सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

इस निश्चलताके सम्मुख दुःख नहीं रहता --
फिर मेरुसे भी बहुत । यातनाके बडे पर्वत ।
पडनेपर भी चित्त । टूटता नहीं ॥ ६९ ॥
या शस्त्रसे तोड़ा तन । अग्निमें जला बदन ।
चित्त है सुखमें लीन । अविचल ॥ ३७० ॥
अपनेमें होकर रत । भूल जाता देहको चित्त ।
सुखरूप होके सतत । रहता अपनेमें ॥ ७१ ॥
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३ ॥
उस सुखमें होकर लीन । भूलता विषय-सुख मन ।
संसार सुखमें अनुदिन । उलझाया जो ॥ ७२ ॥
वह है योगिका सौभाग्य । स्वसंतोषका है साम्राज्य ।
ज्ञान भानका है उद्देश्य । पांडुकुमार ॥ ७३ ॥
योगाभ्याससे वह सतत । देखना पडता मूर्तिमंत ।
देखनेसे बनता स्वगत । एकरूप ॥ ७४ ॥
संकल्प प्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ २४ ॥
जो वास्तविक हितका है वह इंद्रियोंको दुःखदायक लगता है—
किंतु यह योग अर्जुन । एक ढंगसे आसान ।
संकल्पको दिखाता महान । पुत्रशोक ॥ ७५ ॥
उसको कहते योग दुःखका जो वियोग है ।
दृढ निश्चयसे पाना वह योग उमंगसे ॥ २३ ॥
संकल्पजन्य जो काम तजके पूर्ण रूपसे ।
मनसे ही इंद्रियोंको विषयोंसे निकालना ॥ २४ ॥
१८५
(24) आत्म-संयमयोग

सुनकर हुवा वासनाका अंत । इंद्रियोंको देख नियममें स्थित ।
शोक विव्हल होकर होगा मृत । अपने आप ॥ ७६ ॥
यदि वैराग्यने यह किया । संकल्पका झमेला ही गया ।
धृति घरमें बुद्धि निर्भय । रहेगी सुखसे ॥ ७७ ॥
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥२५॥
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरं ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ २६ ॥
जब हो धृति-धीका बसति स्थान । अनुभव पथसे चलके मन ।
कर लेता अपना प्रतिष्ठापन । आत्म-भुवनमें ॥ ७८ ॥
होती है इस भांति । आत्म-तत्वकी प्राप्ति ।
यह भी असाध्य होती । सुनो अन्य मार्ग ॥ ७९ ॥
करेगा जो एक नियम निश्चित । उसकी सीमामें ही रहो सतत ।
तन मनसे उसकी आज्ञा रत । रहना निष्ठासे ॥ ३८० ॥
इससे हुआ यदि स्थिर-चित्त । माना सहज हुआ कार्य कृतार्थ ।
नहीं तो छोड़ देना चित्तको मुक्त । अपने मार्गसे ॥ ८१ ॥
फिर चित्त जहां जावेगा । वहांसे नियम्य लायेगा ।
इससे स्थैर्यका बनेगा । अभ्यास उसको ॥ ८२ ॥
प्रशांत मनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ २७ ॥
होना शनै शनै शांत बुद्धिसे धैर्य-पूर्वक ।
आत्माको मनमें रोप न करें अन्य चिंतन ॥ २५ ॥
फूटे जहां जहांसे तो मन चंचल अस्थिर ।
वहांसे धरके लाना आत्मामें करना स्थिर ॥ २६ ॥
प्रशांत मन निष्पाप ब्रह्म-रूप बना हुवा ।
विकार शांत योगी जो पाता है सुख उत्तम ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी १८६

फिर कुछ कालान्तरसे । उस स्थैर्यके कारणसे ।
पास आयेगा सहजसे । आत्म-स्वरूपके ॥ ८३ ॥
उसे देख मन होता तद्रूप । फिर डूबेगा अद्वैतमें द्वैत ।
होगा ऐक्य तेजसे प्रकाशित । त्रिभुवन सारा ॥ ८४ ॥
दीखते जो गगनमें भिन्न । होते वे भेद जब बिलीन ।
तब भरा रहता गगन । त्रिलोकमें जैसा ॥ ८५ ॥
जिसका जब ऐसा लय होता । तब मात्र चैतन्य ही रहता ।
ऐसी सुलभतासे प्राप्त होता । महासुख ॥ ८६ ॥
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८ ॥
सर्वत्र परमात्म दर्शनका सहज मार्ग--
ऐसी सुगम योग-स्थितिका । अनुभव है बहुत जनका ।
संकल्पकी सब संपत्तिका । करके त्याग ॥ ८७ ॥
सब वे अनायाससे ऐसे । विलीन हुए पर-ब्रह्मसे ।
होता जैसे लवण पानीसे । अभिन्न रूप ॥ ८८ ॥
मिलन होता है इस रूपमें । समरसके महा-सदनमें ।
दीखता है तब त्रिभुवनमें । महा-दीपोत्सव ॥ ८९ ॥
यह है अर्जुन अपने ही पगसे । चलना अपनी ही पीठपर जैसे ।
यह है असंभव यदि तुझसे । कहता हूँ अन्य मार्ग ॥ ३९० ॥
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २९ ॥
ऐसा निष्पाप जो योगी आत्मामें स्थिर होकर ।
सुखसे भोगता नित्य ब्रह्मानंद अपार जो ॥ २८ ॥
भूतोंमें पूर्ण है आत्मा आत्मामें भूत है भरे ।
देखता योगसे युक्त सर्वत्र सम दर्शन ॥ २९ ॥
१८७ आत्म-संयमयोग

