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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 862

होता है यदि अपना ही रत्न । कराता जौहरीसे परीक्षण ।
वैसे शास्त्रानुसार निरीक्षण । करना कर्मका ॥ ८९ ॥
जैसे दृष्टि होती है अपने पास । दीपके बिन उपयोग न खास ।
या पथ नहीं जानने पर विशेष । जैसे हैं पैर ॥ ८९० ॥
तभी जो है वर्णानुसार । सहज होता अधिकार ।
आप हो शास्त्रोंसे गोचर । करता आप ॥ ९१ ॥
जो है घरकी ही धरोहर । दीप दिखाता है धनुर्धर ।
उठानेमें कह तू फिर । आलस कैसे ॥ ९२ ॥
स्वाभाविक ही जो पाया । शास्त्रोंसे सही कहा गया ।
विहित कर्म अपनाया । आचरणमें जो ॥ ९३ ॥
आलसको छोड़कर । फलाशाको तज कर ।
तन मन एक कर । देना आरंभमें ॥ ९४ ॥
प्रवाह-बद्ध होकर बहता । पानी भिन्न दिशामें नहीं जाता ।
वैसे ही शास्त्रोचित आचरता । अपना कर्म ॥ ९५ ॥
इस प्रकारसे जो पार्थ । स्वयं कर्म करता विहित ।
करता है मोक्ष-द्वार प्राप्त । इस ओरका ॥ ९६ ॥
अकरणीय और निषिद्ध । कर्मसे न रखना संबंध ।
तभी तो वह भव-बद्ध । नहीं होता ॥ ९७ ॥
शास्त्रोक्त निष्काम कर्मसे आत्म-ज्ञान मिलता है—
तथा काम्य-कर्मकी ओर । दृष्टिपात भी नहीं कर ।
स्वर्गका भी चंदन-द्वार । रोकता वह ॥ ९८ ॥
वैसे ही अन्य जो है नित्य-कर्म । फल-त्यागसे किये निष्काम ।
इसीलिये है मोक्षकी सीम । पायी उसने ॥ ९९ ॥
ऐसे शुभाशुभ संसार । तज कर जो धनुर्धर ।
वैराग्य मोक्ष-द्वार पर । आ के खडा हुवा ॥ ९०० ॥
ज्ञानेश्वरी ७९०