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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 624

महदादिककी परंपरा । विचार कर तदनंतर ।
विलीन हो जाते स-विचार । उसके उदरमें ॥ २३ ॥
छत्तीसमें सैंतीसवां । चौबीसमें पच्चीसवां ।
तीनों पर स्वभाव । चौदह जिसका ॥ २४ ॥
ऐसा सर्व जो सर्वोत्तम । होता है जिसको सुगम ।
ऐसे कुलमें निरुपम । मिलता है देह ॥ २५ ॥
रजोगुणीका स्वभाव-धर्म-
इसी भांति हे तू देख । सत्व तम अधोमुख ।
तथा होता ऊर्ध्व-मुख । जब रजोगुण ॥ २६ ॥
तब वह अपने कार्यका पार्थ । शरीर-ग्राममें है धूम मचाता ।
देहमें तब लक्षणोंका करता । उदय ऐसा ॥ २७ ॥
अजी ! फैला हुवा बवंडर । करता है वस्तुओंका ढेर ।
वैसे होता विषयोंका ठौर । वह देह ॥ २८ ॥
प्रसंग जैसे पर-दारादिकका । न सोचता शास्त्र-विरुद्ध होनेका ।
इंद्रियोंको देता चारा विषयोंका । भेडोंके समान ॥ २९ ॥
यहां तक होता इनका लोभ । स्वैर वृत्तिका रहता सदा रोभ ।
लूटनेमें अशक्य जो अलाभ । इन लोगोंका ॥ २३० ॥
आता जब उद्यमका प्रसंग । नहीं लेता है कभी पीछे पग ।
बढाती है प्रवृत्ति पग-पग । अपनी सदैव ॥ ३१ ॥
या खडा करना कोई प्रासाद । या करना है यज्ञ-अश्वमेध ।
ऐसे होते मनमें बडे छंद । उसके सदैव ॥ ३२ ॥
नगरोंको रचाना । जलाशय बांधना ।
महावन लगाना । नानाविध ॥ ३३ ॥
ऐसे ऐसे महान कर्म । समारोहोंका उपक्रम ।
इस परके सभी काम- । भोग करना मेरे ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी ५५२