ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पेटमें सोते तम-रज । उसमें आया आप-तेज
उससे सहज स्वेदज । उत्पन्न होते ॥ १०० ॥
आप पृथ्वी उत्कट । तम-मात्र निकृष्ट ।
स्थिर होता प्रकट । उद्बीज रूप ॥ १ ॥
पांच ही जब एकत्र होते । मन-बुद्धि साथ पाते ।
जारजका हेतु बनते । तब ये पार्थ ॥ २ ॥
ब्रह्मांडका पूर्ण रूप—
ऐसे ये चार सरल । कर चरण तल ।
महा-प्रकृति मूल । बनता शिर ॥ ३ ॥
प्रवृत्ति उसका पेट । निवृत्ति सरल पीट ।
सुर-योनि अंग आठ । उर्ध्व भागके ॥ ४ ॥
कंठ उल्हसित स्वर्ग । मृत्यु-लोक मध्य-अंग ।
पाताल है अधो-भाग । त्रिलोकका ॥ ५ ॥
ऐसा बालक एक । जन्म दिया है देख ।
जिसके तीनों लोक । है विकास ॥ ६ ॥
चौरासी लक्ष जो योनी । इसके जोडोंके मणी ।
बढता है क्षण-क्षण । यह बालक ॥ ७ ॥
शरीरके सभी अंग पर । डालती नामके अलंकार ।
बढाती मोह-स्तन्य देकर । नित्य-नवीन ॥ ८ ॥
नाना सृष्टि इस बालककी । उंगलियां कर-चरणकी ।
भिन्नाभिमान उंगुलियोंकी । मुंदरियां अनेक ॥ ९ ॥
इकलौता यह चराचर । अविचारित अति सुंदर ।
बालकको जो जन्म-देकर । बनी महान ॥ ११० ॥
ब्रह्मा इसका प्रातःकाल । विष्णु रहा मध्यान्ह काल ।
सदाशिव है सायंकाल । इस बालकका ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी ५४०
महा-प्रलय शैय्यापर सोता । जब यह खेल करके आता ।
कल्पोदयमें यह है उठता । विषम-ज्ञानसे ॥ १२ ॥
इस प्रकार अर्जुन । मिथ्या दृष्टिका सदन ।
युगानुवृत्ति चरण । रखता स-कौतुक ॥ १३ ॥
संकल्प है इसका इष्ट । अहंकार साथी विनट ।
इसका अंत है निकट । आता ज्ञानसे ॥ १४ ॥
रहने दो बखान बहुत । यह विश्व है मायासे जात ।
मेरी सत्ता है आधारभूत । इस कार्यमें ॥ १५ ॥
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥
इस दृश्यमान विश्वमें भी मैं ओतप्रोत भरा हूं—
इसीलिये मैं पिता । महद्ब्रह्म है माता ।
आपत्य पांडुसुता । जगडंबर ॥ १६ ॥
शरीर है सो अब बहुत । देखके चित्तमें न हो द्वैत ।
मन बुद्धि आदि जो हैं भूत । एक ही यहां ॥ १७ ॥
जैसे शरीरमें एक । अवयव होते अनेक ।
कैसे विचित्र विश्व देख । एक ही यहां ॥ १८ ॥
ऊंची नीची विविध प्रकार । होती डालियां विविध आकार ।
होता है उसका जो आधार । बीज एक ॥ १९ ॥
संबंध है वह भी कैसा । घट माटीका पुत्र जैसा ।
या कपासका पुत्र जैसा । वस्त्रत्व होता है ॥ १२० ॥
अनेक लहरोंकी परंपरा । सिंधु-संतति जिस प्रकार ।
सब चराचरका औ' हमारा । संबंध भी ऐसा ॥ २१ ॥
किसी भी योनिमें मूर्ति जन्मती है कहीं कभी ।
उन्हें प्रकृति है माता पिता मैं बीज रोपता ॥ ४ ॥
५४१ गुण-निस्तारयोग
तभी है अग्नि और ज्वाल । दोनों ही हैं अग्नि केवल ।
उसी भांति मेरा है सकल । संबंध वैसा ॥ २२ ॥
निर्मित जगसे यदि मैं छिपता । तब जगत्वसे है कौन दीखता ।
मानव-तेजसे क्या छिपता । कभी माणिक्य ॥ २३ ॥
जब अलंकारका रूप लिया । तब क्या उसका स्वर्णत्व गया ।
या मानो कमल खिल गया । मिटा क्या कमलत्व ॥ २४ ॥
अभी कह यह तू पार्थ । अवयवसे आच्छादित ।
या उसीसे है प्रकटित । अवयवी यहां ॥ २५ ॥
अविमें बोया गया एक दाना । बढ़कर होता है बहुगुना ।
या व्यर्थ गया है वह अर्जुन । उसी प्रकार ॥ २६ ॥
तभी विश्वके उस पार । देखना पट कर दूर ।
तब सर्वत्र धनुर्धर । केवल मैं हूं ॥ २७ ॥
तू यह साक्षात्कार । सदा हृदयमें भर ।
दृढ़तासे तू आदर । जीवनमें इसे ॥ २८ ॥
जब मैं मुझमें प्रकाशता । देहमें भिन्न दीखता ।
तब मैं गुणोंसे बंधा जाता । दीखता ऐसे ॥ २९ ॥
स्वप्नमें आप ही कल्पनासे । आत्म-मरण जगाते जैसे ।
तथा आप ही भोगते जैसे । पांडुकुमार ॥ १३० ॥
कामलमें जैसे नयन । करके पीला प्रकाशन ।
देते हैं कामलका ज्ञान । उनको ही ॥ ३१ ॥
अथवा सूर्यका प्रकाश । कराता बादलका भास ।
लोपसे देता है प्रकाश । सूर्य ही तब ॥ ३२ ॥
आनेसे ही जन्म जिसका । छाया होती कारण भयका ।
किंतु अपनेसे है छायाका । सदा अभिन्नत्व ॥ ३३ ॥
वैसे करके प्रकाशन । अनेक देहमें समान ।
दिखाता गुणका बंधन । वह मैं ही ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी ५४२
बंध क्यों नहीं बांधता । मुझे मैं सही जानता ।
अज्ञान कारण होता । बंधका वहां ॥ ३५ ॥
मुझको ये बंधन ऐसे । किन गुणसे दीखे वैसे ।
कहता हूं शांत चित्तसे । सुन तू इसको ॥ ३६ ॥
सत्व रज तम इन तीन गुणोंके कारण पुनर्जन्म होता है—
कितने गुण है या धर्म । उसका क्या रूप औ' नाम ।
कहां हुए इसका मर्म । कहता हूं सुन ॥ ३७ ॥
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५ ॥
सुन सत्व रज तम । यहां तीनोंके ये नाम ।
तथा प्रकृतिसे जन्म । पाते हैं ये ॥ ३८ ॥
यहां है सत्व उत्तम । तथा रज है मध्यम ।
तीनोंमें है यह तम । कनिष्ट सहज ॥ ३९ ॥
जैसे एक ही शरीरमें तीन । अवस्थायें होती हैं भासमान ।
एक अंतःकरणमें त्रिगुण । होते हैं भास ॥ १४० ॥
जैसे जैसे कस-हीन । होता सोनेमें मिलन ।
बढ़ स्वर्णका वजन । होता अवमूल्य ॥ ४१ ॥
सावधानता जैसे जैसे । दूर होती है आलससे ।
जकड़ती है निद्रा वैसे । दृढ मूल हो ॥ ४२ ॥
अज्ञान अंगीकार कर । उठती है वृत्ति ऊपर ।
वह है सत्व रज द्वारा । तममें भी जाती ॥ ४३ ॥
यह तू जान अर्जुन । इनका नाम है गुण ।
अब करना दर्शन । बद्धताका ॥ ४४ ॥
प्रकृतिसे बने हैं ये गुण सत्व रजस्तम ।
वे निर्विकार आत्माको जोतते मान देहमें ॥ ५ ॥
५४३ गुण-निस्तारयोग
जब क्षेत्रज्ञ-दशा । आत्मा छू लेता जैसा ।
यह देह मैं ऐसा । कहने लगता ॥ ४५ ॥
जन्मसे मरण पर्यंत । देहके धर्ममें समस्त ।
यह जो ममत्वका है सूत । पिरोता है ॥ ४६ ॥
मीनके मुखमें जैसे । अमिष पहुंचनेसे ।
झटका देता कांटेसे । जल पारधी ॥ ४७ ॥
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ ॥ ६ ॥
गुणोंके लक्षण, सत्व गुण—
तभी है जो लुब्धक । सुख-ज्ञानका पाश फेंक ।
खींचता है मृग-शावक । सुख-ज्ञानमें ॥ ४८ ॥
ज्ञानसे फिर तडपता । विद्वताके पैर झाडता ।
आत्म-सुखको है गंवाता । अपने ही हाथसे ॥ ४९ ॥
विद्या-मानसे तब तोषता । किसी लाभ-मात्रसे हर्षाता ।
स्व-संतोषमें धन्य मानता । अपने आप ॥ १५० ॥
कहता भाग्य है मेरा । नहीं है ऐसा दूसरा ।
विकाराष्टकसे भरा । फूलता वह ॥ ५१ ॥
मानो इतना नहीं पूरा । बंधन लगे दूसरा ।
विद्वत्ताका भूत संवार । चढता सिरपे ॥ ५२ ॥
मैं हूं स्वयं ज्ञान-स्वरूप । खोनेका दुःख ना अमाप ।
विषय-ज्ञान-लीन आप । चढा गगन ॥ ५३ ॥
जैसे राजा स्वप्नमें । रंक बन भिक्षामें ।
दाना पाके सुखमें । मानता इंद्र ॥ ५४ ॥
इनमें शुचि जो सत्व ज्ञान आरोग्य दायक ।
सुखी मैं और मैं ज्ञानी इससे बांधता नित ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ५४४
वैसे वह देहातीत । बनकर देहवंत ।
बहलता पांडुसुत । बाह्य-ज्ञानसे ॥ ५५ ॥
प्रवृत्ति-शास्त्र सूझता । यज्ञ-ज्ञान जूझता ।
स्वर्ग भी है दीखता । और क्या रहा ॥ ५६ ॥
मैं हूं महा-ज्ञानवान । मुझसे नहीं विद्वान ।
मेरा चित्त है गगन । या सूर्य-चंद्रका ॥ ५७ ॥
ऐसे ही सत्व-सुख-ज्ञानका । जीवमें लगे बागडोरका ।
बलसे देता जाता झटका । जुते हुये बैलकासा ॥ ५८ ॥
ऐसे ही यह रजो गुणसे । शरीरमें बंधा जाता कैसे ।
कहता हूं मैं तू सुन इसे । पांडुकुमार ॥ ५९ ॥
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम् ॥ ७ ॥
रजोगुणके लक्षण—
तभी यह रज कहलाता । जीवनका रंजन जानता ।
यौवन नित बना रहता । अभिलाषाका ॥ १६० ॥
रजका जब स्पर्श होता । जीव काम-मदमें आता ।
हवा पर सवार होता । चिंतनके यह ॥ ६१ ॥
अग्नि-कुंडमें घृत सिंचन किया । विद्युताग्निने उसका साथ दिया
कहो अधिक कम क्या रह गया । कहेंगे तब ॥ ६२ ॥
इच्छा दाह तब भडकता । क्लेश-सह मधुर लगता ।
इंद्रैश्वर्य भी ओछा लगता । ऐसे समय ॥ ६३ ॥
इच्छा दाह अब बढता । मेरु भी हाथमें लगता ।
फिर भी वह है चाहता । और भी बडा ॥ ६४ ॥
रज है वासना-रूप तृष्णा आसक्ति-वर्धक ।
आत्माको कर्मके साथ बांधता बल-पूर्वक ॥ ७ ॥
५४५ गुण-निस्तारयोग
(69)
खर्च किया आज ऐसा । कलका चलेगा कैसा ।
इससे बहु बडा-सा । करेगा उद्यम ॥ ६५ ॥
दमडी पर जीवन । दे करके बलिदान ।
कमाकर एक तृण । मानता धन्य ॥ ६६ ॥
कहता स्वर्गपे जाना । सोचता कहां क्या खाना ।
यज्ञानुष्ठान करना । इसीलिये ॥ ६७ ॥
सदा व्रत पर व्रत । करता इष्ट प्राप्त्यर्थ ।
कभी कामना रहित । न करता कुछ ॥ ६८ ॥
जैसा है ग्रीष्मका पवन । न ही जानता शांति-क्षण ।
रहता वह निशिदिन । ऊधमग्रस्त ॥ ६९ ॥
होता है चंचल मीन । या कामिनी कटाक्ष समान ।
या बिजलीकी गति मान । रहता प्रवृत्तिमें ॥ १७० ॥
चाहता इसी वेगसे । संसार स्वर्ग भी वैसे ।
क्रियाकी आगमें वैसे । घुसता वह ॥ ७१ ॥
देहमें या देहसे भिन्न । तृष्णा श्रृंखलाके बंधन ।
सदा उपद्रुव्याप विभिन्न । गलेमें व्यापारके ॥ ७२ ॥
रजो गुणका यह दारुण । देहमें देहीके है बंधन ।
सुन तू अब कथा अर्जुन । तमो गुणकी ॥ ७३ ॥
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥ ८ ॥
तमोगुणके लक्षण-
व्यवहारके जो नयन । बंद होते जिससे जान ।
मोह-रात्रीके हैं जो घन । काले अतिशय ॥ ७४ ॥
मोहता तम देहीको अज्ञानको बढाकर ।
निद्रा प्रमाद आलस्य इससे घेर बांधता ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ५४६
उसकी प्रीति अज्ञानसे । केवल इसी कारणसे ।
भ्रमग्रस्त होकर जैसे । नाचता जीव ॥ ७५ ॥
अविवेक महा-मंत्र । मूढता मद्य-पात्र ।
इसका है मोहनास्त्र । जीवोंके लिये ॥ ७६ ॥
अर्जुन यह है तम । इसका है यह मर्म ।
बांधता देह ही आत्म । इस अज्ञानसे ॥ ७७ ॥
ऐसा ही है सब शरीर । मानता सब चराचर ।
तम बिन अन्य विचार । नहीं है जान ॥ ७८ ॥
सब इंद्रियोंमें जाड्य । मनमें भरा है मौढ्य ।
दोनोंमें हुवा है धाढर्य । आलस्यका ॥ ७९ ॥
अंगअंग मोडता रहता । किसी काममें नहीं आता ।
उबासियां लेता रहता । प्रति क्षण ॥ १८० ॥
खुले रख भी नयन । नहीं देखता अर्जुन ।
कोई बात भी न सुन । जी ! कह उठता ॥ ८१ ॥
पत्थरसा पडा ही रहता । हिलनेकी बात न करता ।
सदा कुंडली मार बैठता । उठता नहीं ॥ ८२ ॥
धरणी धंसती है पताल । गगन गिरता धरातल ।
किंतु उठना भी है केवल । उसको नहीं भाता ॥ ८३ ॥
यह उचित या अनुचित । प्रश्न नहीं करता है चित्त ।
पडा रहना मात्र सतत । जानती बुद्धि ॥ ८४ ॥
उठाके अपने करतल । उससे पकडकर गाल ।
घुटनोंमें सिकुड सकल । बैठा रहता ॥ ८५ ॥
सोनेमें करता है मन । नींदको स्वर्ग सुख मान ।
अन्य सब तुच्छ अर्जुन । कहता आप ॥ ८६ ॥
करके ब्रह्मायु प्राप्त । सोया रहता सतत ।
दूसरी कुछ भी बात । नहीं मनमें ॥ ८७ ॥
५४७ गुण-निस्तारयोग
राह चलते भी यदि गिरता । वहींपे खर्राटे भरता ।
अमृत मिला तो भी नहीं पीता । जब आती नींद ॥ ८८ ॥
वैसे भी कभी क्रोशावेशमें । निकले कभी किसी व्यापारमें ।
निकलता जैसे अंधा क्रोधमें । उसी भांति ॥ ८९ ॥
कब कैसे बरतना । किससे कैसे बोलना ।
साध्य असाध्यका ज्ञान । न होता उसे ॥ १९० ॥
संपूर्ण अग्नि-तेज जैसे । पोंछने अपने पंखसे ।
उड़ता है पतंग वैसे । पांडुकुमार ॥ ९१ ॥
ऐसे ही काम उसे रुचता । जो न करना वही है भाता ।
वैसे वह करता रहता । प्रमाद-साहस ॥ ९२ ॥
एवं निद्रा-आलस्य-प्रमाद । तमके रूप हैं त्रिविध ।
निरुपाधिकके होते बंध । धनंजय ॥ ९३ ॥
आगसे जब घिरता काठ । तब दीखता आगसा काठ ।
या आकाशको घिरता घट । कहलाता घटाकाश ॥ ९४ ॥
पानीसे जब ताल भरता । चन्द्र-बिंब उसमें भासता ।
वैसे गुणमें भी भास होता । आत्म-तत्वका ॥ ९५ ॥
सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥ ९ ॥
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १० ॥
सुखमें जोडता सत्त्व कर्ममें जोडता रज ।
ढकके ज्ञान संपूर्ण भ्रममें डालता तम ॥ ९ ॥
जीतके अन्य दोनोंको तीसरा करता बल ।
ऐसा कभी बढे सत्त्व कभी रज कभी तम ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी ५४८
तीनों गुण समय समय पर बदलते रहते हैं—
पीछे कर कफ वात । आगे आता जब पित्त ।
होता है तब संतप्त । जिस भांति ॥ ९६ ॥
आतप वर्षाको जीतकर । प्रकट होता शीत-लहर ।
आकाश तब जिस प्रकार । होता है शीत ॥ ९७ ॥
अथवा नाना स्वप्न-जागृति । मिटके आती सुषुप्ति ।
क्षण भर चित्त-वृत्ति । होती जैसे ॥ ९८ ॥
वैसे रज-तमको पराजित । करके सत्व होता प्रकाशित ।
जीव कहता है हो प्रमुदित । सुखी हूं मैं ॥ ९९ ॥
वैसे ही जब सत्व और रज । मिटाकर होता तमका राज ।
प्रवृत्ति होती है तब सहज । प्रमादकी ॥ २०० ॥
उसी भांति पांडुकुमार । सत्व-तमको हटाकर ।
उठाता है अपना शिर । रजोगुण ॥ १ ॥
कर्मके बिन अन्य कहीं । सुंदर कुछ भी है नहीं ।
इस भांति मानता देही । शरीरस्थ ॥ २ ॥
त्रिगुण वृद्धिका निरूपण । किया हैं श्लोकोंमें यहां तीन ।
सत्वादि गुण-वृद्धि लक्षण । सुनो अब ॥ ३ ॥
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ ११ ॥
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२ ॥
प्रज्ञाका इंद्रियों-द्वारा प्रकाश सब ओर जो ।
देहमें फैलता सारा जानना सत्व है बढ़ा ॥ ११ ॥
प्रवृत्ति लालसा लोभ कर्मारंभ अशांतता ।
फैलाव देहमें होता जानना तम है बढ़ा ॥ १२ ॥
५४९ गुण-निस्तारयोग
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३ ॥
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥
