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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 865

श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४७ ॥
अपने हितके लिये सब । नीम है सुख दायक जब ।
उसके तीतापनसे तब । उक्तायें कैसे ॥ २४ ॥
फलनेसे प्रथम जैसे । आशा भंग होता केलेसे ।
इसीलिये उखाडनेसे । फल मिलेगा क्या ॥ २५ ॥
स्वधर्मका आचरण । करना जान कठिन ।
तजा तो मोक्ष अर्जुन । मिलेगा कहां ? ॥ २६ ॥
तथा अपनी जो माता । कुलटा होनेसे पार्था ।
तो भी होते हैं जीविता । स्नेह न होता टेढा ॥ २७ ॥
अथवा जो है परकीय । रंभासे सुंदर काय ।
उससे मिले क्या स्तन्य । बालकको कभी ॥ २८ ॥
अजी ! पानीसे भी बहुत । गुणमें उत्तम घृत ।
इससे कह मीन पार्थ । रहेगा क्या उसमें ॥ २९ ॥
विश्वको होता है जो विष । जंतुओंका वह पीयूष ।
तथा विश्वका गुड देख । विष है उनको ॥ ९३० ॥
इसीलिये है जो शास्त्र-विहित । कर्मसे खुलता भव अंकित ।
तभी कष्टदायक भी विहित । करना कर्म ॥ ३१ ॥
अपना विहित-कर्म तजकर । दूसरोंका भला जो अपनाकर ।
जैसे पैरोंसे चलना छोडकर । चलना सिरसे ॥ ३२ ॥
इसीलिये जो कर्म अपना । स्वभावसे मिला हुवा मान ।
करनेसे ही कर्म-बंधन । छूटता पार्थ ॥ ३३ ॥
तथा स्वधर्मको पालना । पर-धर्म जान तजना ।
यह नियम न पालना । उस समय ॥ ३४ ॥

हलका अपना धर्म भला है पर धर्मसे ।
जलता दोष जो कर्म नियुक्त जो स्वभावसे ॥ ४७ ॥
७९३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग