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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 859

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥
ऐसे जो स्वाभाविक सशक्त । सहाय बिन उद्भट पार्थ ।
ऐसे श्रेष्ठ शौर्य विकसित । गुण है प्रथम ॥ ५७ ॥
तथा जैसे सूर्यका प्रताप । कोटि नक्षत्र करता लोप ।
किंतु उनसे न होता लोप । चंद्र सह भी वे हो तो ॥ ५८ ॥
ऐसे प्रौढ गुणमें पार्थ । विश्वको करता विस्मित ।
किंतु आप न विचलित । होता है कभी ॥ ५९ ॥
ऐसा प्रगल्भ रूप जो तेज । क्षात्र-धर्मका गुण है दूजा ।
इसी भांति धैर्य है सहज । गुण तीसरा ॥ ८६० ॥
टूट पडा भी यदि आकाश । बुद्धिकी आंखें कभी मानुस ।
मिटता नहीं है स-साहस । वही है धैर्य ॥ ६१ ॥
तथा पानी कितना ही गहरा होता । कमल ऊपर आकर ही खिलता ।
या आकाश किसीसे नहीं हारता । ऊंचाईमें कभी ॥ ६२ ॥
कैसी ही विवश अवस्था । जीवनमें पाकर पार्था ।
न छेदती प्रज्ञा सर्वथा । स्थिर बुद्धिकी ॥ ६३ ॥
ऐसी दक्षता है जो चोख । यह है चौथा गुण देख ।
तथा जूझ जो अलौकिक । गुण पांचवा ॥ ६४ ॥
जैसे सूर्यमुखीका पुष्पक । सदा सूर्यकी ओर उन्मुख ।
वैसे वह शत्रुके सन्मुख । होता है सदा ॥ ६५ ॥
यत्न-पूर्वक गर्भिणी जैसे । टालती है पुरुषको वैसे ।
समरमें पीठ दिखानेसे । बचता रहता ॥ ६६ ॥
क्षत्रियोंका यह आचार । पांचवा गुणेंद्र धनुर्धर ।
पुरुषार्थीके सिरपर । भक्ति है जैसे ॥ ६७ ॥
शौर्य धैर्य प्रजा रक्षा युद्धमें अपलायन ।
दातृत्व दक्षता तेज क्षात्र-धर्म स्वभावसे ॥ ४३ ॥
७८७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग