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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 863

सकल भाग्यकी है जो सीमा । तथा है मोक्ष लाभकी प्रमा ।
विविध कर्ममागोंका श्रम । शांत होता यहां ॥ १ ॥
मोक्ष-फलका जो दिया हुवा ओल । अथवा सुकृत तरुका है फूल ।
वैराग्य कमल पर अलिकुल । बैठता जैसे ॥ २ ॥
जैसे आत्म-ज्ञान सुदिनका । वार्ता देनेवाले अरुणका ।
उदय होता है वैराग्यका । उस समय ॥ ३ ॥
अथवा मानो वह आत्म-ज्ञान । हाथमें जिससे आता निधान ।
उस वैराग्यका है दिव्यांजन । आता है बुद्धिमें ॥ ४ ॥
ऐसी जो मोक्षकी योग्यता । सिद्ध होती है पांडुसुता ।
विहित कर्म जो करता । उसको सदैव ॥ ५ ॥
यह विहित कर्म जो अर्जुन । अपना मानो अनन्य जीवन ।
गुरु सर्वात्मकका है पूजन । श्रेष्ठ तम जो ॥ ६ ॥
या संपूर्ण भोग सह् जैसे । पतिव्रता रमती पतिसे ।
उसी क्रियाको कहते वैसे । किया सभी तप ॥ ७ ॥
या बालकको माताके बिन । दूसरा क्या है अन्य साधन ।
तभी है माताकी गोद मान । उसका धर्म ॥ ८ ॥
केवल पानी ही मान मीन । गंगाको नहीं तजके जान ।
पाता जैसे सभी तीर्थ स्थान । सागर सहज ॥ ९ ॥
वैसे है अपने जो विहित । उपाय स्मरनेसे सतत ।
ऐसे करता कि जगन्नाथ । मानले भार ॥ ९१० ॥
अजी ! जिसको जो विहित । ईश्वरका है मनोगत ।
मान करनेसे निभ्रांत । मिलता वह ॥ ११ ॥
अजी ! मनमें जो उतरती । दासी भी है स्वामिनी बनती ।
शीस देकर होती जो प्राप्ति । स्वामीकी कृपा ॥ १२ ॥
वैसे स्वामीका है मनोभाव । न चूकता है परम सेवा ।
यह छोड दूसरा पांडव । केवल वाणिज्य ॥ १३ ॥
७९१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग