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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 629

वैसे मध्य ऊर्ध्व अध । ये जो गुण-वृत्ति भेद ।
दृष्टि तज दी तो शुद्ध । वस्तु आप ॥ ७८ ॥
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥
गुण-निस्तारका विवेचन—
रहने दे अब यह विषय । कहने दे पीछेका जो विषय ।
इसे विषयांतर धनंजय । नहीं मान तू ॥ ७९ ॥
मानो यह तीन जो गुण । अपने सामर्थ्यसे जान ।
होते जैसे देह अर्जुन । गुण ही आप ॥ ८० ॥
जैसे ईंधनका आधार । अग्नि होता है धनुर्धर ।
या उगता है तरुवर । भूमिका रस ॥ ८१ ॥
या दधि-घृतके रूपमें जैसे । होता है केवल दूध ही वैसे ।
या लेता है ईखका रस जैसे । गूडका रूप ॥ ८२ ॥
ऐसे हैं ये सांतःकरण । देह बनते तीन गुण ।
तभी होते बंध-कारण । धनंजय ॥ ८३ ॥
किंतु आश्चर्य धनुर्धर । यह बंधका जो गुब्बार ।
मुक्त दशामें संसार । कभी नहीं ॥ ८४ ॥
यदि गुण ये अपने धर्मानुसार । होते हैं शरीरके आगे पीछे स्वैर ।
आत्माके गुणातीतावस्थामें अंतर । नहीं आता ॥ ८५ ॥
ऐसी मुक्ति होती है सहज । तुझको कहता हूं मैं आज ।
स्वभावसे तू ज्ञान-पुंज । अमर अर्जुन ॥ ८६ ॥
चैतन्य होता है गुणमें । न होता गुणके पाशमें ।
कहा यह त्रयोदशमें । मैंने तुझको ॥ ८७ ॥
गुणोंको तजके कर्त्ता आत्मा जो उस पार है ।
देखता जानता ऐसा होता मेरा स्वरूप सो ॥ १९ ॥
५५७ गुण-निस्तारयोग