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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 861

कृषिगोरक्षवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥
अथवा कृषिसे है जीना । गोधनकी रक्षा करना ।
अधिक मूल्यमें बेचना । स्वस्त वस्तु ॥ ८१ ॥
इतना ही है धनंजय । वैश्य-कर्मका समुदाय ।
वैश्यका गुण-समुच्चय । इतना जान ॥ ८२ ॥
तथा वैश्य क्षत्रिय ब्राह्मण । द्विजन्मके हैं ये तीनों वर्ण ।
इन सबका जो शुश्रूषण । कर्म है शूद्रका ॥ ८३ ॥
द्विज-सुश्रूषासे पर । शूद्र कर्म ना यहांपर ।
वर्णोचित है धनुर्धर । दिखाये कर्म ॥ ८४ ॥
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विंदति तच्छृणु ॥ ४५ ॥
वर्णानुसार सहज कर्म ही अधिकार है—
भिन्न भिन्न वर्णोंको उचित । कर्म इसी प्रकार हैं पार्थ ।
जैसे इंद्रियोंको है उचित । शब्दादिक विषय ॥ ८५ ॥
अथवा मेघसे जो चूता । पानीको उचित सरिता ।
सरिताको है पांडुसुता । उचित है सिंधु ॥ ८६ ॥
वर्णाश्रम वश जैसे । करणीय कार्य ऐसे ।
गोरेकी गौरता जैसे । होती स्वाभाविक ॥ ८७ ॥
वह है जो स्वाभाविक कर्म । शास्त्रानुसार ही वीरोत्तम ।
करनेमें ही उत्कट प्रेम । ऐसे रहता ॥ ८८ ॥
खेती व्यापार गोरक्षा वैश्यकर्म स्वभावसे ।
करना प्राप्त सेवा जो शूद्र-कर्म स्वभावसे ॥ ४४ ॥
जो है स्व-कर्ममें दक्ष पाता है मोक्ष निश्चित ।
मोक्ष कैसा सुनो पाता स्वकर्म दक्ष जो नर ॥ ४५ ॥
७८९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग