ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे वह देहातीत । बनकर देहवंत ।
बहलता पांडुसुत । बाह्य-ज्ञानसे ॥ ५५ ॥
प्रवृत्ति-शास्त्र सूझता । यज्ञ-ज्ञान जूझता ।
स्वर्ग भी है दीखता । और क्या रहा ॥ ५६ ॥
मैं हूं महा-ज्ञानवान । मुझसे नहीं विद्वान ।
मेरा चित्त है गगन । या सूर्य-चंद्रका ॥ ५७ ॥
ऐसे ही सत्व-सुख-ज्ञानका । जीवमें लगे बागडोरका ।
बलसे देता जाता झटका । जुते हुये बैलकासा ॥ ५८ ॥
ऐसे ही यह रजो गुणसे । शरीरमें बंधा जाता कैसे ।
कहता हूं मैं तू सुन इसे । पांडुकुमार ॥ ५९ ॥
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम् ॥ ७ ॥
रजोगुणके लक्षण—
तभी यह रज कहलाता । जीवनका रंजन जानता ।
यौवन नित बना रहता । अभिलाषाका ॥ १६० ॥
रजका जब स्पर्श होता । जीव काम-मदमें आता ।
हवा पर सवार होता । चिंतनके यह ॥ ६१ ॥
अग्नि-कुंडमें घृत सिंचन किया । विद्युताग्निने उसका साथ दिया
कहो अधिक कम क्या रह गया । कहेंगे तब ॥ ६२ ॥
इच्छा दाह तब भडकता । क्लेश-सह मधुर लगता ।
इंद्रैश्वर्य भी ओछा लगता । ऐसे समय ॥ ६३ ॥
इच्छा दाह अब बढता । मेरु भी हाथमें लगता ।
फिर भी वह है चाहता । और भी बडा ॥ ६४ ॥
रज है वासना-रूप तृष्णा आसक्ति-वर्धक ।
आत्माको कर्मके साथ बांधता बल-पूर्वक ॥ ७ ॥
५४५ गुण-निस्तारयोग
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