सत्त्वस्थके स्वभाव-धर्म—
रज-तम पर पा विजय । सत्व करता देहपे राज्य ।
तब जो लक्षण धनंजय । दीखते वह सुन ॥ ४ ॥
प्रतिभा मानो शरीरके अंदर । न समानेसे छलकती बाहर ।
सुगंध जैसे महकती बाहर । वसंतमें कमलसे ॥ ५ ॥
जैसे सभी इन्द्रियोंके अंगनमें । खडा होता विवेक दास रूपमें ।
उगती हैं आंखें कर-चरणमें । उसके पार्थ ॥ ६ ॥
राजहंसके सम्मुख । रखनेसे क्षीरोदक ।
उसकी चोंचकी नोक । करता न्याय ॥ ७ ॥
वैसे दोषादोष विवेक । करती हैं इन्द्रियां देख ।
बनके रहता सेवक । निग्रह वहां ॥ ८ ॥
सुनते नहीं अश्रव्य कान । न देखते कु-दृश्य नयन ।
न बोलती अवाच्य वचन । वाणी जैसे ॥ ९ ॥
प्रमाद मोह अंधार आलस्य सब ओरसे ।
फैलाव देहमें होता जानना तम है बढ़ा ॥ १३ ॥
तजता देहको देही बढता सत्व है जब ।
जन्मता शुभ लोगोंमें सज्जनोंके समाजमें ॥ १४ ॥
रजमें लीन होता जो जन्मता कर्म-किसमें ।
डूबता तममें सारा जन्मता मूढ-योनिमें ॥ १५ ॥
ज्ञानेश्वरी ५५०
दीपकके सम्मुख अंधार । भागते जाता जैसे सत्वर ।
नहीं आते निषिद्ध आचार । इन्द्रियोंके सम्मुख ॥ २१० ॥
अजी ! वर्षा-ऋतुमें जैसे । नदियां उमड़ती वैसे ।
फैल जाती है बुद्धि वैसे । सब शास्त्रोंमें ॥ ११ ॥
जैसे पूर्णमासीका दिवस । चांदनीसे भरता आकाश ।
शास्त्रमें फैलती तत्सदृश । वृत्ति सदैव ॥ १२ ॥
एकत्र होती वासना । प्रवृत्तिका संयमन ।
विषयों परसे मन । हठ जाता है ॥ १३ ॥
जब सत्व बढता । यह चिन्ह दीखता ।
यदि निधन होता । ऐसे समय ॥ १४ ॥
जैसे है घरकी संपत्ति । वैसे औदार्य धैर्य-वृत्ति ।
तब इह परमें कीर्ति । क्यों न फैलेगी ॥ १५ ॥
अथवा आया है अति सुकाल । चला संतर्पण अति-मंगल ।
अतिथि आप्त आया उसी पल । कहना क्या तब ॥ १६ ॥
इससे क्या है तब सुंदर । वैसे सत्वमें जाना शरीर ।
सत्व-स्वभावको छोड और । जायेगा कहां ॥ १७ ॥
सत्व-गुणमें जो उद्भट । तज सत्व-गुण श्रेष्ठ ।
चलता है छोडके कोपट । भोग-क्षम जो ॥ १८ ॥
अकस्मात जो ऐसा मरता । सत्वका ही नया बनता ।
या ज्ञानियोंमें जन्म लेता । यह निश्चय ॥ १९ ॥
कह तू यह धनुर्धर । राजा राजत्वमें डोंगर ।
चढता है तब अधूरा । होता है क्या ॥ २२० ॥
अथवा यहांका जो दिया । पडोसके गांवमें गया ।
वहां पर क्या धनंजय । न रहता दीप ॥ २१ ॥
वैसी यह सत्व-शुद्धि । होती ज्ञान सह वृद्धि ।
तैरने लगती बुद्धि । विवेक पर ॥ २२ ॥
५५१ गुण-निस्तारयोग
महदादिककी परंपरा । विचार कर तदनंतर ।
विलीन हो जाते स-विचार । उसके उदरमें ॥ २३ ॥
छत्तीसमें सैंतीसवां । चौबीसमें पच्चीसवां ।
तीनों पर स्वभाव । चौदह जिसका ॥ २४ ॥
ऐसा सर्व जो सर्वोत्तम । होता है जिसको सुगम ।
ऐसे कुलमें निरुपम । मिलता है देह ॥ २५ ॥
रजोगुणीका स्वभाव-धर्म-
इसी भांति हे तू देख । सत्व तम अधोमुख ।
तथा होता ऊर्ध्व-मुख । जब रजोगुण ॥ २६ ॥
तब वह अपने कार्यका पार्थ । शरीर-ग्राममें है धूम मचाता ।
देहमें तब लक्षणोंका करता । उदय ऐसा ॥ २७ ॥
अजी ! फैला हुवा बवंडर । करता है वस्तुओंका ढेर ।
वैसे होता विषयोंका ठौर । वह देह ॥ २८ ॥
प्रसंग जैसे पर-दारादिकका । न सोचता शास्त्र-विरुद्ध होनेका ।
इंद्रियोंको देता चारा विषयोंका । भेडोंके समान ॥ २९ ॥
यहां तक होता इनका लोभ । स्वैर वृत्तिका रहता सदा रोभ ।
लूटनेमें अशक्य जो अलाभ । इन लोगोंका ॥ २३० ॥
आता जब उद्यमका प्रसंग । नहीं लेता है कभी पीछे पग ।
बढाती है प्रवृत्ति पग-पग । अपनी सदैव ॥ ३१ ॥
या खडा करना कोई प्रासाद । या करना है यज्ञ-अश्वमेध ।
ऐसे होते मनमें बडे छंद । उसके सदैव ॥ ३२ ॥
नगरोंको रचाना । जलाशय बांधना ।
महावन लगाना । नानाविध ॥ ३३ ॥
ऐसे ऐसे महान कर्म । समारोहोंका उपक्रम ।
इस परके सभी काम- । भोग करना मेरे ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी ५५२
महा-सागर भी खायेगा मात । अग्नि भी होगा पूरा पराजित ।
बढती है इतनी असीमित । अभिलाषा उसकी ॥ ३५ ॥
आशा जो बढती जाती । मनके आगे दौडती ।
विश्वको भी जो गिनती । पद्-तलमें ॥ ३६ ॥
बढता है रज जब । दीखते ये चिन्ह सब ।
शरीर पडता तब । यदि इसका ॥ ३७ ॥
यह सब होते जहां । वह जन्मता है वहां ।
किंतु होती योनि वहां । मनुष्यकी ही ॥ ३८ ॥
यदि कोई एक भिक्षुक । राज-गृहमें बैठा देख ।
उससे वह राजा एक । बनेगा क्या ॥ ३९ ॥
बैलको जोतकर गाडीमें । ले गये धनीके बारातमें ।
इससे चूकेगा क्या गोठेमें । खाना घास ॥ २४० ॥
इसीलिये व्यापारमें दिन रात । जुते रहते जो अविश्रांत ।
ऐसे कुलमें उसे निश्चित । मिलता जन्म ॥ ४१ ॥
जन्मता है कर्म-जडोंमें । अथवा ऐसे ही देहमें ।
जहां रजोत्कर्ष-गर्तमें । डूबता वह ॥ ४२ ॥
तमो-गुणीका स्वभाव-धर्म—
और अर्जुन उसी भांति । जहां रज-सत्वकी वृत्ति ।
निगलकर हो उन्नति । तमोगुणकी ॥ ४३ ॥
कहते हम लक्षण । अंतर्बाह्य तन-मन ।
कहता सुन अर्जुन । ध्यान देकर ॥ ४४ ॥
उसका होता ऐसा मन । जैसे सूर्य-चन्द्र विहीन ।
होता है रातका गगन । अमावसका ॥ ४५ ॥
ऐसा उसका अंतःकरण । सदैव स्फूर्ति-हीन विरान ।
विचारका स्पर्श भी अर्जुन । नहीं होता ॥ ४६ ॥
५५३ गुण-निस्तारयोग
(70)
पत्थरको हराती जड़ता । मृदुता वह नहीं जानता ।
स्मरण-शक्तिका अता-पता । नहीं होता उसको ॥ ४७ ॥
अविवेक उसका साज । अंतर्बाह्य मौढ्यका बाज ।
लेन-देन होता सहज । मूर्खताका ॥ ४८ ॥
आचार-हीनता अमंगल । दबोचती उसको प्रबल ।
मृत्यु-तक उसका चंगुल । कसता जाता ॥ ४९ ॥
कहता हूं और एक लक्षण । दुष्टतामें चित्त विलक्षण ।
जैसे काली रातमें सुलक्षण । देखता उल्लू ॥ २५० ॥
निषिद्ध-कर्मके नामसे । खिल जाता तन-मनसे ।
दौड़ती अनिर्बंध जैसे । इंद्रियां सारी ॥ ५१ ॥
बिन मदिराके वह झूमता । बिन सन्निपातके बकता ।
बिन प्रेमके वह भूलता । पागल जैसे ॥ ५२ ॥
रहता नहीं उसका चित्त । किंतु उन्नति नहीं निश्चित ।
भ्रम-वश हुवा है उन्मत्त । तमो-गुणी वह ॥ ५३ ॥
या इन गुणोंकी होती । जहां संपूर्ण प्रतीति ।
जानो तमकी उन्नति । हुई सांग ॥ ५४ ॥
और ऐसे ही प्रसंग । तजता है यदि अंग ।
लेके यही गुण संग । जन्मता वह ॥ ५५ ॥
राईपन अपने बीजमें । छोड़ जाती है राई अंतमें ।
अंकुरेगा राईके रूपमें । राईपन जैसे ॥ ५६ ॥
तज कर अग्नि जब दीप । बुझता यदि अपने आप ।
जैसे जहां लगा वह दीप । आग ही आग ॥ ५७ ॥
ऐसे तमो गुणके साथ । संकल्प बांधकर पार्थ ।
बुझती है जीवन जोत । जन्मती तम-रूप ॥ ५८ ॥
इससे अधिक क्या कहना । तम-वृद्धिमें देह तजना ।
पशु-पक्षी कृमि हो जन्मना । या उगना हो पेड ॥ ५९ ॥
ज्ञानेश्वरी ५५४
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६ ॥
तीनों गुणोंका परिणाम--
