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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 618

खर्च किया आज ऐसा । कलका चलेगा कैसा ।
इससे बहु बडा-सा । करेगा उद्यम ॥ ६५ ॥
दमडी पर जीवन । दे करके बलिदान ।
कमाकर एक तृण । मानता धन्य ॥ ६६ ॥
कहता स्वर्गपे जाना । सोचता कहां क्या खाना ।
यज्ञानुष्ठान करना । इसीलिये ॥ ६७ ॥
सदा व्रत पर व्रत । करता इष्ट प्राप्त्यर्थ ।
कभी कामना रहित । न करता कुछ ॥ ६८ ॥
जैसा है ग्रीष्मका पवन । न ही जानता शांति-क्षण ।
रहता वह निशिदिन । ऊधमग्रस्त ॥ ६९ ॥
होता है चंचल मीन । या कामिनी कटाक्ष समान ।
या बिजलीकी गति मान । रहता प्रवृत्तिमें ॥ १७० ॥
चाहता इसी वेगसे । संसार स्वर्ग भी वैसे ।
क्रियाकी आगमें वैसे । घुसता वह ॥ ७१ ॥
देहमें या देहसे भिन्न । तृष्णा श्रृंखलाके बंधन ।
सदा उपद्रुव्याप विभिन्न । गलेमें व्यापारके ॥ ७२ ॥
रजो गुणका यह दारुण । देहमें देहीके है बंधन ।
सुन तू अब कथा अर्जुन । तमो गुणकी ॥ ७३ ॥
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥ ८ ॥
तमोगुणके लक्षण-
व्यवहारके जो नयन । बंद होते जिससे जान ।
मोह-रात्रीके हैं जो घन । काले अतिशय ॥ ७४ ॥
मोहता तम देहीको अज्ञानको बढाकर ।
निद्रा प्रमाद आलस्य इससे घेर बांधता ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ५४६