ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलगे हुए अपने फल फूल । देनेमें वृक्ष उदार सरल ।
अथवा देता जैसा परिमल । कमलवन ॥ ६८ ॥
जितना जो चाहता उतना । चंद्रका उसे चांदनी देना ।
वैसे चाहनेवालेको देना । इच्छानुसार ॥ ६९ ॥
ऐसा अपरमित दान । जहां है छटा गुण रत्न ।
तथा आज्ञाका एक स्थान । होता है सदा ॥ ८७० ॥
करके अवयवोंका पोषण । उनसे सेवा लेता अनुदिन ।
ऐसे करके प्रजानुरंजन । भोगना प्रजासुख ॥ ७१ ॥
उसका नाम है ईश्वर-भाव । सब सामर्थ्यका है वही ठाव ।
सब गुणोंमें यह महाराव । क्षत्रियोंके ॥ ७२ ॥
ऐसे हैं शौर्यादि सात गुण । जिससे हैं विशेष भूषण ।
सप्त ऋषीसे शोभता गगन । वैसे ही है यह ॥ ७३ ॥
सात गुणोंसे जो विचित्र । विश्वमें है कर्म पवित्र ।
यह जान सहज क्षात्र- । धर्म है क्षत्रियोंका ॥ ७४ ॥
ऐसे क्षत्रिय नहीं है नर । स्वत्व-स्वर्णका मेरु डोंगर ।
तमी है स्वर्गके वे आधार । गुण है सात ॥ ७५ ॥
अथवा जो सात गुणार्णव । घेरे हैं पृथ्वि सह वैभव ।
भोगता है क्षत्रिय पांडव । इस प्रकार ॥ ७६ ॥
अथवा है इस गुण-प्रवाहसे । क्रिया-गंगा उसके अंगमें जैसे ।
मिलके जगमें महा सागरसे । शोभती है ॥ ७७ ॥
किंतु यह रहने दे देख । शौर्यादिक जो हैं गुणात्मक ।
सात कर्म हैं जो स्वाभाविक । क्षत्रिय जनके ॥ ७८ ॥
अब जो वैश्यको उचित । गुण कहता जो निश्चित ।
उनको सुन अब पार्थ । ध्यान पूर्वक ॥ ७९ ॥
वैश्य तथा शूद्रोंका कर्म—
भूमि बीज और हल । इसका लेकर बल ।
जोड़ना लाभ अतुल । जिनका काम ॥ ८८० ॥
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