सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 268, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 268

था जो भजकोंका भजनीय । तथा पूजकोंका पूजनीय ।
और याज्ञिकोंका यजनीय । सदा सर्वत्र ॥ ७७ ॥
वही तत्व जो पूर्ण । हुआ स्वयं निर्वाण ।
जो साधना कारण । सिद्ध तत्व ॥ ७८ ॥
तभी कर्म निष्ठोंमें वंद्य । तथा ज्ञानियोंमें है वेद्य ।
है वह तापसमें आद्य । तपोनाथ ॥ ७९ ॥
जीव और परमात्म-संगम । जिसका है ऐसा मनोधर्म ।
होती है उस तनकी महिमा । अपार यहां ॥ ४८० ॥
तभी मैं इस कारणसे । कहता हूं सदा तुझसे ।
योगी हो अंतःकरणसे । अर्जुन तू ॥ ८१ ॥
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनांतरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ ४७ ॥
अजी योगी जो कहलाता । देवोंका वह देव होता ।
मेरा सुख सर्वस्व तथा । चैतन्य ही वह ॥ ८२ ॥
जिसके भजनसे भजनीय भजन । तथा यह भक्ति साधन स्वयं संपूर्ण ।
हुआ वह स्वयं अनुभवसे तू जान । अखंडित ॥ ८३ ॥
फिर हमारे प्रेमका । स्वरूप नहीं वाचाका ।
अनिर्वचन है उसका । विषय अर्जुन ॥ ८४ ॥
वह है जो प्रेम एकात्म । उसकी है योग्य उपमा ।
मैं शरीर और वह आत्मा । यही एक ॥ ८५ ॥
ऐसा भक्त चकोर-चंद्र । वह भुवनैक नरेंद्र ।
बोला सर्वगुण समुद्र । कहता संजय ॥ ८६ ॥
जहां पहलेसे ही पार्थ । जानना चाहता था सार्थ ।
जान लिया है यदुनाथ । हुआ अधीर ॥ ८७ ॥
श्रेष्ठ है योगियोंमें जो मुझमें प्राण रोपके ।
भजता मुझ श्रद्धासे मानता श्रेष्ठ मैं उसे ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी १९८