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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 615

बंध क्यों नहीं बांधता । मुझे मैं सही जानता ।
अज्ञान कारण होता । बंधका वहां ॥ ३५ ॥
मुझको ये बंधन ऐसे । किन गुणसे दीखे वैसे ।
कहता हूं शांत चित्तसे । सुन तू इसको ॥ ३६ ॥
सत्व रज तम इन तीन गुणोंके कारण पुनर्जन्म होता है—
कितने गुण है या धर्म । उसका क्या रूप औ' नाम ।
कहां हुए इसका मर्म । कहता हूं सुन ॥ ३७ ॥
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५ ॥
सुन सत्व रज तम । यहां तीनोंके ये नाम ।
तथा प्रकृतिसे जन्म । पाते हैं ये ॥ ३८ ॥
यहां है सत्व उत्तम । तथा रज है मध्यम ।
तीनोंमें है यह तम । कनिष्ट सहज ॥ ३९ ॥
जैसे एक ही शरीरमें तीन । अवस्थायें होती हैं भासमान ।
एक अंतःकरणमें त्रिगुण । होते हैं भास ॥ १४० ॥
जैसे जैसे कस-हीन । होता सोनेमें मिलन ।
बढ़ स्वर्णका वजन । होता अवमूल्य ॥ ४१ ॥
सावधानता जैसे जैसे । दूर होती है आलससे ।
जकड़ती है निद्रा वैसे । दृढ मूल हो ॥ ४२ ॥
अज्ञान अंगीकार कर । उठती है वृत्ति ऊपर ।
वह है सत्व रज द्वारा । तममें भी जाती ॥ ४३ ॥
यह तू जान अर्जुन । इनका नाम है गुण ।
अब करना दर्शन । बद्धताका ॥ ४४ ॥
प्रकृतिसे बने हैं ये गुण सत्व रजस्तम ।
वे निर्विकार आत्माको जोतते मान देहमें ॥ ५ ॥
५४३    गुण-निस्तारयोग