ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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ज्ञानविज्ञानयोग
भगवान उवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १ ॥
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २ ॥
प्रापंचिक ज्ञान विज्ञान है, इसको सत्य मानना अज्ञान -
सुन तू अब पार्थ । कहता है अनंत ।
हुआ है योग-युक्त । इस समय ॥ १ ॥
जानता तू मुझे पूर्ण रूपसे । हथेली पर रखे रत्नके जैसे ।
अब तुझे ज्ञान कहूंगा मैं वैसे । विज्ञान सह जो ॥ २ ॥
यहां विज्ञानका है क्या करना । ऐसी यदि तेरी मनो भावना ।
किंतु उसको पहले जानना । आवश्यक यहां ॥ ३ ॥
क्यों कि ससयमें स्वरूपज्ञानके । मिटता यह नयन पहुंचके ।
जैसे किनारेसे लगे जहाजके । नहीं है वेग ॥ ४ ॥
श्री भगवानने कहा
.चित्ते आसरा मेरा लेके जो योग साधते ।
कसे समग्र निःशंक जानेंगे मुझसे सुन ॥ १ ॥
˙ विज्ञान सह जो ज्ञान संपूर्ण कहता तुझे ।
जानके जो नहीं अन्य जगमें जानना रहा ॥ २ ॥