मैं हूं जैसे सकल देहमें । वैसे हैं सकल ही मुझमें ।
विचार करना हे इसमें । कुछ नहीं अन्य ॥ ९१ ॥
यह है ऐसा ही बना हुआ । परस्पर सभी घुला हुआ ।
किंतु बुद्धिसे है माना हुआ । होना सब ॥ ९२ ॥
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥
नहीं तो भी अर्जुन । एकत्वकी भावना ।
सर्वभूत अभिन्न । भजते मुझे ॥ ९३ ॥
जीव-जातिका अनेकपन । न मानता जो अंतःकरण ।
सर्वत्र एकत्व अनुदिन । मानता मेरा ॥ ९४ ॥
वह है मुझमें ही विलीन । व्यर्थका ऐसा वचन ।
न कहने पर भी तू जान । वह है मैं ही ॥ ९५ ॥
जैसे दीप और प्रकाश । वैसे हैं दोनों समरस ।
उसका है मुझमें वास । मेरा उसमें ॥ ९६ ॥
जैसे पानीमें है भीनापन । या गगनमें है पोलापन ।
मेरे लावण्यसे लूनापन । पाता हे वह ॥ ९७ ॥
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१ ॥
जिसकी ऐक्यकी दृष्टिमें । मैं ही समस्त हूँ सबमें ।
जैसे दीखता है पटमें । सूत सर्वत्र ॥ ९८ ॥
सबमें मुझको देख मुझमें देखता सब ।
वियोग न उसे मेरा मुझे न उसका कभी ॥ ३० ॥
भजता है मुझे एक स्थिर हो सब भूतमें ।
कैसे भी रहता योगी रहता मुझमें वह ॥ ३१ ॥
ज्ञानेश्वरी १८८

जैसे होते हैं गहनोंके विविध आकार । किंतु न होते सुवर्णके नाना प्रकार ।
ऐसी है जिस एकताकी स्थिति स्थिर । की है अपनी ॥ ९९ ॥
अथवा वृक्षके होते जितने दल । उतने नहीं होते गाछ विपुल ।
अद्वय प्रकाशमें खुला है सकल । द्वैतमत जिसका ॥ ४०० ॥
यदि वह पंचात्मकमें बसता । फिर भी उसमें नहीं है फंसता ।
अनुभवसे है उसकी क्षमता । मेरे समान ॥ १ ॥
मेरा समस्त व्यापक पन । करता जो स्वानुभव पान ।
कहे बिना ही व्यापक जान । हुआ वह सहज ॥ २ ॥
यदि वह शरीरमें है । शरीरका बोध नहीं है ।
उस स्थितिका वर्णन है । शब्दातीत ॥ ३ ॥
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२ ॥
उसका वर्ण असाधारण । देखता वह अपने समान ।
स-चराचरके है अनुदिन । पांडुकुमार ॥ ४ ॥
सुखदुःखादिक वर्म । या शुभ अशुभ कर्म ।
ऐसे दोनो मनो-धर्म । न जानता वह ॥ ५ ॥
ये सम विषम भाव । अन्य विविधता सर्व ।
मानो जैसे अवयव । अपने ही ॥ ६ ॥
कहना क्या है भिन्न भिन्न । यह त्रिलोक ही संपूर्ण ।
मैं स्वयं हूं इसका ज्ञान । हुआ सहज ॥ ७ ॥
अजी ! इसको भी है एक तन । कहते हैं इसको सुखी दुखी जन ।
किंतु हमारा यह मत जान । वह है परब्रह्म ही ॥ ८ ॥
अपनेमें विश्वको देखना । तथा आप ही है विश्व होना ।
कर यह साम्य उपासना । अर्जुन तू ॥ ९ ॥

सर्वत्र समबुद्धीसे देखें आत्म समान जो ।
सुख दुःख सम माने योगी उत्तम मानना ॥ ३२ ॥
१८९ आत्म-संयमयोग

