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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 858

जिस भांति माली संपन्न । जड़को सींचता अर्जुन ।
फलमें उसका दर्शन । करता है फिर ॥ ४४ ॥
वैसे शास्त्रानुसार आचरण । कर करना ईश्वर दर्शन ।
यही एक निश्चय अर्जुन । करना ज्ञान है ॥ ४५ ॥
ब्राह्मण कर्ममें ज्ञान । सातवा गुण है जान ।
विज्ञानका रूप सुन । कहता अब ॥ ४६ ॥
अंतःकरण शुद्धिके समय । शास्त्रका ध्यान बलसे विलय ।
ईश्वर तत्वमें होना निश्चय । बुद्धिका जान ॥ ४७ ॥
वास्तविक यह विज्ञान । आठवा है जो गुणरत्न ।
तथा आस्तिक्य भी सुन । गुण है नौवा ॥ ४८ ॥
राज-मुद्रा जिसके पास होती । जनता उसीको है मान देती ।
सच्छात्रोंसे जो भी स्वीकार होती । उसी राहको ॥ ४९ ॥
अति आदरसे जो मानता । उसीको मैं आस्तिक्य कहता ।
उसे नौवा गुण मैं कहता । इस स्थानपे ॥ ८५० ॥
ऐसे शमदमादिक । गुण हैं नौ निर्दोष ।
कर्म जान स्वाभाविक । ब्राह्मणके ये ॥ ५१ ॥
यह नौ गुण-रत्नाकर । या नवरत्नोंका है हार ।
प्रकाशको जैसे भास्कर । धारण करता ॥ ५२ ॥
या चंपक पुष्पसे चंपा पूजता । या चांदनीसे ही चंद्र उजलता ।
अथवा चंदन निजको चर्चिता । सौरभसे अपने ॥ ५३ ॥
नौ गुणोंका जड़ावू भूषण । धारण करता जो ब्राह्मण ।
कभी न छोड़ता तन मन । ब्राह्मणका उसे ॥ ५४ ॥
अब क्षत्रियको जो उचित । कर्म कहता तुझे निश्चित ।
बुद्धि सह तू देकर चित्त । सुन तू अब ॥ ५५ ॥
क्षत्रियोंका स्वभाव-धर्म—
तेजमें कभी किसीका भानु । सहाय न चाहता अर्जुन ।
शिकारीमें सिंह कभी न- । चाहता सहाय ॥ ५६ ॥
ज्ञानेश्वरी ७८६