ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 853, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंऐसे स्वानुभव विश्राम। वैराग्य-मूलका परिणाम ।
उस सुखको सात्विक नाम । दिया गया है ॥ ९३ ॥
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥
राजस सुखके लक्षण-
मिलती जब विषय इंद्रियां । छूता है जो सुख उस समय ।
दोनों किनारोंको हे धनंजय । उफानमें आकर ॥ ९४ ॥
अधिकारी आते जब गांव । होता है जब जैसा उत्सव ।
अथवा ऋण लेके विवाह । विस्तार होता ॥ ९५ ॥
या रोगीकी जीभमें जैसे । केला-बूरा भाता है वैसे ।
बचनाग पहले जैसे । लगता मीठा ॥ ९६ ॥
प्रवास-चौर्यके पहले मित्र । या हाट बातका कलत्र ।
होते उनके विनोद विचित्र । उसी प्रकार ॥ ९७ ॥
वैसे जो विषयेंद्रियोंका मिलन । करता जीवके सुखमें पोषण ।
फिर जैसे चट्टानको रत्न मान । मरता हंस जैसे ॥ ९८ ॥
वैसे खर्चके सारा उत्पन्न । मिटता जीवन संपन्न ।
क्षीण होता सुकृतका धन । जीवका सारा ॥ ९९ ॥
तथा जब सब भोग मिटता । तब वह मात्र स्वप्नसा होता ।
फिर केवल मात्र जो रहता । हानिका भार ॥ ८०० ॥
विपत्ति है ऐसे जो सुख । ऐहिक परिणाम देख ।
परमें बनके जो विष । उलटता है ॥ १ ॥
करनेसे लाड़ विषयोंके । जला करके खेत धर्मके ।
भोग किये नाना उत्सवके । विषयोंसे वहां ॥ २ ॥
पहला लगता मीठा अंतमें विष मारक ।
विषय योगसे पाती इंद्रियां सुख राजस ॥ ३८ ॥
७८१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग