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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

किसी भी बातकी अपूर्णता । कोई नहीं है यहां सर्वथा ।
देख सुखसे जो तुझे भाता । मेरे तनमें तू ॥ ५१ ॥
विश्व-मूर्ति उससे ऐसे । बोली जो अति कारुण्यसे ।
तो दीखता या नहीं ऐसे । न कहता रहा मौन ॥ ५२ ॥
रहा क्यों भला यह ऐसा मौन । सोचकर देखता यह जनार्दन ।
तब भी इच्छा-भूषित अर्जुन । खडा है उत्कंठित ॥ ५३ ॥
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामिते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८ ॥
उतरा नहीं है उत्कंठोन्माद । न मिला अब भी स्वर्ग सुखद ।
आकलन नहीं होता विशद् । मेरा रूप ॥ ५४ ॥
अर्जुनको विश्व-रूप देखनेके लिये दिव्य-दृष्टि दी—
हंसा देव यह सोचकर । कहने लगा जो हंसकर ।
“हमने दिखाया रूप पर । तू देखता ही नहीं” ॥ ५५ ॥
बोला तब अर्जुन विलक्षण । यह किसके दोषके कारण ।
बगलेको देता है सुलक्षण । चंद्रामृत तू ॥ ५६ ॥
दिखाता सुंदर दर्पण । जन्मांधको तू है श्रीकृष्ण ।
सुनाता तू मधुर बीन । बहरेको जो ॥ ५७ ॥
मकरंद-कणोंका चारा । कहता है तू दादुरसे चर ।
व्यर्थ मानकर क्यों शार्गधर । बिगडता अब ॥ ५८ ॥
शास्त्रोंसे यह अतींद्रिय घोषित । ज्ञान-दृष्टिका जो विषय निश्चित ।
कहता इसे देखेंगे कैसे पार्थ । चर्म-चक्षु ॥ ५९ ॥
यह मेरा व्यंग नहीं बोलना । मुझे अपना सहन करना ।
यह सुन कहता जनार्दन । सच है यह ॥ १६० ॥
किंतु तू चर्म-चक्षूसे न देख सकता मुझे ।
ले दिव्य दृष्टि है मेरी ईश्वरी योग देख तू ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४६

यह स्वरूप यदि दिखाना होता । दी होती पहले ही यह योग्यता ।
बोलनेमें मैं प्रेमसे स्वभावता । भूल गया हूं ॥ ६१ ॥
पहले जुताईके बुवाईसे । थकावट भई व्यर्थ इससे ।
अब देता दिव्य-दृष्टि इससे । देखो निज-रूप ॥ ६२ ॥
इस दृष्टिसे फिर तू अर्जुन । हमारा ऐश्वर्य-योग संपूर्ण ।
देखके उसे करो संगोपन । अपने अनुभवमें ॥ ६३ ॥
ऐसा वह वेदांत-वेद्य । सकल लोकका जो आद्य ।
जगताका जो है आराध्य । कहने लगा ॥ ६४ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९ ॥
अर्जुनका महा-भाग्य-
सुन तू कौरव-कुल-तिलक । विस्मय है मुझे इसी बातका ।
है क्या लक्ष्मीसे भुवनत्रयका । दूसरा भाग्यवान ॥ ६५ ॥
अथवा तत्व-विवेचनार्थ । है क्या कोई वेदसे समर्थ ।
सेवामें शेषसे भी विश्वस्थ । दूसरा कौन है ? ॥ ६६ ॥
उसके लिये ऐसे कष्ट सहन । करते हैं जो योगियोंके समान ।
अनुसरणमें बना है वाहन । गरुड सतत ॥ ६७ ॥
उन सबको है परे हटाया । जबसे पांडवोंका जन्म भया ।
कृष्ण-सुख सब सहज आया । इनके भागमें ॥ ६८ ॥
इन पांचोंमें भी जो अर्जुन । कृष्ण जैसे उसके आधीन ।
कामुक होता है अनुदिन । कामिनी-संग ॥ ६९ ॥
संजयने कहा
ऐसा बोल कुरु-श्रेष्ठ महायोगेश कृष्णने ।
दिखाया अपना श्रेष्ठ ईश्वरी-रूप पार्थको ॥ ९ ॥
३४७ विश्व रूप-दर्शनयोग

सिखाया गया पंछी ऐसा न बोलता । क्रीड़ा-रंत मृग भी ऐसा न चलता ।
पार्थके दैवका उत्कर्ष जो दीखता । यहां अकथनीय ॥ १७० ॥
पर-ब्रह्म यह आज है संपूर्ण । भोगार्थ सिद्ध इसके ही नयन ।
इसकी बातका दुलार श्रीकृष्ण । करता है यहां ॥ ७१ ॥
पार्थ कोपता तब वह शांत रहता । यह रूसता तब वह है समझाता ।
अर्जुनसे पगलाया है जगन्नाथ । निश्चित रूपसे ॥ ७२ ॥
जनमें हैं वैसे विषय जीतकर । शुकादि पुरुष जो श्रेष्ठ मुनिवर ।
रह गये हैं लीला गाकर सुंदर । भाटोंके समान ॥ ७३ ॥
और योगियोंका समाधि-धन । हो रहा है पार्थके आधीन ।
देख यह विस्मित होता है मन । महाराज मेरा ॥ ७४ ॥
संजय कहता है कौरवेश । इसमें विस्मय नहीं खास ।
कृष्ण करलें जिसे अपना-सा । भाग्योदय उसका ॥ ७५ ॥
कहता है इसलिये देवराज । यह दिव्य-दृष्टि ले तू पार्थ आज ।
इससे देख विश्व-रूप सहज । पूर्ण रूपसे ॥ ७६ ॥
श्रीमुखके ऐसे अक्षर । निकले जिस अवसर ।
मिटा अविद्याका अंधार । उसी क्षणमें ॥ ७७ ॥
अक्षर नहीं थे वे देख । था ब्रह्म-साम्राज्य-दीपक ।
अर्जुनार्थ थी चित्कलिका । जगादी श्रीकृष्णने ॥ ७८ ॥
संपूर्ण ब्रह्मांड ही विश्व-रूपसे भर गया—
प्रकटे जो दिव्य-चक्षु फिर । ज्ञान-दृष्टिका फूटा अंकुर ।
तथा दिखाया है सविस्तर । ऐश्वर्य-योग ॥ ७९ ॥
अवतार हैं ये जो सकल । उस महा-सिंधुके कल्लोल ।
विश्व दीखता है मृगजल । उसके किरणोंसे ॥ १८० ॥
उचित उस अनादि भूमिका पर । प्रकट होता है चित्र स-चराचर ।
अपने आप अपनेमें दामोदर । दिखाता उसको ॥ ८१ ॥
ज्ञानेश्वरी ३४८

बचपनमें श्रीपतिने जब । इकबार माटी खायी थी तब ।
माताने क्रोधसे पकड़ी खज्ज । कड़ाई इसकी ॥ ८२ ॥
इसने तब डरके ऐसे । मुख दिखानेके बहानेसे ।
माताको दिखाया था धीरेसे । ब्रह्मांड सारा ॥ ८३ ॥
या मधु-वनमें ध्रुवको जैसे । गंडस्थलको शंख लगानेसे ।
वेद-मति भी कुंठित हो ऐसे । स्तवन किया उसने ॥ ८४ ॥
अनुग्रह वैसे कुरुपति । पार्थ पर करता श्रीपति ।
जानती नहीं है अब मति । माया उसकी ॥ ८५ ॥
प्रकट हुवा यकायक योगैश्वर्य । कल्पांतमें होता जैसे जल-प्रलय ।
विस्मयमें डूबा चित उस समय । धनंजयका ॥ ८६ ॥
आ-ब्रह्म उदकसे जैसे व्याप्त था । अकेला मार्कडेय ही तैरता था ।
विश्व-रूप विस्मयमें वैसे पार्थ । लगा लोटने ॥ ८७ ॥
अजी ! कितना था यहां गगन । कौन ले गया वह जो महान ।
कहें सब चराचर अर्जुन । औ' महाभूत भी ॥ ८८ ॥
मिट गया दिशाओंका नाम-निशान । तना नहीं होता अध-ऊर्ध्वका ज्ञान ।
जागृतिसे लुप्त होता है स्वप्न । वैसे लोकाकार ॥ ८९ ॥
जैसे अनेक सूर्य-तेज प्रताप । करता स-चंद्र तारागण लोप ।
वैसे निगल गया है विश्व-रूप । प्रपंच सर्वस्व ॥ १९० ॥
नहीं स्फुरता मनमें तब मनत्व । नहीं संभालता अपनेको बुद्धित्व ।
लौट आया इंद्रियोंका इंद्रियत्व । हृदयमें ही ॥ ९१ ॥
केवळ वहां स्तब्ध स्तब्धता । एकाग्र है स्वयं एकाग्रता ।
पडी जैसे संमोहनावस्था । विचारोंपर ॥ ९२ ॥
देखता था वह ऐसा हो विस्मित । सम्मुख था चतुर्भुज रूप स्थित ।
नाना रूप ले वही था सुसज्जित । चहूँ ओर ॥ ९३ ॥
होते जैसे वर्षा-ऋतुके बादल । या महा-प्रलयके तेजोमंडल ।
वह रूप वैसा सर्वत्र सकल । भर रहा था एक-मात्र ॥ ९४ ॥
३४९ विश्व-रूप-दर्शनयोग

प्रथम स्वरूप समाधान । होकर रहा वह अर्जुन ।
खुले फिर उसने लोचन । देखा विश्व-रूप ॥ ९५ ॥
देखना इन्ही नयनोंसे । विश्व-रूप संपूर्ण ऐसे ।
वह दुलार भी कृष्णसे । हुआ पूर्ण ॥ ९६ ॥
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥
विश्व-रूपकी अद्भुतता--
देखता तब वहां अनेक वदन । जैसे रमा-रमणके राज-भवन ।
प्रकट हुए अनेकानेक निधान । लावण्य श्रियाके ॥ ९७ ॥
या आनंद-वनमें आया बहार । या सौंदर्य राज्य मिले हैं अपार ।
वैसे देखता वदन मनोहर । श्रीहरिका वह ॥ ९८ ॥
उसमें भी थे जो अनेक । सहज अति भयानक ।
प्रलय-रात्रीके कटक । उठ आया है ॥ ९९ ॥
या मृत्युके ये मुख उत्पन्न । भयके दुर्ग रचे विभिन्न ।
या प्रलयाग्निके ये हवन- । कुंड खुले हैं ॥ २०० ॥
ऐसे अद्भुत औ' भयंकर । देखता है रूप धनुर्धर ।
कई सालंकृत औ' सुंदर । तथा सौम्य भी ॥ १ ॥
ज्ञान-चक्षुसे किया अवलोकन । किंतु न होता मुखोंका अंत न जान ।
स-कौतुक देखने लगा नयन । विश्व रूपके ॥ २ ॥
नाना वर्णका मानो कमल-वन । विकसित हो रहा था यह जान ।
आदित्य-समुदायसे वे नयन । देखने लगा पार्थ ॥ ३ ॥
जैसे कृष्ण मेघ-घटाओंमें । कौंधती बिजली प्रलयमें ।
वैसी देखी भ्रू-भंग तलमें । पिंगलानलकी ॥ ४ ॥
अनेक मुख औ' आंखें जिसमें अति अद्भुत ।
बहु दिव्य अलंकार अनेक दिव्य आयुध ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी ३५०

देखनेमें आश्चर्य एकैक । उसी विश्व-रूपमें जो एक ।
अनेकताका दर्शन-सुख । हुआ फल-प्रद ॥ ५ ॥
कहां हैं इसके चरण । कहां है मुकुट विस्तीर्ण ।
बढ़ती इच्छा प्रतिक्षण । देखनेकी ॥ ६ ॥
रखी वहां भाग्य-निधि पार्थ । होंगे कैसे निष्फल मनोरथ ।
रखता क्या भातेमें बाण व्यर्थ । पिनाकपाणी ॥ ७ ॥
नहीं तो ब्रह्मदेवकी गिरापर । होते हैं क्या झूटे अक्षर ।
इसीलिये साद्यंत जो है अपार । देखा विश्व-रूप ॥ ८ ॥
नहीं होता जो वेदको आकलन । उसका सकलावयव दर्शन ।
एक समय करते हैं नयन । धनंजयके ॥ ९ ॥
चरणोंसे मुकुट पर्यंत । देखता है रूप-श्रेष्ठ पार्थ ।
नाना रत्नालंकार भूषित । झलक सुंदर ॥ २१० ॥
पर-ब्रह्म बना स्वयं भूषण । सजानेके लिये अपना तन ।
उन अलंकारोंका मैं वर्णन । करूं कैसे ॥ ११ ॥
उसकी जो प्रभा अतीव उज्ज्वल । निखारती थी चंद्रादित्य मंडल ।
थी जो वह महातेजकी चित्कला । उससे प्रकटता विश्व ॥ १२ ॥
वह जो दिव्य-तेज शृंगार । किसीकी बुद्धिको हो गोचर ।
पहना हरि ने अलंकार । देखता पार्थ ॥ १३ ॥
शरीर था वही अलंकार । जो है हाथ वही हथियार ।
जो है शरीरी वही शरीर । स-चराचरमें वही ॥ १४ ॥
वही फिर ज्ञान दृष्टिसे निर्मल । देखता कर-पल्लव जो सरल ।
वहां तोडते जो कल्पांतक ज्वाल । ऐसे शस्त्र करमें ॥ १५ ॥
उसके किरणोंके स्फुलिंग । नक्षत्रोंको बनाते जो मूंग ।
उसके तेजमें छिपी आग । घुसती सिंधुमें ॥ १६ ॥
फिर कालकूट कल्लोलके तरंग । अथवा विद्युतवनके विस्फुलिंग ।
दीखते हैं कर-पल्लव अभंग । उचितायुध-युक्त ॥ १७ ॥
३५१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥
विश्वरूपकी भयानकतासे विह्वल होकर दृष्टि मूंद लेना—
उस भयसे हटाकर दृष्टि । देखता कंठ मुकुट किरीटी ।
हुई है सुरतरुकी जो सृष्टि । मानो वहींसे ॥ १८ ॥
मूल-सिद्धीका जहां महा-पीठ । शांत कमलाका विश्राम मठ ।
ऐसे सुमनों से वह किरीट । सजा हुआ ॥ १९ ॥
मुकुट पर पुष्प स्तवक । तथा पूजा अंध जो अनेक ।
गलेमें झूलते अलौकिक । पुष्पहार ॥ २२० ॥
सूर्य तेजसे स्वर्गको लपेटना । मेरु-गिरिको सुवर्णसे ओढ़ना ।
वैसा था उसका भव्य पहनना । पीतांबर सुंदर ॥ २१ ॥
शंकरको कर्पूरसे लेपना । कैलासको पारदसे पोतना ।
अथवा सागरको ही ओढ़ना । क्षीरार्णवसे ॥ २२ ॥
अजी ! चंद्रमाकी तह खोलकर । आवरण डालना आकाशपर ।
वैसे ही था उसके सर्वांग पर । चंदन लेपन ॥ २३ ॥
स्व-प्रकाशकी आभा जिससे बढ़ती । तथा ब्रह्मानंदकी उष्णता मिटती ।
पृथ्वी है अपना अस्तित्व टिकाती । उस सुगंधसे ॥ २४ ॥
ब्रह्मा जिसका लेपन करता । अनंग भी उबटन करता ।
उस परिमलकी जो महत्ता । बखाने कौन ॥ २५ ॥
ऐसी अंगर शोभा देखकर । विस्मित-सा रहा पांडुकुमार ।
यह भी न समझा देखकर । देव बैठा है या सोया है ? ॥ २६ ॥
दृष्टि खोलकर देखता बाहर । जब वही विश्व-रूप सभी ओर ।
आंख मूंदकर देखता ऊपर । तब भी वही रूप ॥ २७ ॥
सम्मुख देखें मुख अगणित । पीछे मुड देखा हो भयग्रस्त ।
वहां भी वही मुख पाया हाथ । तथा दिव्य-रूप ॥ २८ ॥
दिव्य वस्त्र पुष्प माला भूषित दिव्य गंधसे ।
सब आश्चर्यसे पूर्ण विश्व-व्यापी अनंत जो ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी ३५२

देखनेसे दीखना है स्वाभाविक । ना कछु इसमें विस्मय-जनक ।
किंतु न देखते भी दीखना एक । महादाश्चर्य ॥ २९ ॥
अनुग्रहकी यह कैसी करतूत । देखता या नहीं देखता वह पार्थ ।
उसके सह कर लिया आच्छादित । नारायणने ॥ २३० ॥
पड़कर विस्मय प्रवाहमें । निकलकर किनारा छूनेमें ।
उलझता आश्चर्य सागरमें । अनायास ॥ ३१ ॥
ऐसे ही उस अनंत-रूपके । अलौकिक दर्शन-कौशल्यके ।
जालमें धनंजय उलझके । हो रहा विस्मित ॥ ३२ ॥
श्री कृष्ण विश्वतोमुख स्वभावसे । दर्शनार्थी जो पार्थकी प्रार्थनासे ।
विश्वरूप हुआ है संपूर्णतासे । इस समय ॥ ३३ ॥
दीप या सूर्य-तेजमें है देखती । या आंख मूंदनेसे नहीं देखती ।
वह दिव्य-दृष्टि ऐसी नहीं थी । दी जो श्रीकृष्णने ॥ ३४ ॥
पार्थ देखता तब दोनों ओर । आंख खोलकर या मूंदकर ।
कहता नगरमें बैठकर । संजय राजासे ॥ ३५ ॥
कहता है “सुनो” यह संजय । विश्व-रूप देखता धनंजय ।
नानाभरणयुत स-विस्मय । विश्वतोमुख ॥ ३६ ॥
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ १२ ॥
अनंत सूर्योंसे भी वह तेजस्वी रूप --
उस देवके जो अंग-प्रभाकी । बात कहनी है सो कहनेकी ।
जैसे द्वादशादित्य मिलनकी । प्रभा-सी कल्पांतमें ॥ ३७ ॥
अजी ! सहस्रावधि दिव्य-सूर्य । उदय हुए एक ही समय ।
फिर भी है वह अनुपमेय । उस दिव्य-प्रभासे ॥ ३८ ॥
प्रभा सहस्र सूर्योंकी नभमें एक हो दिखे ।
तभी उस महात्माकी प्रभासे तुल्य है नहीं ॥ १२ ॥
३५३
(45) विश्व-रूप-दर्शनयोग

सभी विद्युल्लताओका हो मिलन । तथा प्रलयाग्निके सारे सामान ।
उसीमें जो दश-तेजोंका मिलान । करने पर भी ॥ ३९ ॥
उस शरीर-कांतिके सम्मुख । पास पास आएगा देख ।
किंतु उसके सम नहीं चोख । यह निश्चित ॥ २४० ॥
ऐसा महात्म्य उसका सहज । फैलता है अंगका सब तेज ।
व्यासकी कृपासे मैं वह आज । यहां देखता हूँ ॥ ४१ ॥
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३ ॥
दृश्य और दृष्टाका अद्वय-भाव—
उस विश्व-रूपमें एक ओर । जगत है अपना सविस्तर ।
रहते जैसे बुल्ले ठौर ठौर । महा-सागरमें ॥ ४२ ॥
अथवा आकाशमें गंधर्व-नगर । भूतलमें पिपीलिका बांधती घर ।
तथा परमणु मेरु-पर्वतपर । उड़ते रहते हैं ॥ ४३ ॥
इस भांति विश्व अपरंपार । देव चक्रवर्तिके तन पर ।
उस अवसर पांडुकुमार । देखता है ॥ ४४ ॥
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १४ ॥
एक विश्व वहां और एक आप । ऐसा दुजा भाव था जो अल्प स्वल्प ।
उसका भी अंतःकरणमें लोप । हुवा अचानक ॥ ४५ ॥
जागृत हुआ ब्रह्मानंद अंदर । शरीर बल खोया यहां बाहर ।
डूबा आनंद पुलकमें शरीर । अपाद्-मस्तक ॥ ४६ ॥
विश्वके जो सभी भेद जैसे घुल गये तब ।
अर्जुनने वहां देखे देहमें देवदेवके ॥ १३ ॥
फिर अर्जुन साश्चर्य हर्ष रोमांच गात्रसे ।
प्रभुसे जोडके हाथ बोला हो नत मस्तक ॥ १४ ॥
ज्ञानेश्वरी ३५४

वर्षाका जैसे प्रथम काल । सर्वांग हरा होता है शैल ।
वैसे रोम-कूपमें सकल । खिले रोमद्रुम ॥ ४७ ॥
स्पर्श होते ही चंद्रकिरण । होता सोम-कांतका द्रवण ।
तन पर वैसे स्वेद-कण । उमड़ आये ॥ ४८ ॥
फंस जानेसे जैसे अलिकुल । झूलती कमल कलि सकल ।
हृदय-आनंदोर्मियोंके बल । सिहरता वैसे ॥ ४९ ॥
कर्पूर-केलिका गर्भ-पुट जैसे । छीलकर कर्पूर चूता वैसे ।
अर्जुनके नयन-कमलोंसे । चूते अश्रुकण ॥ २५० ॥
सात्त्विकताके ये जब अष्ट भाव । परस्परमें करते हैं उछाह ।
पाता है तब ब्रह्मानंदका जीव । दिव्य-साम्राज्य ॥ ५१ ॥
उदित होते ही सुधाकर । सानंद उमड़ता सागर ।
बार बार वैसे ऊर्मि भर । आती हृदयमें ॥ ५२ ॥
अजी ! सुखानुभवके कारण । कृपासे किया था द्वैत रक्षण ।
आह भर करके प्रतिक्षण । देखता पार्थ ॥ ५३ ॥
मुख कर बैठा था जिस ओर । उसी ओर मस्तक नवाकर ।
प्रणाम किया हाथ जोड कर । औ' किया स्तवन ॥ ५४ ॥
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५ ॥
अर्जुनने कहा
हे देव देखूं तव देहमें मैं
हैं देव औ' भूत समूह सारा ।
ध्यानस्थ ब्रह्मा कमलासनस्थ
महर्षि औ' नाग हैं एक साथ ॥ १५ ॥
३५५ विश्व-रूप-दर्शनयोग

सर्वत्र सभी तू ही तू भरा है प्रभो—
कहता है प्रभो तेरी जय जय । तब कृपासे ही यह धनंजय ।
दर्शन कर सका इस समय । यह विश्व-रूप ॥ ५५ ॥
सच ही प्रभो तूने भला किया । हृदय यह आनंदित भया ।
तू ही है यह मैंने देख लिया । आश्रय विश्वका ॥ ५६ ॥
अनेक वन जैसे मंदार पर । श्वापदों सह लगे हैं ठौर ठौर ।
वैसे ही यहाँ तेरे शरीर पर । भुवन हैं अनेक ॥ ५७ ॥
अथवा गोदमें आकाशके । दीखते हैं मंडल ग्रहोंके ।
होते हैं झुण्ड पक्षी-कुलके । वृक्ष पर ॥ ५८ ॥
उसी भांति हे चक्रधर । विश्वात्मक तेरा शरीर ।
स्वर्गकेलिये भी है घर । देव गणोंके ॥ ५९ ॥
स्वामी ! महाभूतोंका पंचक । देखता हूं मैं यहां अनेक ।
तथा भूत-ग्राम जो अनेक । भूत-सृष्टिके ॥ २६० ॥
तुझमें दीखता है सत्य-लोक । बैठा है ब्रह्म-देव चतुर्मुख ।
वहां उस ओर कैलास एक । देखता मैं ॥ ६१ ॥
भवानी सह महादेव । तुझमें तू दीखता केशव ।
एकांशमें तुझमें ये सर्व । दीखते यहां ॥ ६२ ॥
वैसे ही कश्यपादि ऋषि-कुल । दीखते इस मूर्तिमें सकल ।
दीखते हैं यहां सप्त पाताल । शेष-नाग सह ॥ ६३ ॥
अथवा मानो त्रिभुवन-पति । तेरे अंगांगकी एकेक भित्ति ।
चतुर्दश भुवन चित्राकृति । सजाती है ॥ ६४ ॥
तथा यहां दीखते जो जो लोक । मानो चित्र रचना है अनेक ।
गोचर होता यहां अलौकिक । तेरा गांभीर्य ॥ ६५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३५६

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६ ॥

देखता मैं दिव्य चक्षुसे । जहां तहां सभी ओरसे ।
भुजदंडमें भरे जैसे । महा आकाश ॥ ६६ ॥
वैसे एक ही निरंतर । देखनेसे हैं तेरे कर ।
करते संपूर्ण व्यापार । एक कालमें ॥ ६७ ॥
तथा ब्रह्मका है विस्तार । खोलता ब्रह्मांड भांडार ।
वैसा दीखता उदर । तेरा असीम ॥ ६८ ॥
कहते हैं सहस्रशीर्ष पुरुष । देखता मैं अनंत-शीर्ष पुरुष ।
लगता पर-ब्रह्म हो आया मुख । इसं समय ॥ ६९ ॥
जहां तहां देखता तेरे वदन । विश्व-रूपमें जो है विराजमान ।
वहीं दीखते हैं अनंत नयन । पंक्ति बद्ध हो ॥ २७० ॥
रहने दो यह स्वर्ग पाताल । तथा धरणी दिशा अंतराल ।
इसी रूपमें भरा है सकल । मूर्तिमय हो ॥ ७१ ॥
कहीं नहीं है तेरे बिन । परमाणु-सा रिक्त स्थान ।
यह देख कहता मन । कितना व्यापक तू ॥ ७२ ॥
नाना प्राणि जात सहित । भरे हुए जो महाभूत ।
तूने व्यापलिये अनंत । देखता मैं ॥ ७३ ॥

विश्व-रूपके संबंधमें अर्जुनकी जिज्ञासा—

अनेक आंखें मुख हाथ पेट
जहां तहां देखूं अनंत मूर्ति ।
दीखे नहीं अंत न मध्य मूल
विश्वेश्वरा जो तव विश्वरूप ॥ १६ ॥

३५७ विश्व-रूप-दर्शनयोग

ऐसा तू कहांसे आया है। बैठा है खड़ा या सोया है।
तेरी आकृति कितनी है। किस मांके उदरमें ? ॥ ७४ ॥
तेरा रूप कैसा वय कितना । तेरे आदि औ' अंतकी भावना ।
तू किस भांति है यह जानना । चाहता अब ॥ ७५ ॥
देख लिया मैने यह संपूर्ण । तू ही है अपना स्थान श्रीकृष्ण ।
न तू किसीका औ' न है कारण । अनादि सिद्ध तू ॥ ७६ ॥
न तू बैठा है न खड़ा है । न छोटा है या न बड़ा है।
नीचे ऊपर सर्वत्र है । केवल तू ही ॥ ७७ ॥
रूपमें है तू अपनासा । वयमें भी तू है तुझ-सा ।
उदर पीठ भी परेशा । तेरा तू है ॥ ७८ ॥
क्या कहना है अब बात । तुझमें तू पूर्ण अनंत ।
बार बार सोचके ज्ञात । हुवा यह मुझको ॥ ७९ ॥
किंतु तेरे इस रूपमें एक । रह गया व्यंग कहता देख ।
आदि मध्य अंतका निकष । नहीं दीखता ॥ २८० ॥
देखा मैंने सर्वत्र कहीं । इन बातोंका पता नहीं ।
तुझमें तीनों कहीं नहीं । ये विशुद्ध रूप ॥ ८१ ॥
ऐसा आदि मध्यांत रहित । विश्वेश्वर तू अपरिमित ।
देखा है मैंने आज तत्वतः । विश्व-रूप ॥ ८२ ॥
तू है ऐसा महा विश्व-रूप । तेरे तनमें हैं अन्य रूप ।
तभी नाना वस्त्र अपरूप । पहने हैं तूने ॥ ८३ ॥
अथवा नाना रूप द्रुमांकुर । तेरे स्वरूप-महाचल पर ।
दिव्यालंकार फल पुष्प धर । उमड आये हैं ॥ ८४ ॥
अथः तू है स्वरूप सागर । अनेक रूप मात्र ये लहर ।
या तू एक महा-वृक्ष सुंदर । फला रूप-फलोंसे ॥ ८५ ॥
भूतोंसे भरा जैसे भूतल । या नक्षत्रोंसे नभ-मंडल ।
वैसे तू मूर्ति-मय सकल । बना स्वामी ॥ ८६ ॥
ज्ञानेश्वरी ३५८

तेरा एकेक अंग-प्रांत । होता जाता है त्रि-जगत ।
विश्व-रूप ऐसा है मूर्त । रोम रोममें भरा ॥ ८७ ॥
लगाकर तू ऐसा विश्व-पसारा । कौन कहांसे ले आया है शरीर ।
सोच देखा तो सारथी तू हमारा । वही जो जनार्दन ॥ ८८ ॥
सोचना हूं तब तू मुकुंद । ऐसा ही व्यापक सर्वदा ।
भक्तानुकंपार्थ तू हो मुग्ध । बना है सारथी ॥ ८९ ॥
चतुर्भुज तू शाम मनमोहन । देखकर होते हैं तृप्त नयन ।
करनेमें तब प्रेमालिंगन । आना भुजाओंमें ॥ २९० ॥
ऐसी सुंदर मूर्ति तू स्रूप । भक्तसे हो आता है विश्व-रूप ।
किंतु हमारी दृष्टि है सलेप । देखते हम सामान्य ॥ ९१ ॥
गयी है अब दृष्टिकी मलीनता । सहज दी तूने दृष्टिमें दिव्यता ।
इसीलिये जाना मैंने यथार्थता । महिमा तेरी ॥ ९२ ॥
उस मरियलके उस पार । छिपा था रूप जो ना ओर छोर ।
वह सम्मुख आया भयंकर । पहचाना मैंने ॥ ९३ ॥
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोरार्शि सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्
दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७ ॥
वही मुकुट जो पस्तक पर । दीखता है यहां धरणी धर ।
अज है उसका तेज अपार । है अति विस्मय ॥ ९४ ॥
प्रभो गदा चक्र किरीट धारी
प्रकाश सर्वत्र भरा प्रचंड ।
देखा न जाता वह अप्रमेय
जला रहे सूरज अग्नि ज्योति ॥ १७ ॥
३५९ विश्व-रूप-दर्शनयोग

