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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 626

पत्थरको हराती जड़ता । मृदुता वह नहीं जानता ।
स्मरण-शक्तिका अता-पता । नहीं होता उसको ॥ ४७ ॥
अविवेक उसका साज । अंतर्बाह्य मौढ्यका बाज ।
लेन-देन होता सहज । मूर्खताका ॥ ४८ ॥
आचार-हीनता अमंगल । दबोचती उसको प्रबल ।
मृत्यु-तक उसका चंगुल । कसता जाता ॥ ४९ ॥
कहता हूं और एक लक्षण । दुष्टतामें चित्त विलक्षण ।
जैसे काली रातमें सुलक्षण । देखता उल्लू ॥ २५० ॥
निषिद्ध-कर्मके नामसे । खिल जाता तन-मनसे ।
दौड़ती अनिर्बंध जैसे । इंद्रियां सारी ॥ ५१ ॥
बिन मदिराके वह झूमता । बिन सन्निपातके बकता ।
बिन प्रेमके वह भूलता । पागल जैसे ॥ ५२ ॥
रहता नहीं उसका चित्त । किंतु उन्नति नहीं निश्चित ।
भ्रम-वश हुवा है उन्मत्त । तमो-गुणी वह ॥ ५३ ॥
या इन गुणोंकी होती । जहां संपूर्ण प्रतीति ।
जानो तमकी उन्नति । हुई सांग ॥ ५४ ॥
और ऐसे ही प्रसंग । तजता है यदि अंग ।
लेके यही गुण संग । जन्मता वह ॥ ५५ ॥
राईपन अपने बीजमें । छोड़ जाती है राई अंतमें ।
अंकुरेगा राईके रूपमें । राईपन जैसे ॥ ५६ ॥
तज कर अग्नि जब दीप । बुझता यदि अपने आप ।
जैसे जहां लगा वह दीप । आग ही आग ॥ ५७ ॥
ऐसे तमो गुणके साथ । संकल्प बांधकर पार्थ ।
बुझती है जीवन जोत । जन्मती तम-रूप ॥ ५८ ॥
इससे अधिक क्या कहना । तम-वृद्धिमें देह तजना ।
पशु-पक्षी कृमि हो जन्मना । या उगना हो पेड ॥ ५९ ॥
ज्ञानेश्वरी ५५४