ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपातकोंमें तब आता बल । नरकमें देते हैं वे खल ।
उस सुखने किया है छल । अंतमें ऐसे ॥ ३ ॥
बछनाग विष है मधुर । किंतु अंतमें मारक क्रूर ।
वैसे पहले होता मधुर । अंतमें कटु ॥ ४ ॥
यह सुख निःसंदेह पार्थ । रजो गुणसे बना है सार्थ ।
इसीलिये न छूना सुखार्थ । इसका अंग ॥ ५ ॥
यदग्रे चानुबंधे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥
तामसिक सुखके लक्षण—
करके अपेयका पान । तथा अखाद्यका भोजन ।
और पर-स्त्री-सन्निधान । देता है जो सुख ॥ ६ ॥
या दूसरोंका कर संहार । और कर परस्वापहार ।
होता है सुखका अवतार । भाटोंके मुखसे ॥ ७ ॥
आलस्यमें होता जिसका पोषण । या निद्रामें होते हैं अनुभव जान ।
जिसका आद्यंत भुलाता अर्जुन । अपने पथको ॥ ८ ॥
जो कुछ है वह पार्थ । तामस मान यथार्थ ।
इसमें सुखकी बात । असंभाव्य ॥ ९ ॥
मूलमें कर्मके तीन प्रकार । इससे सुख भी तीन प्रकार ।
यह सब तुझे शास्त्रानुसार । कह दिया मैंने ॥ ८१० ॥
कर्ता कर्म तथा कर्म-फल । यह त्रिपुटि एक केवल ।
इसके बिना न सूक्ष्म-स्थूल । कुछ भी यहां ॥ ११ ॥
तथा यह जो त्रिपुटि । तीनों गुणोंमें किरीटी ।
बुनी गयी है जो पर्टी । तंतु समान ॥ १२ ॥
निद्रा प्रमाद आलस्य आत्माको घेरके सदा ।
आदि औ' अंतमें जो है भुलाता सुख तामस ॥ ३९ ॥
ज्ञानेश्वरी ७८२