इसीलिये मैं तुझसे सतत । कहता हूं रहो साम्यमें रत ।
साम्यसे बड़ा नहीं कुछ प्राप्त । रहता त्रिभुवनमें ॥ ४१० ॥
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥ ३३ ॥
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४ ॥
चंचल मनको कैसे स्थिर किया जाय--
कहता है “देव !” अर्जुन । तू कहता है सकरुण ।
किंतु मनकी उलझन । टिकने नहीं देती ॥ ११ ॥
यह कैसा कितना है मन । इसका नहीं होता है भान ।
किंतु छोटा माना त्रिभुवन । भटकनेमें इसके ॥ १२ ॥
तब यह ऐसा होगा जी कैसा । मर्कट समाधि लगाये कैसा ।
अंधड रोकनेसे रुके कैसा । लगता असंभव ॥ १३ ॥
अजी ! वह बुद्धिको है छलता । उसके निश्चयको है टालता ।
धीरजको छकाकर भागता । झांसा देकर ॥ १४ ॥
विवेकको है भरमाता । तृप्तिको चाहकी लव लगाता ।
आसनस्थको भी मटकाता । दश दिशामें ॥ १५ ॥
पकडनेसे जो अधिक उछलता । निग्रहको अपना साथी बना लेता ।
अपना स्वप्न छोडनेकी शक्यता । न दीखती मनकी ॥ १६ ॥
अर्जुनने कहा
अब तू मुझसे बोला साम्य योग जनार्दन ।
दीखे न इसका स्थैर्य क्यों कि चंचल है मन ॥ ३३
मन चंचल अत्यंत प्रमत्त बलवान जो ।
दीखे दुष्कर वायुसा निग्रह उसका मुझे ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी १९०

ऐसा मन निश्चल होगा । हमें तब साम्य मिलेगा ।
ऐसा कुछ भी नहीं होगा । दीखता यह ॥ १७ ॥
भगवान उवाच
संशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५ ॥
अभ्यास और वैराग्यसे मानवी-मन स्थिर होता है—
कृष्ण कहता सच है बात । तू कहता है यह निश्चित ।
इस मनकी यही हालत । चंचल स्वभाव ॥ १८ ॥
किंतु लेकर वैराग्यका आधार । तथा अभ्याससे उसे मोडकर ।
परिश्रम करनेसे होगा स्थिर । कालांतरमें वह ॥ १९ ॥
मनकी बात है एक नेक । ललचे रसमें सकौतुक ।
दिखाना आत्मानुभव सुख । संकेतसे सतत ॥ ४२० ॥
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप्य इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥ ३६ ॥
जिनमें विरक्ति है नहीं । अभ्यासमें वे आते नहीं ।
उनका मन स्थिरता नहीं । यह जानते हम ॥ २१ ॥
राह न देखी यम नियमोंकी । कभी भेंट नहीं की वैराग्यकी ।
विषय सागरमें दे डुबकी । बैठ रहे जो ॥ २२ ॥
मनको कभी जन्मसे कहीं । युक्तिका चिमटा दिया नहीं ।
तब वह स्थिर होगा कहीं । कहांसे भला ॥ २३ ॥
श्री भगवानने कहा
अवश्य मन दुःसाध्य कहता तू सही यह ।
जान तू साध्य होता है अभ्यास औ' विरागसे ॥ ३५ ॥
बिन संयमके योग मानता हूं असाध्य मैं ।
होता प्रयत्नसे साध्य संयमीको उपायंसे ॥ ३६ ॥
१९१ आत्म-संयमयोग

मनका निग्रह करना होगा । उपाय ऐसा करना पड़ेगा ।
तब वह स्थिर न कैसा होगा । देखेंगे हम ॥ २४ ॥
तब क्या सारे योगासन । व्यर्थके क्या ये अनुष्ठान ।
किंतु होती नहीं साधना । कहो हमसे ॥ २५ ॥
अपनेमें यदि होता है योग-बल । तब होता है कितना मन चंचल ।
यह महत्तत्व आदि जो सकल । आधीन अपने ॥ २६ ॥
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥ ३७ ॥
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८ ॥
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ ३९ ॥
अर्जुन कहता तब यह उचित । देव नहीं कहता है कभी गलत ।
योग बल सम्मुख होती क्या बात । मनके बलकी ॥ २७ ॥
किंतु न जानते हम योग है कैसा । उसके ज्ञानकी गंध भी नहीं जैसा ।
तभी कहते मन अनिर्बंध ऐसा । अयासके बिन ॥ २८ ॥
अर्जुनने कहा
श्रद्धायुक्त यत्न-हीन योग-चलित चित्त जो ।
कौनसी गति पायेगा योगकी सिद्धिके बिना ॥ ३७ ॥
होगा क्या उभय भ्रष्ट भूलके ब्रह्म मार्गको ।
नाश पाता निराधार टूटे बादल-सा कहीं ॥ ३८ ॥
मेरा संशय श्रीकृष्ण मूलता दूर तू कर ।
तेरे बिन नहीं कोई करेगा दूर जो इसे ॥ ३९ ॥
ज्ञानेश्वरी १९२

