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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 612

पेटमें सोते तम-रज । उसमें आया आप-तेज
उससे सहज स्वेदज । उत्पन्न होते ॥ १०० ॥
आप पृथ्वी उत्कट । तम-मात्र निकृष्ट ।
स्थिर होता प्रकट । उद्बीज रूप ॥ १ ॥
पांच ही जब एकत्र होते । मन-बुद्धि साथ पाते ।
जारजका हेतु बनते । तब ये पार्थ ॥ २ ॥
ब्रह्मांडका पूर्ण रूप—
ऐसे ये चार सरल । कर चरण तल ।
महा-प्रकृति मूल । बनता शिर ॥ ३ ॥
प्रवृत्ति उसका पेट । निवृत्ति सरल पीट ।
सुर-योनि अंग आठ । उर्ध्व भागके ॥ ४ ॥
कंठ उल्हसित स्वर्ग । मृत्यु-लोक मध्य-अंग ।
पाताल है अधो-भाग । त्रिलोकका ॥ ५ ॥
ऐसा बालक एक । जन्म दिया है देख ।
जिसके तीनों लोक । है विकास ॥ ६ ॥
चौरासी लक्ष जो योनी । इसके जोडोंके मणी ।
बढता है क्षण-क्षण । यह बालक ॥ ७ ॥
शरीरके सभी अंग पर । डालती नामके अलंकार ।
बढाती मोह-स्तन्य देकर । नित्य-नवीन ॥ ८ ॥
नाना सृष्टि इस बालककी । उंगलियां कर-चरणकी ।
भिन्नाभिमान उंगुलियोंकी । मुंदरियां अनेक ॥ ९ ॥
इकलौता यह चराचर । अविचारित अति सुंदर ।
बालकको जो जन्म-देकर । बनी महान ॥ ११० ॥
ब्रह्मा इसका प्रातःकाल । विष्णु रहा मध्यान्ह काल ।
सदाशिव है सायंकाल । इस बालकका ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी ५४०