भक्त मनोरथार्थ विश्व-रूप बना ऋषिकेश—
ऊपरका जो यह हाथ । चक्रचलानेमें है रत ।
वह चिन्ह स्पष्ट है तात । विश्व-मूर्तिका ॥ ९५ ॥
वहीं दूसरे हाथमें गदा । नीचेका हाथ है निरायुध ।
रास संभालते है गोविंद । सरसाते जो ॥ ९६ ॥
तथा उसी वेगसे तू सहसा । मेरे मनोरथार्थ ऋषीकेश ।
विश्व-रूप बना है विश्वेश । जानता हूं मैं ॥ ९७ ॥
किंतु है क्या यह अतिओज । मौका है न सोचनेका आज ।
हुवा है मेरा चित्त अबूझ । अतिशय तात ॥ ९८ ॥
यह विश्व-रूप है भी या नहीं । सोच ऐसा श्वास चलता नहीं ।
अंग-प्रभाकी जो यह नवाई । भरी है सर्वत्र ॥ ९९ ॥
इस तेजसे नयन झुलसता । सूर्य मलिन खद्योतसा भासता ।
ऐसी तीव्र है जिसकी अद्भुतता । यहां आज ॥ ३०० ॥
यह मानो महा-तेजका महार्णव । विश्वको डुबो देता है कर तांडव ।
युगांतका वज्रपात जैसे देख । ढक देता है ॥ १ ॥
अथवा संहार तेजकी जो ज्वाल । तोड़के मंडप बांधा अंतराल ।
दिव्य-चक्षुसे अब नभ-मंडल । देखा नहीं जाता ॥ २ ॥
अधिकाधिक प्रकाश उज्ज्वल । जलाता बनकर महाज्वाल ।
देखनेसे होती दृष्टि व्याकुल । दिव्यता होने पर भी ॥ ३ ॥
अथवा महा-प्रलयका प्रचंड । होता है जो कालाग्निरुद्रमें गूढ़ ।
उस तीसरे नयनके प्रगाढ़ । खुले हैं पलक ॥ ४ ॥
तथा फैला यह प्रकाश । पंचाग्नि-ज्वालाओंके पाश ।
करते ब्रह्मांडका शोष । अळकर ॥ ५ ॥
तेजाराशी है जो ऐसी अद्भुत । देखता मैं आज ही हो चकित ।
तेरी कांतिकी व्याप्ति है अनंत । विश्व-रूप ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६०

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ १८ ॥
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम्
अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम्
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥ १९ ॥
तेरे तेजसे सारा विश्व संतप्त है प्रभो—
हे देव तू है अक्षर । त्रिअर्थ मात्रासे पर ।
श्रुति है जिसका घर । ढूंढती है ॥ ७ ॥
आकारका तू आयतन । विश्व निक्षेपका निधान ।
वह अव्यय तू गहन । अविनाशी जो ॥ ८ ॥
धर्मका है तू जीवन । अनादि नित्य-नूतन ।
सैंतीसवा तू महान । पुरुष विशेष ॥ ९ ॥
तू है आदि मध्यांत रहित । सर्व सामर्थ्यसे तू है अनंत ।
विश्व-बाहु तू अपरिमित । विश्व-चरण तू ॥ ३१० ॥
असीम तू अक्षर जाननेका
तू ही महा आश्रय विश्वका है ।
तू राखता शाश्वत-धर्म नित्य
मैं जानता तू परमात्म तत्व ॥ १८ ॥
अनादि मध्यांत अनंत शक्ति
अनेक भुजा मुख अग्नि-ज्योति ।
आंखें दिखे उज्ज्वल चन्द्र सूर्य
स्वतेजसे तू जगको तपाता ॥ १९ ॥
(46) ३६१ विश्व-रूप-दर्शनयोग

मानो सूर्य चंद्रकी जो कला । तेरी कोप-प्रसाद लीला ।
कृपा दृष्टिसे कर संभाल । कोप कटाक्षसे क्रोध ॥ ११ ॥
इस भांति मैं अब देखता । प्रख्याग्नि तेज-सा अनंत ।
तेरे बदनकी जो दिव्यता । विस्मित होकर ॥ १२ ॥
आगसे धधकते पर्वत । निकलती ज्वालायें अद्भुत ।
जैसे चाटते हैं दाढं दांत । ज्वाला जिव्हा ॥ १३ ॥
इस बदनकी जो है ऊब । तथा सर्वांग-कांतिकी प्रभा ।
करती विश्वमें अति क्षोभ । अकुलाहट भरा ॥ १४ ॥
द्यावापृथिव्योरिदमंतरं हि
व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं
लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥
जो देख अकुला रहा त्रिलोक —
भूलोक और पाताल । पृथ्वी तथा अंतराल ।
दश दिशायें आकुल । है दिशा चक्र ॥ १५ ॥
तुझसे है जो यह संपूर्ण एक । भरा हुवा देखता मैं सकौतुक ।
गगन सह डूबा है, भयानक । विश्व-रूपमें ॥ १६ ॥
या रस लहरोंसे अद्भुत । चतुर्दश भुवन हैं व्याप्त ।
वैसे मैं हो अत्यंत विस्मित । देखूं क्या क्या ॥ १७ ॥
अनाकलित व्याप्ति जो असाधारण । सही न जाती रूपकी उग्रता-तीक्ष्ण ।
सुख गया दूर, यहां विश्वके प्राण । निकले भयसे ॥ १८ ॥
सभी दिशा विस्तृत अंतरिक्ष
सर्वत्र तू एक हि छा रहा है ।
तेरा यही अद्भुत उग्र रूप
जो देख अकुला रहा त्रिलोक ॥ २० ॥
ज्ञानेश्वरी ३६२