जन्म भरमें देव अभी हम । तब प्रसादसे पुरुषोत्तम ।
सुन सके योग विद्याका मर्म । इस क्षणमें यहां ॥ २९ ॥
साधना अधूरी रही तो ?—
किंतु देव और एक । मनमें है अकथक ।
तुझसे कौन है नेक । दूर करेगा ॥ ४३० ॥
कह तू हे गोविंद । कोई जो मोक्ष-पद ।
चाहता है सबद । बिना युक्तिके ॥ ३१ ॥
निकला वह इंद्रिय-ग्रामसे । पथमें चला भी अति श्रद्धासे ।
आत्म-सिद्धिके महा उद्देश्यसे । आलिंगन करने ॥ ३२ ॥
किंतु न पहुंचा आत्म-सिद्धिको । लौट न सकता मूल स्थानको ।
गया बीचमें ही अस्ताचलको । आयुष्य-भानु ॥ ३३ ॥
अकालमें जैसे बादल । आ जाते हैं अति विरल ।
शायद आते हैं केवल । बरसते नहीं ॥ ३४ ॥
ऐसे खोये गये वे दोनोंसे । दूर हो अति मोक्ष-पदसे ।
पद न पानेकी निराशासे । श्रद्धाके कारण ॥ ३५ ॥
गया वह ऐसा समयाभावसे । तथा आत्म-सिद्धिकी महा-श्रद्धासे ।
उसकी गति अब बनेगी कैसे । कहना मुझे ॥ ३६ ॥
भगवान उवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥ ४० ॥
सन्मार्ग पर चलनेवालेकी कभी दुर्गति नहीं होती—
कृष्ण कहते हैं तब पार्थ । जिसको मोक्ष-सुखकी आस्था ।
उसको मोक्ष बिन अन्यथा । नहीं गति ॥ ३७ ॥
श्री भगवानने कहा
न होगा उसका नाश इस या उस लोकमें ।
कल्याण करके कोई नहीं पाता बुरी गति ॥ ४० ॥
१९३ आत्म-संयमयोग
(25)

किंतु बीचमें इतना होता । उसे थोडा सुस्ताना पड़ता ।
इताना जो सुखमय होता । देवोंको भी दुर्लभ ॥ ३८ ॥
अभ्यास-पग यदि शीघ्र उठाता । फुर्तीसे वह डग यदि भरता ।
सहज वह आत्म-सिद्धि है पाता । समय रहते ही ॥ ३९ ॥
किंतु वेग नहीं जब उतना । होता है तब विवश सुस्ताना ।
फिर है निश्चित सिद्धि महान ।- धरोहर रूप ॥ ४४० ॥
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१ ॥
सुन तू होता कैसा कौतुक । सायास करके शत-मख ।
पाते हैं जो वही पाता सुख । सहज कैवल्यका ॥ ४१ ॥
वहां भी फिर जो अमोघ । करता अलौकिक भोग ।
उससे उकताके तंग । लौटता वह ॥ ४२ ॥
विघ्न हैं क्यों यह यकायक । साधनामें जो बाधाकारक ।
स्वर्ग भोग भी तापदायक । मानता वह ॥ ४३ ॥
फिर वह संसारमें जन्म लेता । घर जो धर्मका सहारा रहता ।
सकल विभवश्रीका क्षेत्र होता । उसका अंकुर बन ॥ ४४ ॥
नीति पथसे जहां चलते । सत्य पूत ही उच्चारते ।
देखना है जो वही देखते । शास्त्र दृष्टिसे ॥ ४५ ॥
वेद ही जागृत देव जहां । सदाचार ही व्यापार वहां ।
सारासार विचारही जहां । बनता मंत्री ॥ ४६ ॥
जिस घरमें रहती चिंता । होकर ईश्वरकी पतिव्रता ।
जिससे रहती गृह देवता । आदि ऋद्धि ॥ ४७ ॥
निज पुण्यका जहां संचय होता । सकल सुखका व्यापार चलता ।
ऐसे कुलमें सुखसे जन्म लेता । योग-भ्रष्ट वह ॥ ४८ ॥
रहके पुण्य लोकोंमें जो योग-भ्रष्ट संतत ।
शुचि साधनवंतोंके घरोंमें जन्मता फिर ॥ ४१ ॥
ज्ञानेश्वरी १९४

