभ ।
अंतःकरणमें फूटा कोंब । विवेकका ॥ १ ॥
७९९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग