ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥
जैसे आता है पकताका काल । न डांड फल या फल डंटल ।
न धरता वैसे स्नेह निर्मल । होता है सर्वत्र ॥ ५७ ॥
पुत्र संपदा कलत्र । इससे होता स्वतंत्र ।
मेरा न कहता पात्र । विषका जैसे ॥ ५८ ॥
रहने दे यह विषय-मात्रसे । बुद्धि मुडती है पीछे चली जैसे ।
पीछे लौटकर एकांतमें ऐसे । रहती है हृदयमें ॥ ५९ ॥
ऐसे है उसका अंतःकरण । बाहर आनेसे डरता जान ।
राजाकी सौगंधसे लेके प्रण । न आती दासी जैसे ॥ १६० ॥
इस प्रकार जो चित्त । एकाग्र करके पार्थ ।
आत्म-चिंतनमें नित । लगाता है ॥ ६१ ॥
दृष्टादृष्ट कामना तब । जैसे नष्ट हो जाती हैं सब ।
आग राखमें दबती तब । धुंवा नहीं आता ॥ ६२ ॥
मन होता ऐसा अंतर्मुख । इच्छाएं नष्ट होती हैं देख ।
तब प्राप्त करता साधक । भूमिका ऐसी ॥ ६३ ॥
अनासक्त कर्मयोगीकी संन्यस्त अवस्था—
विपरीत ज्ञान संपूर्ण । नष्ट हो करके अर्जुन ।
ज्ञानमें ही अंतःकरण । होता है स्थिर ॥ ६४ ॥
संचित जैसे व्ययसे चुकता । वैसे प्राचीन भोगसे मिटता ।
नया क्रियमाण नहीं होता । किसी कर्मसे ॥ ६५ ॥
ऐसी जो कर्म-समय दशा । वहां बनती है वीरेशा ।
फिर श्रीगुरु आप ऐसा । मिल जाता है ॥ ६६ ॥
न कहीं रख आसक्ति जीतके मन निःस्पृह ।
नैष्कर्मकी महासिद्धि पाता संन्यास साधके ॥ ४९ ॥
ज्ञानेश्वरी ७९६