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२॥
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥४३॥
या हैं जो ज्ञानग्निमें करते हवन । या ब्रह्मनिष्ठ वेदशास्त्रादि संपन्न ।
अथवा ब्रह्मसुखानुभूत महान । होते हैं पार्थ ॥ ४९ ॥
या सिद्धांत सिंहासनपे बैठकर । राज्य करते हैं त्रिभुवन पर ।
संतोष वनमें कोयल बनकर । कूकते रहते ॥ ४५० ॥
या विवेक ग्रामके हृदयमें । बैठ निरत हैं फलाहारमें ।
ऐसे महायोगियोंके घरमें । पाते हैं जन्म ॥ ५१ ॥
छोटीसी देहाकृतिमें ही उदित । निज ज्ञानका प्रातःकाल निश्चित ।
जैसे सूर्योदयके पूर्व होता नित । अरुणोदय वैसा ॥ ५२ ॥
वैसे अवस्थाकी राह न देखती । वयका गांव भी नहीं पूछती ।
बालपनमें ही है ब्याह लेती । सर्वज्ञता उसे ॥ ५३ ॥
सिद्ध प्रज्ञाके उसी लाभसे । सारस्वत प्रसवता है मनसे ।
फिर सकल शास्त्र हैं मुखसे । निकलते सहज ॥ ५४ ॥
ऐसा है वह दिव्य जन्म । जिसकेलिये हो सकाम ।
करते देव स्वर्गमें होम । सदा सर्वत्र ॥ ५५ ॥
अमरोंको है भाट बनना । मृत्यु-लोकके गुण हैं गाना ।
ऐसा है वह जन्म अर्जुन । पाता है जो ॥ ५६ ॥
अथवा प्राज्ञ योगीके कुलमें जन्मता वह ।
बडा दुर्लभ है ऐसा जन्म पाना जगतमें ॥ ४२ ॥
वहां जो पूर्व-जन्मके बुद्धि संस्कार पाकर ।
मोक्षार्थ करता यत्न पानेमें सिद्धि उत्तम ॥ ४३ ॥
१९५ आत्म-संयमयोग

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥४४॥
तथा पूर्व-जन्मकी जो सद्बुद्धि। जीवन पर्यंतकी जो अवधि।
फिर वही आगे भी निरवधि। खिलती जाती ॥ ५७ ॥
पायालु है जो दैवयोगसे। औ' दिव्यांजन पडी आंखोंसे।
देखती गुप्त संपदा जैसे। पातालकी भी ॥ ५८ ॥
वैसे दुर्भेद होते जो सिद्धांत। गुरु-करुणासे ही बुद्धिगत।
करता है उन्हे ग्रहण चित्त। सहज भावसे ॥ ५९ ॥
इंद्रियां होती हैं मनके आधीन। मन होता है पवनमें विलीन।
मूर्ध्न्याकाशमें सहज ही पवन। विलीन हो जाता ॥ ४६० ॥
होता है यह सहज भावसे। अभ्यास होता अपने आपसे।
पूछने आती समाधि आपसे। मानसका घर ॥ ६१ ॥
मानो होता वह योगपीठका भैरव। अथवा हो कार्यारंभका गौरव।
अथवा है वैराग्य सिध्दिक अनुभव। आया आकार लेकर ॥ ६२ ॥
जैसे यह संसार अंकनका नाप। अथवा अष्टांग योग साधन दीप।
जैसे परिमलने ही लिया है रूप। चंदनका ॥ ६३ ॥
संतोषकी बनी मूर्तिसा। सिध्द समाजकी कीर्तिसा।
होता योग्यताका पुंजसा। साधक दशामें ही ॥ ६४ ॥
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥४५॥
समय शतकोटिवर्षोंका। प्रतिबंध जन्म सहस्रका।
लांघके पाया आत्म-सिध्दिक। किनारा वह ॥ ६५ ॥
पूर्वाभ्यास बलसे ही खींचे अवश होकर।
योग-ज्ञान इच्छासे ही शब्दके पार शोधके ॥ ४४ ॥
यत्नसे रहके योगी दोषोंसे मुक्त होकर।
अनेक जन्ममें पाता पूर्ण होके महापद ॥ ४५ ॥
ज्ञानेश्वरी १९६