श्रुतिका यह निरूपण । बन जाता है सत्व-गुण ।
सुकृत-कर्मका कारण । धनुर्धर ॥ २६० ॥
इसीलिये है निर्मल । सुकृतका जो सरल ।
देता सुख ज्ञान फल । सात्विक ॥ ६१ ॥
फिर है जो रजकी प्रक्रिया । इंद्रवणिका फल पकाया ।
सुख चितार अंतमें दिया । दुःख अपार ॥ ६२ ॥
अथवा जैसे निंबोणीका फल । बाहर मृदु अंदर गरल ।
वैसे होते राजस-क्रिया-फल । यहां अर्जुन ॥ ६३ ॥
जैसे है विषका अंकुर । देता विष फल आखर ।
वैसे है रूप भयंकर । फलता तम ॥ ६४ ॥
सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७ ॥
इसीलिये हे अर्जुन । सत्वका हेतु है ज्ञान ।
जैसे मानो दिनमान । होता सूर्यका ॥ ६५ ॥
तथा वैसे ही यह जान । लोभका है रज कारण ।
जैसे स्वरूप विस्तारण । जीव-दशाका ॥ ६६ ॥
मोह अज्ञान प्रमाद । यहां है ये दोष-वृन्द ।
आगे जो बढता प्रबुद्ध । तमका मूल ॥ ६७ ॥
फल सात्विक कर्मोंका पुण्य निर्मल है कहा ।
रजका फल है दुःख तमका ज्ञान-शून्यता ॥ १६ ॥
सत्वसे फैलता ज्ञान रजसे जान लालसा ।
प्रमाद मोह अज्ञान होते हैं तमके गुण ॥ १७ ॥
५५५ गुण-निस्तारयोग
ऐसे विचारोंके नयन । तीनों गुण करके भिन्न ।
दिखाते हैं जान अर्जुन । करतलामलकसा ॥ ६८ ॥
रज-तम हैं ये दोनों गुण । होते हैं पतनके कारण ।
सत्व बिन अन्य नहीं जान । पहुंचाते ज्ञानके पास ॥ ६९ ॥
इसीलिये सात्विक-वृत्ति । स्वीकार व्रत जन्म-वृत्ति ।
सर्व त्याग करके भक्ति । करते जान ॥ २७० ॥
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥
गुण-बद्धोंके स्थान—
जिनमें होता सत्वका उत्कर्ष । जीते-मरते उसीमें सहर्ष ।
तन त्याग वे पाते सत्पुरुष । स्वर्गका राज ॥ ७१ ॥
ऐसे ही रजमें जो रहते । उसीमें जीते तथा मरते ।
वे मनुष्य होके जन्मते । मृत्यु-लोकमें ॥ ७२ ॥
सुख दुःखकी खिचडी जिसमें । खानी पड़ती एक ही थालीमें ।
फंसते हैं जो मरण-चक्रमें । कभी नहीं छूटते ॥ ७३ ॥
तथा तममें जो उसी भांति । जीते मरते हैं उसी स्थिति ।
पाते हैं नरक अधोगति । प्राप्ति-पत्र ॥ ७४ ॥
इस भांति जो वस्तु-सत्ता । त्रिगुणको कैसे प्रभावित ।
करती है कारण सहित । कहा मैंने ॥ ७५ ॥
वस्तु होती है वस्तुत्वमें । किंतु आप गुण-रूपमें ।
देख गुणके स्वभावमें । बरतती है ॥ ७६ ॥
राजा देखता जैसे स्वप्नमें । घिरा है राज-पर-चक्रमें ।
जीतता हारता अपनेमें । आप ही एक ॥ ७७ ॥
सत्वस्थ चढते ऊंच मध्यमें व्यक्ति राजस ।
अधःपतित होते हैं तामसी हीन वृत्तिके ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ५५६
वैसे मध्य ऊर्ध्व अध । ये जो गुण-वृत्ति भेद ।
दृष्टि तज दी तो शुद्ध । वस्तु आप ॥ ७८ ॥
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥
गुण-निस्तारका विवेचन—
रहने दे अब यह विषय । कहने दे पीछेका जो विषय ।
इसे विषयांतर धनंजय । नहीं मान तू ॥ ७९ ॥
मानो यह तीन जो गुण । अपने सामर्थ्यसे जान ।
होते जैसे देह अर्जुन । गुण ही आप ॥ ८० ॥
जैसे ईंधनका आधार । अग्नि होता है धनुर्धर ।
या उगता है तरुवर । भूमिका रस ॥ ८१ ॥
या दधि-घृतके रूपमें जैसे । होता है केवल दूध ही वैसे ।
या लेता है ईखका रस जैसे । गूडका रूप ॥ ८२ ॥
ऐसे हैं ये सांतःकरण । देह बनते तीन गुण ।
तभी होते बंध-कारण । धनंजय ॥ ८३ ॥
किंतु आश्चर्य धनुर्धर । यह बंधका जो गुब्बार ।
