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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 856

वृत्तिका निकट संबंध । ब्राह्मणादिसे होता सिद्ध ।
उससे शूद्र जो प्रसिद्ध । हुवा चौथा ॥ २१ ॥
जैसे फूलोंके साथ ही साथ । सूत्रकी गंध लेते श्रीमंत ।
द्विज संग शूद्रको भी पार्थ । स्वीकारते वेद ॥ २२ ॥
ऐसी है अजी पार्था । चातुर्वर्ण्य व्यवस्था ।
दिखाऊं कर्म पथ । इसका मैं ॥ २३ ॥
जिन गुणोंसे ये वर्ण हैं चार । जन्म-मृत्यू कैंचीसे छूटकर ।
ईश्वरके निकट धनुर्धर । पहुंचेंगे ही ॥ २४ ॥
जिस आत्म-प्रकृतिने यहां । सत्वा दिक गुणोंमें है जहां ।
लोगोंको ये चार कर्म यहां । बांट दिये हैं ॥ २५ ॥
पिताने बांटा जैसे जो संचित धन । सूर्यने राहीको पथ दिखाया जान ।
या उनके कर्म सेवकोंको अर्जुन । दिखाये हैं स्वामीने ॥ २६ ॥
इस भांति प्रवृत्तिने गुण । फैलाकर किये चार वर्ण ।
कर्म रूपसे जान अर्जुन । किया विस्तार ॥ २७ ॥
यहां तू सत्व-गुणसे जान । कम अधिक मिश्रण बन ।
हुवा इन दोनोंका नियोजन । ब्राह्मण क्षत्रिय ॥ २८ ॥
तथा है जो रज सात्विक । उससे रचे वैश्य लोक ।
रज तम मिलाके देख । हुए शूद्र ॥ २९ ॥
ऐसा एकही प्राणि वृंद । किया चतुवर्ण भेद ।
सुन वह गुण प्रबुद्ध । पांडुकुमार ॥ ८३० ॥
किया आप रखा जो जैसे । दीप-ज्योत दिखाती जैसे ।
गुण भिन्न कर्म भी वैसे । दिखाते शास्त्र ॥ ३१ ॥
वैसे अब कौन कौन । वर्ण विहित लक्षण ।
कहता कर श्रवण । सौभाग्य निधि तू ॥ ३२ ॥
सर्वेंद्रियोंकी सभी प्रवृत्तियां । अपने हाथमें ले धनंजया ।
बुद्धि मिलती है आत्मासे प्रिया । पतिव्रता जैसे ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ७८४