तब है साधना मात्र संपूर्ण । करती उसका अनुकरण ।
जिससे पाता वह सिंहासन । विवेक राज्यका ॥ ६६ ॥
फिर वह गतिसे विवेककी । लांघ आता है सीमा विवेककी ।
बनता है वह विचारान्तकी । मूर्ति ही मानो ॥ ६७ ॥
मन-बादल वहां छटता । पवनका पवनत्व जाता ।
आकाशका भी विलय होता । अपनेमें ही ॥ ६८ ॥
होता पवनकी अर्धमात्रामें लीन । इतना वह शब्द-सुख संपन्न ।
जिससे होता है उसका शब्द मौन । अपने आप ॥ ६९ ॥
ऐसी है यह ब्राह्मी-स्थिति । सब गतिकी जो है गति ।
ऐसी वह अमूर्त मूर्ति । बनता स्वयं ॥ ७० ॥
अपने अनेक जन्मोंमें पूर्वके । जाल झटका दिये थे विक्षेपके ।
इसलिये क्षणमें ही जनमके । लग्न घटिका भरी ॥ ७१ ॥
किया तद्रूपतासे लग्न । उसने होकर अभिन्न ।
अभ्र लोपसे है गगन । होता एक रूप ॥ ७२ ॥
जहांसे होता विश्व उत्पन्न । तथा होता है जहां विलीन ।
प्राप्त करता है विद्यमान । शरीरके ही ॥ ७३ ॥
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ ४६ ॥
जिस लाभकी करके आशा । धैर्य-बहुका किये भरोसा ।
कूदते हैं करके साहस । कर्मनिष्ठ ॥ ७४ ॥
अथवा जिस वस्तुकेलिये । ज्ञान-कवच पहन लिये ।
जूझे प्रपंचमें जिसलिये । ज्ञानी जन ॥ ७५ ॥
अथवा फिसड्डी निराधार । तप दुर्गकी टूटी दिवार ।
भिडे उसको चढ़ने घोर । तपस्वी जन ॥ ७६ ॥
ज्ञानी तापस कर्मिष्ठ इनसे जो विशेष है ।
माना है श्रेष्ठ योगीको योगी हो पार्थ तू तभी ॥ ४६ ॥
१९७ आत्म-दर्शनयोग

था जो भजकोंका भजनीय । तथा पूजकोंका पूजनीय ।
और याज्ञिकोंका यजनीय । सदा सर्वत्र ॥ ७७ ॥
वही तत्व जो पूर्ण । हुआ स्वयं निर्वाण ।
जो साधना कारण । सिद्ध तत्व ॥ ७८ ॥
तभी कर्म निष्ठोंमें वंद्य । तथा ज्ञानियोंमें है वेद्य ।
है वह तापसमें आद्य । तपोनाथ ॥ ७९ ॥
जीव और परमात्म-संगम । जिसका है ऐसा मनोधर्म ।
होती है उस तनकी महिमा । अपार यहां ॥ ४८० ॥
तभी मैं इस कारणसे । कहता हूं सदा तुझसे ।
योगी हो अंतःकरणसे । अर्जुन तू ॥ ८१ ॥
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनांतरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥ ४७ ॥
अजी योगी जो कहलाता । देवोंका वह देव होता ।
मेरा सुख सर्वस्व तथा । चैतन्य ही वह ॥ ८२ ॥
जिसके भजनसे भजनीय भजन । तथा यह भक्ति साधन स्वयं संपूर्ण ।
हुआ वह स्वयं अनुभवसे तू जान । अखंडित ॥ ८३ ॥
फिर हमारे प्रेमका । स्वरूप नहीं वाचाका ।
अनिर्वचन है उसका । विषय अर्जुन ॥ ८४ ॥
वह है जो प्रेम एकात्म । उसकी है योग्य उपमा ।
मैं शरीर और वह आत्मा । यही एक ॥ ८५ ॥
ऐसा भक्त चकोर-चंद्र । वह भुवनैक नरेंद्र ।
बोला सर्वगुण समुद्र । कहता संजय ॥ ८६ ॥
जहां पहलेसे ही पार्थ । जानना चाहता था सार्थ ।
जान लिया है यदुनाथ । हुआ अधीर ॥ ८७ ॥
श्रेष्ठ है योगियोंमें जो मुझमें प्राण रोपके ।
भजता मुझ श्रद्धासे मानता श्रेष्ठ मैं उसे ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी १९८

जान कर वह प्रमुदित मन । निरूपणका है यथार्थ ग्रहण ।
करता है यह जैसे सुदर्पण । कहेगा श्रीरंग ॥ ८८ ॥
ऐसा प्रसंग आगे आयेगा । वहां शांत रस खिला होगा ।
अब है वहां बोया जायेगा । प्रमेय बीज ॥ ८९ ॥
सत्वकी वर्षासे पिघला ढेला । हुआ चित्तका बाग गुलगुल ।
सहजतासे हुआ क्षेत्र कोमल । इस समय ॥ ४९० ॥
फिर अवधानकी क्यारी सुंदर । मिली स्वर्णमय इस अवसर ।
निवृत्त-चित्तने यह जान कर । प्रेरणा दी बुवाईकी ॥ ९१ ॥
चाह कर किया मुझे प्रेमसे । सद्गुरुने सहज लीलासे ।
बीज बोया आशीर्वादसे । कहता ज्ञानदेव ॥ ९२ ॥
सो मेरी वाणीसे जो निकलेग । सन्त हृदयमें महुलायेगा ।
रहने दो अब क्या कहा कहियेगा । श्रीरंगने वहां ॥ ९३ ॥
किंतु वह मनके कानसे सुनना । शब्द है जो बुद्धि-नयनसे देखना ।
चित्तकी कीमत देकर ही है लेना । मेरे शब्द ॥ ९४ ॥
यह सब ध्यान देकर । ले जाना हृदय-भीतर ।
सज्जनोंको ये निरंतर । देंगे संतोष ॥ ९५ ॥
स्वहितको स्थिर करेंगे । पूर्णत्वको जगायेंगे ।
तथा लखौरी चढ़ायेंगे । जीव पर ये ॥ ९६ ॥
अब जो मुकुंद अर्जुनसे । बोलेगा सुंदर विनोदसे ।
वह सब ओवीके छंदसे । कहूंगा मैं ॥ ४९७ ॥
गीता श्लोक ४७
ज्ञानेश्वरी ओवी ४९७-