मुक्त दशामें संसार । कभी नहीं ॥ ८४ ॥
यदि गुण ये अपने धर्मानुसार । होते हैं शरीरके आगे पीछे स्वैर ।
आत्माके गुणातीतावस्थामें अंतर । नहीं आता ॥ ८५ ॥
ऐसी मुक्ति होती है सहज । तुझको कहता हूं मैं आज ।
स्वभावसे तू ज्ञान-पुंज । अमर अर्जुन ॥ ८६ ॥
चैतन्य होता है गुणमें । न होता गुणके पाशमें ।
कहा यह त्रयोदशमें । मैंने तुझको ॥ ८७ ॥
गुणोंको तजके कर्त्ता आत्मा जो उस पार है ।
देखता जानता ऐसा होता मेरा स्वरूप सो ॥ १९ ॥
५५७ गुण-निस्तारयोग
जिस समय अंतःकरणमें । प्रतीत हो ज्ञान बोध-रूपमें ।
तब जैसे जागृत अवस्थामें । होता स्वप्न-भंग ॥ ८८ ॥
या जब तरंग उठते । उसे तटसे हैं देखते ।
बिंबके अंग-भंग होते । उसी प्रकार ॥ ८९ ॥
नट जैसे नहीं फंसता । अपने स्वांगको जानता ।
वैसे ही गुणोंको देखता । साक्षी-रूप ॥ २९० ॥
अथवा ऋतु-त्रयमें आकाश । ऋतुओंको देकर अवकाश ।
अलिप्तता रखता अविनाश । अपनी जैसे ॥ ९१ ॥
वैसे गुणमें गुणसे पर । अपने मूल-रूपमें स्थिर ।
होता अहंतापे अहंकार । उस समय ॥ ९२ ॥
वहांसे जब वह देखता । कहता मैं हूं साक्षी अकर्ता ।
क्रियाओंका नियोजन कर्ता । केवल हैं गुण ॥ ९३ ॥
तीन गुणोंका है जो प्रकार । दीखता कर्मका हो विस्तार ।
वह है गुणोंका विकार । धनंजय ॥ ९४ ॥
इसमें रहता हूं मैं ऐसा । वनमें वसंत ऋतु जैसा ।
वन-लक्ष्मीका विलास जैसा । कारण-रूप ॥ ९५ ॥
अथवा तारागणका लोपना । सूर्यकांतका उद्दीपन होना ।
तथा कमलोंका खिलना । या जाना तनका ॥ ९६ ॥
यहां किसी भी काममें कहीं । सविता उलझता नहीं ।
वैसे अकर्ता होता है देही । सत्ता-रूप ॥ ९७ ॥
गुण-प्रकाश कर गुण-दर्शन । होता है मुझमें गुणत्वका पोषण ।
गुणत्रयका होकर जो निरसन । रहता वह मैं हूं ॥ ९८ ॥
ऐसे विवेकका जो उदय । होता है जिसका धनंजय ।
उसे मिलता पथ विजय । गुणातीतका ॥ ९९ ॥
ज्ञानेश्वरी ५५८
अध्याय ११: विश्वरूपदर्शनयोग
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २० ॥
गुण-निस्तारसे मोक्ष प्राप्त होता है—
निर्गुण ऐसा और जो पार्थ । रहता है उसको निश्चित ।
जानता वह उसमें नित । बसता ज्ञान ॥ ३०० ॥
अथवा मानो पांडुसुता । पाता है वह मेरी सत्ता ।
जिस भांति पाती सरिता । सिंधुत्व जैसे ॥ १ ॥
नळिका परसे उड़कर । बसता है शुक डालपर ।
वैसे वह मूल अहंकार । ओढता है सो ॥ २ ॥
अज्ञानकी नींद जो सोया था । जोरसे खुर्राटे भरता था ।
पाकर वह स्वरूपावस्था । उठता अर्जुन ॥ ३ ॥
बुद्धि-भेदका जब दर्पण । हाथसे छूटके गिरा जान ।
तब स्व-मुखाभास दर्शन । होगा कैसे ॥ ४ ॥
देहाभिमानका पवन जब रुकता । चित्तसिंधु पर तरंग नहीं उठता ।
तरंग-सिंधुका तब जैसे ऐक्य होता । वैसे जीवेशका ॥ ५ ॥
वर्षातमें गगनमें जैसे । लय होते हैं बादल वैसे ।
पूर्ण होता वह मद्भावसे । पांडुकुमार ॥ ६ ॥
ऐसे वह मद्रूप कर प्राप्त । शरीरमें रहता है सतत ।
नहीं होता है त्रिगुणमें लिप्त । देह-संभूत जो ॥ ७ ॥
अजी ! कांचका घर जो होता । प्रकाशको रोक न सकता ।
या वडवानल न बुझता । सिंधु-जलसे ॥ ८ ॥
वैसे ही आवागमन जो गुणोंका । बोध नहीं मिटा सकता उसका ।
जैसे चंद्र होता जलमें व्योमका । वैसे देहमें रहता वह ॥ ९ ॥
देह कारण ये तीन गुण जो तरता इन्हे ।
जन्म-मृत्यु जरा दुःख तरके मोक्ष जीतता ॥ २० ॥
५५९ गुण-निस्तारयोग