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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 271

होती नहीं पहुंच वहां ज्ञानकी । पुच्छ प्रगति होती है विचारकी ।
भोथरा हो जाती है धार तर्ककी । उस समय ॥ ५ ॥
नाम है जिसका ज्ञान अर्जुन । उससे भिन्न प्रपंच विज्ञान ।
वहां सत्य बुद्धि ही है अज्ञान । जान तू यह ॥ ६ ॥
अन्त होगा जब अज्ञानका । निवारण होगा विज्ञानका ।
तब साक्षात् होगा ज्ञानका । अपनेमें पूर्ण ॥ ७ ॥
रहस्य है ऐसा जो गूढ । वह करूंगा शब्दरूढ ।
जिसका पूर्ण करूंगा कोड । मनका मैं ॥ ८ ॥
जिससे है मिटता प्रवचन । सुननेवालोंका भी व्यसन ।
मिटता है यह सब अज्ञान । ऊंच नीचका ॥ ९ ॥
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ ३ ॥
मुझे जाननेवाला कोई एकाद होता है—
सहस्रो मनुष्योंमें कहीं एक । चाह करता इस विषयकी नेक ।
चाहनेवालोंमें भी कहीं एक । पाता है मुझे ॥ १० ॥
जैसे भरा हुआ भुवन । एकेक छंटके अर्जुन ।
करते संघटित सेना । लक्षाधिक ॥ ११ ॥
उसमें भी कहीं एक । सहते घात अनेक ।
पाता है विजयश्रीका । सिंहासन ॥ १२ ॥
आस्थाके इस महापूरमें । कूदते हैं जन करोडोंमें ।
पहुंचता है पैल-तीरमें । कोई एक ॥ १३ ॥
इसीलिये यह नहीं सामान्य । कहनेमें भी यह असामान्य ।
फिर कहेंगे तुझे वह अन्य । अब सुन विज्ञान ॥ १४ ॥
शत सहस्रमें एक मोक्षार्थ जुटता कभी ।
जुटते उसमें कोई तत्त्वता जानते मुझे ॥ ३ ॥
(26) २०१ ज्ञान विज्ञानयोग