ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 613, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहा-प्रलय शैय्यापर सोता । जब यह खेल करके आता ।
कल्पोदयमें यह है उठता । विषम-ज्ञानसे ॥ १२ ॥
इस प्रकार अर्जुन । मिथ्या दृष्टिका सदन ।
युगानुवृत्ति चरण । रखता स-कौतुक ॥ १३ ॥
संकल्प है इसका इष्ट । अहंकार साथी विनट ।
इसका अंत है निकट । आता ज्ञानसे ॥ १४ ॥
रहने दो बखान बहुत । यह विश्व है मायासे जात ।
मेरी सत्ता है आधारभूत । इस कार्यमें ॥ १५ ॥
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥
इस दृश्यमान विश्वमें भी मैं ओतप्रोत भरा हूं—
इसीलिये मैं पिता । महद्ब्रह्म है माता ।
आपत्य पांडुसुता । जगडंबर ॥ १६ ॥
शरीर है सो अब बहुत । देखके चित्तमें न हो द्वैत ।
मन बुद्धि आदि जो हैं भूत । एक ही यहां ॥ १७ ॥
जैसे शरीरमें एक । अवयव होते अनेक ।
कैसे विचित्र विश्व देख । एक ही यहां ॥ १८ ॥
ऊंची नीची विविध प्रकार । होती डालियां विविध आकार ।
होता है उसका जो आधार । बीज एक ॥ १९ ॥
संबंध है वह भी कैसा । घट माटीका पुत्र जैसा ।
या कपासका पुत्र जैसा । वस्त्रत्व होता है ॥ १२० ॥
अनेक लहरोंकी परंपरा । सिंधु-संतति जिस प्रकार ।
सब चराचरका औ' हमारा । संबंध भी ऐसा ॥ २१ ॥
किसी भी योनिमें मूर्ति जन्मती है कहीं कभी ।
उन्हें प्रकृति है माता पिता मैं बीज रोपता ॥ ४ ॥
५४१ गुण-निस्तारयोग