७
ज्ञानविज्ञानयोग
भगवान उवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १ ॥
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २ ॥
प्रापंचिक ज्ञान विज्ञान है, इसको सत्य मानना अज्ञान -
सुन तू अब पार्थ । कहता है अनंत ।
हुआ है योग-युक्त । इस समय ॥ १ ॥
जानता तू मुझे पूर्ण रूपसे । हथेली पर रखे रत्नके जैसे ।
अब तुझे ज्ञान कहूंगा मैं वैसे । विज्ञान सह जो ॥ २ ॥
यहां विज्ञानका है क्या करना । ऐसी यदि तेरी मनो भावना ।
किंतु उसको पहले जानना । आवश्यक यहां ॥ ३ ॥
क्यों कि ससयमें स्वरूपज्ञानके । मिटता यह नयन पहुंचके ।
जैसे किनारेसे लगे जहाजके । नहीं है वेग ॥ ४ ॥
श्री भगवानने कहा
.चित्ते आसरा मेरा लेके जो योग साधते ।
कसे समग्र निःशंक जानेंगे मुझसे सुन ॥ १ ॥
˙ विज्ञान सह जो ज्ञान संपूर्ण कहता तुझे ।
जानके जो नहीं अन्य जगमें जानना रहा ॥ २ ॥

होती नहीं पहुंच वहां ज्ञानकी । पुच्छ प्रगति होती है विचारकी ।
भोथरा हो जाती है धार तर्ककी । उस समय ॥ ५ ॥
नाम है जिसका ज्ञान अर्जुन । उससे भिन्न प्रपंच विज्ञान ।
वहां सत्य बुद्धि ही है अज्ञान । जान तू यह ॥ ६ ॥
अन्त होगा जब अज्ञानका । निवारण होगा विज्ञानका ।
तब साक्षात् होगा ज्ञानका । अपनेमें पूर्ण ॥ ७ ॥
रहस्य है ऐसा जो गूढ । वह करूंगा शब्दरूढ ।
जिसका पूर्ण करूंगा कोड । मनका मैं ॥ ८ ॥
जिससे है मिटता प्रवचन । सुननेवालोंका भी व्यसन ।
मिटता है यह सब अज्ञान । ऊंच नीचका ॥ ९ ॥
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ ३ ॥
मुझे जाननेवाला कोई एकाद होता है—
सहस्रो मनुष्योंमें कहीं एक । चाह करता इस विषयकी नेक ।
चाहनेवालोंमें भी कहीं एक । पाता है मुझे ॥ १० ॥
जैसे भरा हुआ भुवन । एकेक छंटके अर्जुन ।
करते संघटित सेना । लक्षाधिक ॥ ११ ॥
उसमें भी कहीं एक । सहते घात अनेक ।
पाता है विजयश्रीका । सिंहासन ॥ १२ ॥
आस्थाके इस महापूरमें । कूदते हैं जन करोडोंमें ।
पहुंचता है पैल-तीरमें । कोई एक ॥ १३ ॥
इसीलिये यह नहीं सामान्य । कहनेमें भी यह असामान्य ।
फिर कहेंगे तुझे वह अन्य । अब सुन विज्ञान ॥ १४ ॥
शत सहस्रमें एक मोक्षार्थ जुटता कभी ।
जुटते उसमें कोई तत्त्वता जानते मुझे ॥ ३ ॥
(26) २०१ ज्ञान विज्ञानयोग

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ ४ ॥
अब तू सुन हे धनंजय । है महदादिक मेरी माया ।
जैसे प्रतिबिंबित हो छाया । निजांगोंकी ॥ १५ ॥
यह विज्ञान है—
इसे कहते प्रकृति जान । जान यह जो अष्टधा भिन्न ।
उत्पन्न होता है त्रिभुवन । इससे ही ॥ १६ ॥
यह है कैसी अष्टधा भिन्न । पूछता है यदि यह मन ।
कहता हूं अब विवेचन । सुन तू यह ॥ १७ ॥
आप तेज तथा गगन । धरणी मारुत औ' मन ।
बुद्धि अहंकार है भिन्न । ये भाग आठ ॥ १८ ॥
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५ ॥
औ' इन आठोंकी जो समावस्था । मेरी परमप्रकृति है पार्थ ।
उसका नाम है सुन व्यवस्था । जीव ऐसा ॥ १९ ॥
जड़को जो है जिलाता । चेतनको है चेताता ।
मनसे है मनवाता । शोक मोहादिक ॥ २० ॥
बुद्धिमें जो शक्ति है जानना । उसके सान्निध्यके कारण ।
अहंकार कौशल्यके कारण । उसने धरा जगत ॥ २१ ॥
पृथ्वी आप तथा तेज वायु आकाश पांचवा ।
मन बुद्धि अहंकार मेरी प्रकृति है यह ॥ ४ ॥
हुई ये अपरा मेरी दूसरी जान तू परा ।
जीव रूप बनके जो धरता विश्वको सब ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी २०२

