ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऐसे विचारोंके नयन । तीनों गुण करके भिन्न ।
दिखाते हैं जान अर्जुन । करतलामलकसा ॥ ६८ ॥
रज-तम हैं ये दोनों गुण । होते हैं पतनके कारण ।
सत्व बिन अन्य नहीं जान । पहुंचाते ज्ञानके पास ॥ ६९ ॥
इसीलिये सात्विक-वृत्ति । स्वीकार व्रत जन्म-वृत्ति ।
सर्व त्याग करके भक्ति । करते जान ॥ २७० ॥
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥
गुण-बद्धोंके स्थान—
जिनमें होता सत्वका उत्कर्ष । जीते-मरते उसीमें सहर्ष ।
तन त्याग वे पाते सत्पुरुष । स्वर्गका राज ॥ ७१ ॥
ऐसे ही रजमें जो रहते । उसीमें जीते तथा मरते ।
वे मनुष्य होके जन्मते । मृत्यु-लोकमें ॥ ७२ ॥
सुख दुःखकी खिचडी जिसमें । खानी पड़ती एक ही थालीमें ।
फंसते हैं जो मरण-चक्रमें । कभी नहीं छूटते ॥ ७३ ॥
तथा तममें जो उसी भांति । जीते मरते हैं उसी स्थिति ।
पाते हैं नरक अधोगति । प्राप्ति-पत्र ॥ ७४ ॥
इस भांति जो वस्तु-सत्ता । त्रिगुणको कैसे प्रभावित ।
करती है कारण सहित । कहा मैंने ॥ ७५ ॥
वस्तु होती है वस्तुत्वमें । किंतु आप गुण-रूपमें ।
देख गुणके स्वभावमें । बरतती है ॥ ७६ ॥
राजा देखता जैसे स्वप्नमें । घिरा है राज-पर-चक्रमें ।
जीतता हारता अपनेमें । आप ही एक ॥ ७७ ॥
सत्वस्थ चढते ऊंच मध्यमें व्यक्ति राजस ।
अधःपतित होते हैं तामसी हीन वृत्तिके ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ५५६