सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 625, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 625

महा-सागर भी खायेगा मात । अग्नि भी होगा पूरा पराजित ।
बढती है इतनी असीमित । अभिलाषा उसकी ॥ ३५ ॥
आशा जो बढती जाती । मनके आगे दौडती ।
विश्वको भी जो गिनती । पद्-तलमें ॥ ३६ ॥
बढता है रज जब । दीखते ये चिन्ह सब ।
शरीर पडता तब । यदि इसका ॥ ३७ ॥
यह सब होते जहां । वह जन्मता है वहां ।
किंतु होती योनि वहां । मनुष्यकी ही ॥ ३८ ॥
यदि कोई एक भिक्षुक । राज-गृहमें बैठा देख ।
उससे वह राजा एक । बनेगा क्या ॥ ३९ ॥
बैलको जोतकर गाडीमें । ले गये धनीके बारातमें ।
इससे चूकेगा क्या गोठेमें । खाना घास ॥ २४० ॥
इसीलिये व्यापारमें दिन रात । जुते रहते जो अविश्रांत ।
ऐसे कुलमें उसे निश्चित । मिलता जन्म ॥ ४१ ॥
जन्मता है कर्म-जडोंमें । अथवा ऐसे ही देहमें ।
जहां रजोत्कर्ष-गर्तमें । डूबता वह ॥ ४२ ॥
तमो-गुणीका स्वभाव-धर्म—
और अर्जुन उसी भांति । जहां रज-सत्वकी वृत्ति ।
निगलकर हो उन्नति । तमोगुणकी ॥ ४३ ॥
कहते हम लक्षण । अंतर्बाह्य तन-मन ।
कहता सुन अर्जुन । ध्यान देकर ॥ ४४ ॥
उसका होता ऐसा मन । जैसे सूर्य-चन्द्र विहीन ।
होता है रातका गगन । अमावसका ॥ ४५ ॥
ऐसा उसका अंतःकरण । सदैव स्फूर्ति-हीन विरान ।
विचारका स्पर्श भी अर्जुन । नहीं होता ॥ ४६ ॥
५५३ गुण-निस्तारयोग
(70)