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६ ॥
सूक्ष्म प्रकृति जब लीलासे । पाती स्थूलके परिणामसे ।
निकलती है टंकसालसे । भूत सृष्टि ॥ २२ ॥
उद्बीज, जारज, स्वेदज, अंडज । टंकसालसे निकलते सहज ।
उसके मूल्य है समान महज । आकार भिन्न ॥ २३ ॥
होते हैं चौरासी लक्षके आकार । उसकी सीमा न जानता भांडार ।
भर जाता है आदिशून्यका घर । इन नाणोंसे ॥ २४ ॥
पंच भौतिक ऐसे बहुतसे । रंग रूप धरते हैं एकसे ।
उसको लिखती है नियमसे । स्वयं प्रकृति ही ॥ २५ ॥
नाण्य आकृतिका प्रसार करती । फिर उसको घट्या भी करती ।
कर्माकर्म व्यवहारमें कराती । प्रवर्तन स्वयं ॥ २६ ॥
जाने दो यह रूपक कुशल । कहता हूं तुझको मैं सरल ।
नाम रूपका विस्तार विशाल । करती है प्रकृति ॥ २७ ॥
तथा प्रकृति मुझमें बिंबित । इसमें नहीं है अन्यथा बात ।
तभी सृष्टिका आदि मध्य अंत । जानो मुझको ही ॥ २८ ॥
मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ ७ ॥
यह जो रोहिणीका जल । उसका देखनेसे मूल ।
रवि-रश्मि नहीं केवल । है वह भानु ॥ २९ ॥
इसी भांति सुन किरीटी । परा प्रकृतिसे जो सृष्टि ।
उस पार जाय तो दृष्टि । वहां हूं मैं ॥ ३० ॥
इन दोसे सभी भूत होते उत्पन्न जान तू ।
उसीसे विश्व है सारा मैं ही हूं मूल अंत भी ॥ ६ ॥
नहीं है दूसरा तत्व मुझसे पर जो रहे ।
पिरोया मुझमें सारा धागेमें मणि मान जो ॥ ७ ॥
२०३ ज्ञान-विज्ञानयोग

ऐसा हू मै सबका आधार । मुझमें सृष्टि स्थिति संहार ।
जैसा मणियोंमें होता डोर । आधार रूप ॥ ३१ ॥
जैसे सुवर्णके मणि किये । सुवर्ण सूत्रमें वे पिरोये ।
वैसे सृष्टिका धारण किये । रहा हूं मै ॥ ३२ ॥
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ ८ ॥
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९ ॥
इसीलिये उदकमें रस । अथवा पवनमें जो स्पर्श ।
तथा शशि सूर्यमें प्रकाश । वह मै ही जान ॥ ३३ ॥
वैसा ही नैसर्गिक शुद्ध । पृथ्वीमें रहता जो गंध ।
तथा गगनमें मै शब्द । प्रणव वेदमें ॥ ३४ ॥
नरमें जो होता नरत्व । अहंभावका जो है सत्व ।
वह पौरुष मैं औ' तत्व । कहता तुझे ॥ ३५ ॥
अग्निका भी अर्जुन ऐसा ही है । वह तेजका निरा कवच है ।
उसके परे जो निज तेज है । वह मै ही जान ॥ ३६ ॥
तथा जो नानाविध योनियोंमें । जनमके प्राणी त्रिभुवनमें ।
आचरण करते हैं जीवनमें । अपने पार्थ ॥ ३७ ॥
एक पवन ही है पीता । दूसरा तृणार्थ है जीता ।
कोई अन्नाधार रहता । जलपे एक ॥ ३८ ॥
सब भूतोंका जो है अन्न । प्रकृतिवश है जीवन ।
उन सबमें जो अभिन्न । मै ही केवल ॥ ३९ ॥
हुवा मैं रस पानीमें प्रकाश चंद्र-सूर्यमें ।
वेदमें ॐ 'ख' में शब्द नरोंमें पुरुषार्थ मैं ॥ ८ ॥
मैं पुण्य गंध पृथ्वीमें उष्णता अग्निमें बना ।
.आयुष्य प्राणि-मात्रोंमें तापसोंमें बना तप ॥ ९ ॥
ज्ञानेश्वरी २०४