सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 623, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 623

दीपकके सम्मुख अंधार । भागते जाता जैसे सत्वर ।
नहीं आते निषिद्ध आचार । इन्द्रियोंके सम्मुख ॥ २१० ॥
अजी ! वर्षा-ऋतुमें जैसे । नदियां उमड़ती वैसे ।
फैल जाती है बुद्धि वैसे । सब शास्त्रोंमें ॥ ११ ॥
जैसे पूर्णमासीका दिवस । चांदनीसे भरता आकाश ।
शास्त्रमें फैलती तत्सदृश । वृत्ति सदैव ॥ १२ ॥
एकत्र होती वासना । प्रवृत्तिका संयमन ।
विषयों परसे मन । हठ जाता है ॥ १३ ॥
जब सत्व बढता । यह चिन्ह दीखता ।
यदि निधन होता । ऐसे समय ॥ १४ ॥
जैसे है घरकी संपत्ति । वैसे औदार्य धैर्य-वृत्ति ।
तब इह परमें कीर्ति । क्यों न फैलेगी ॥ १५ ॥
अथवा आया है अति सुकाल । चला संतर्पण अति-मंगल ।
अतिथि आप्त आया उसी पल । कहना क्या तब ॥ १६ ॥
इससे क्या है तब सुंदर । वैसे सत्वमें जाना शरीर ।
सत्व-स्वभावको छोड और । जायेगा कहां ॥ १७ ॥
सत्व-गुणमें जो उद्भट । तज सत्व-गुण श्रेष्ठ ।
चलता है छोडके कोपट । भोग-क्षम जो ॥ १८ ॥
अकस्मात जो ऐसा मरता । सत्वका ही नया बनता ।
या ज्ञानियोंमें जन्म लेता । यह निश्चय ॥ १९ ॥
कह तू यह धनुर्धर । राजा राजत्वमें डोंगर ।
चढता है तब अधूरा । होता है क्या ॥ २२० ॥
अथवा यहांका जो दिया । पडोसके गांवमें गया ।
वहां पर क्या धनंजय । न रहता दीप ॥ २१ ॥
वैसी यह सत्व-शुद्धि । होती ज्ञान सह वृद्धि ।
तैरने लगती बुद्धि । विवेक पर ॥ २२ ॥
५५१ गुण-निस्तारयोग