तुझको देखकर हे विश्वेश्वर । न जाने आया कैसे भय उभर ।
डूब रहा है अब दुःख सागर । लहरियोंमें त्रिलोक ॥ १९ ॥
वैसे तुझ महात्माका दरशन । वहां क्या है भय दुःखका स्थान ।
जिससे न होता सुखका ज्ञान । इसका भान है मुझे ॥ ३२० ॥
जब तक तेरा रूप नहीं देखा । तब तक जगको संसार चोखा ।
देखने पर विजय विष चरखा । हुई अरुचि ॥ २१ ॥
आगे रूप नहीं होता आकलन । जिससे नहीं होता प्रेमालिंगन ।
पीछे दीखता है संसार मलिन । ऐसा उभय संकट ॥ २२ ॥
तभी पीछे हठे तो संसार । जो है रुकावट अनिवार ।
आगे तू अनिवार अपार । न होता आकलन ॥ २३ ॥
ऐसा है उभय संकटग्रस्त । त्रिभुवन होता है अतित्रस्त ।
मेरा मत हुव ऐसा निश्चित । यह रूप देखके ॥ २४ ॥
संतापसे जो ऐसा झुरसा हुआ । उपशमार्थ सिंधुपे आया हुआ ।
तरंग तांडव देख डरा हुआ । रहता है जैसे ॥ २५ ॥
ऐसा हुआ यह विश्व समस्त । तुझे देख तड़पनेमें रत ।
उससे भला पैर तीर प्राप्त । ज्ञान-संपन्न देव ॥ २६ ॥
अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति
केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः
स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१ ॥
अविद्या-सिंधु और स्वर्ग संसार फंदोंसे मुक्तिके लिये तेरी प्रार्थना—
ये देव सारे तुझमें समाये
कोई भयग्रस्त हो बद्ध-हस्त ।
मांगल्य गाके तब सिद्ध-संत
स्तवते तुझीको अनेक भांति ॥ २१ ॥
३६३ विश्व-रूप-दर्शनयोग

तेरे शरीरका यह जो तेज । जलाता है सारे कर्मका बीज ।
जिससे तुझमें मिलते निज । सद्भावनासे ॥ २७ ॥
तथा जो हैं सहज भय-भीत । होकर तेरे पथके अमित ।
गाते हैं तेरी प्रार्थनाके गीत । कर जोड करके ॥ २८ ॥
देव ! डूबे हैं अविद्या-सिंधुमें । फंसे हैं विषय-विष-जालमें ।
फंसे हैं स्वर्ग-संसार फंडोंमें । दोनों ओरसे ॥ २९ ॥
ऐसे हमको करनेमें मुक्त । कौन हैं त्रिभुवनमें समस्त ।
आये हैं हम सो शरणागत । कहते हैं ये ॥ ३० ॥
तथा महर्षि अथवा सिद्ध । विद्याधर संघ जो विविध ।
गाते हैं तेरा ही स्वस्तिवाद । तथा शुभ-स्तवन ॥ ३१ ॥
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या
विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गंधर्वयक्षासुरसिद्धसंघा
वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥
रुद्र-आदित्योंके ये समुदाय । वसु साध्य आदि ये देव ।
अश्विनी विश्वे-देव स-वैभव । मरुत भी वहां ॥ ३२ ॥
सुनो अग्नि तथा गंधर्व । यक्ष राक्षस गण सर्व ।
महेंद्रादि जो मुख्य देव । तथा सिद्धादिक ॥ ३३ ॥
ये सब धर अपना स्वस्थान । विस्मित करते अवलोकन ।
महा-मूर्तिका है दिव्य-दर्शन । देखता हूँ मैं ॥ ३४ ॥
आदित्य विश्वे वसु रुद्र साध्य
कुमार दोनों पितृ-देव वायु ।
गंधर्व दैत्यों सह यक्ष सिद्ध
सारे तुझे विस्मित देखते हैं ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी
३६४

फिर देखते हैं क्षणक्षण । विस्मययुत अंतःकरण ।
नत-मस्तक हो समर्पण । करते निज मुकुट ॥ ३५ ॥
जय घोषके कलरव मधुर । गूंजते हैं स्वर्गमें जो सुंदर ।
रखे हैं ललाट पर सुंदर । कर संपुट नमनार्थ ॥ ३६ ॥
वह नम्रता-वृक्ष बन सकळ । खिला सात्विक वसंतसे सकाळ ।
तभी उस कर-संपुटमें फल । लगा यह तेरा ॥ ३७ ॥
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं
महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं
दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥ २३ ॥
नयनोंका हुवा यह भाग्योदय । या जीवोंका सुख सुकाळ उदय ।
तभी हुवा तेरे रूपका सदय । भव्य दर्शन ॥ ३८ ॥
रूप है जो यह लोक-व्यापक । चहूं ओरसे देखता सम्मुख ।
देवोंके लिये भी जो भयानक । देखके चौंकते हैं ॥ ३९ ॥
ऐसा एक किंतु है विचित्र । तथा भयानक हैं वक्त्र ।
बहु लोचन तथा सशस्त्र । भुजा असंख्य ॥ ३४० ॥
अनेक जो चारु-चरण । बहु उदर नाना-वर्ण ।
प्रति वदन मद-पूर्ण । आवेशसे ॥ ४१ ॥
अथवा महा-प्रलय समय । पाशमें बांधकर यमराय ।
प्रलयाग्नि जलाता भयमय । जहां तहां सर्वत्र ॥ ४२ ॥
या संहार त्रिपुरारिका यंत्र । या प्रलय-भैरवका जो क्षेत्र ।
अनेक युगांत शक्तिका पात्र । आगे किये विनाशाथर्य ॥ ४३ ॥
विशाल है रूप असंख्य नेत्र
करालं दाढें मुख हाथ पैर ।
अनेक हैं ऊरु विशाल पेट
ये देख हूँ व्याकुल लोक मैं भी ॥ २३ ॥
३६५ विश्व-रूप-दर्शनयोग