ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 855, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंन तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥
प्रकृतिके ये गुण सर्वव्यापी और सबको बंधनकारक हैं—
तभी जो प्रकृतिसे प्रकट होता । तथा सत्वादिकसे नहीं बंधता ।
स्वर्ग या मृत्यु लोकमें नहीं होता । ऐसा कुछ भी कहीं ॥ १३ ॥
उनके बिना कहीं कंबल । मृत्तिका बिन कर्दम गोल ।
अथवा जल बिन कल्लोल । होता है क्या ॥ १४ ॥
वैसे कहीं गुणके बिन । नहीं है सृष्टिकी रचना ।
ऐसे नहीं हुवा अर्जुन । प्राणिजातमें ॥ १५ ॥
इसीलिये यह सकल । तीन गुणोंसे है केवल ।
बनाया गया है अखिल । ऐसे जान ॥ १६ ॥
गुणोंसे देवोंके तीन प्रकार । तथा लोकके भी तीन आकार ।
गुणोंसे समाजको दिये चार । व्यापार वर्णके ॥ १७ ॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ४१ ॥
वर्ण-व्यवस्थाका आधार भी तीन गुण ही है—
वही जो चार वर्ण । पूछेगा तू कौन कौन ।
वहां जो मुख्य ब्राह्मण । आधार ही है ॥ १८ ॥
यहां जो क्षत्रिय वैश्य दोन । मानमें ब्राह्मणोंके समान ।
योग्य हैं वे वैदिक विधान । करनेमें जो ॥ १९ ॥
शूद्रका है चतुर्थ वर्ण । वेदसे नाता नहीं जान ।
तभी त्रिवर्णके आधीन । उसकी वृत्ति ॥ ८२० ॥
पृथ्वी पर यहां या तो देवोंमें स्वर्गमें कहीं ।
प्रकृतिके गुणोंमेंसे कोई भी छूटता नहीं ॥ ४० ॥
ब्राह्मणादिक वर्णोंका किया कर्म विभाजन ।
गुण है जिसके जैसे उनके अनुसारही ॥ ४१ ॥
७८३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग.