ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 621, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीनों गुण समय समय पर बदलते रहते हैं—
पीछे कर कफ वात । आगे आता जब पित्त ।
होता है तब संतप्त । जिस भांति ॥ ९६ ॥
आतप वर्षाको जीतकर । प्रकट होता शीत-लहर ।
आकाश तब जिस प्रकार । होता है शीत ॥ ९७ ॥
अथवा नाना स्वप्न-जागृति । मिटके आती सुषुप्ति ।
क्षण भर चित्त-वृत्ति । होती जैसे ॥ ९८ ॥
वैसे रज-तमको पराजित । करके सत्व होता प्रकाशित ।
जीव कहता है हो प्रमुदित । सुखी हूं मैं ॥ ९९ ॥
वैसे ही जब सत्व और रज । मिटाकर होता तमका राज ।
प्रवृत्ति होती है तब सहज । प्रमादकी ॥ २०० ॥
उसी भांति पांडुकुमार । सत्व-तमको हटाकर ।
उठाता है अपना शिर । रजोगुण ॥ १ ॥
कर्मके बिन अन्य कहीं । सुंदर कुछ भी है नहीं ।
इस भांति मानता देही । शरीरस्थ ॥ २ ॥
त्रिगुण वृद्धिका निरूपण । किया हैं श्लोकोंमें यहां तीन ।
सत्वादि गुण-वृद्धि लक्षण । सुनो अब ॥ ३ ॥
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ ११ ॥
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२ ॥
प्रज्ञाका इंद्रियों-द्वारा प्रकाश सब ओर जो ।
देहमें फैलता सारा जानना सत्व है बढ़ा ॥ ११ ॥
प्रवृत्ति लालसा लोभ कर्मारंभ अशांतता ।
फैलाव देहमें होता जानना तम है बढ़ा ॥ १२ ॥
५४९ गुण-निस्तारयोग