दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary
जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा
प्रारंभिक भूमिका एवं दाय-स्वरूप मंगलाचरण
याज्ञवल्क्यस्मृति
दायभाग
टीकाकार
वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी
T 354
इन्स्टीट्यूट आफ ओरियन्टल फिलासफी
वृन्दावन ।
१९६६
CC-0. Agamnigam Digital Presevation Foundation, Chandigarh
प्रकाशक :
इन्स्टीट्यूट आफ ओरियन्टल फिलासफी
वृन्दावन ( मथुरा )
मुद्रक :—
बैजनाथ दानो
लोक साहित्य प्रेस, मथुरा
दूरभाष संख्या २६४
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( २५ )
पति या श्वसुर ने स्त्री धन नदिया हो । यदि स्त्री धन दिया जा चुका है
तो दत्ते त्वर्धं प्रकल्पयेत् = दें देनें पर आधा दिया जाय ।
विशेषः---
१ यहां अर्ध शब्द समविभाग के वचन के लिये नहीं अपितु
पूर्व दत्त आधिवेदनिक के समजिनता हो उतना है ।
विभाग सन्देह होने पर निर्णय—
विभाग निह्नवे ज्ञाति बन्धु साक्ष्यभिलेखितैः
विभाग भावना ज्ञेयागृह क्षेत्रैश्च यौतकैः ।१४९।
अन्वयः----
विभाग निह्नवे ज्ञाति बन्धु साक्ष्यभि लिखितै विभाग
भावना ज्ञेया यौतकैः गृह क्षेत्रैश्च ॥
अर्थः--विभाग निह्नवे=विभाग छिपने पर, ज्ञाति--ज्ञाति
बन्धुः--पितृ बन्धु मातृ बन्धु, साक्षी, लिखितैः--विभाग पत्र से विभाग
भावना--विभाग निर्णय, ज्ञेया--जानना चाहिये । यौतकैः--पृथक् कृत,
गृह क्षेत्रैश्च--खेती आदि कार्य यज्ञादि धर्म स्वतन्त्रता से किये जा
सकते हैं ।
विशेष ----
१ जब तक बंटवारा न हो तब तक धर्म एक है विभक्त हो
जाने पर धर्म--श्राद्धादि भी पृथक् २ करने चाहिये ।
साक्षित्वंप्राति भाव्यं च दानं ग्रहण मेव च
विभक्ता भ्रातरः कुर्युर्नाविभक्ताः कथंचन ॥
[ ना० २३।४३ ]
—*—
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१३
...
...
...
...
...
: त्रैवार्षिकान्नशेषस्तु यस्य स्याद् ... ।
... स सोमं पातुमर्हति ॥
...
...
...
...
...
...
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SRI RUPA GOSVAMI'S
BHAKTI—RASAMRTA—SINDHUH
Text in Devnagari script, translitteration of the
Slokas, and English translation of the Text with
Three Commentaries.
By
Tridandi Swami Bhakti Hridaya Bon Maharaj,
Rector,
Institute of Oriental Philosophy, Vrindaban(U.P.)
Price : Rs. 32.00
शीघ्र प्रकाशित हो रही हैं:—
दाय भाग टीकाकार की अन्य कृतियां
१. महा कवि सोमनाथ
२. वृक्षारोपण
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शुभ सम्मति
प्राच्य प्रतीच्य विद्याविशारद श्री टीकम सिंह
तोमर एम. ए. अध्यक्ष—संस्कृत—हिन्दी
बलवन्त राजपूत कालेज, आगरा
अभी तक मुझे दाय भाग की कोई ऐसी टीका दृष्टिगोचर नहीं
हुई जो सर्वात्मना परीक्षार्थियों एवं मननार्थियों को उपयुक्त हो । दाय
भाग की व्याख्या की आवश्यकता इसलिये और भी अधिक थी कि
यह भाग अत्यधिक कठिन है । मिताक्षरा के ज्ञान के बिना यह प्रकरण
लिखा नहीं जा सकता । मिताक्षरा के जानने के लिये—व्याकरण
मीमांसा एवं धर्म शास्त्र के ज्ञान की अपेक्षा है ।
सौभाग्य से इन विषयों के अतिरिक्त भी अन्य शास्त्रों के भी
मर्मज्ञ ब्रज के प्रसिद्ध विद्वान्, एवं संस्कृत के उद्भट कविवर श्री वासु-
देव कृष्ण तुर्वेदी अध्यक्ष संस्कृत विभाग, इन्स्टीट्यूट ग्राफ ओरियन्टल
फिलासफी वृन्दावन द्वारा इसकी व्याख्या लिखी गई हैं । जिससे दाय
भाग के पाठकों एवं छात्रों को अत्यधिक लाभ होगा ।
मैं आशा करता हूँ कि यह विश्व विद्यालयों में सम्बन्धित पत्रों
में शीघ्र ही स्थान प्राप्त करेगी ।
लेखक का श्रम सराहनीय है
टीकम सिंह तोमर
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याज्ञवल्क्य स्मृति
दाय भाग
[ हिन्दी टीका सहित ]
टीकाकार
स्व० श्री श्रीवर शास्त्रि चतुर्वेद सूनु,
आचार्य वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी एम० ए० [सं० हि०]
नव्य व्याकरण-पुराण-इतिहास,-धर्म शास्त्र-सांख्य योग
साहित्य -वल्लभ वेदान्ताचार्य ३ खं०
अध्यक्ष, संस्कृत विभाग
इन्स्टीट्यूट आफ ओरियन्टल फिलासफी वृन्दावन
भूमिका
डा० हरिदत्त शास्त्री, एम० ए०एकादशतीर्थ
अध्यक्ष संस्कृत विभाग
डी. ए. वी. कालेज कानपुर
प्रकाशक
इन्स्टीट्यूट आफ ओरियन्टल फिलासफी
वृन्दावन
Rs 2 P 5 0
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समर्पणम्
श्री १००८ श्री मन्मध्व गौडेश्वराचार्यं
श्रीमद्भक्तिहृदयवनमहाराजानां करकमलेषु सादरम्
वन्द्य श्री भक्तिहृदयवनोपाह्व महर्षये
वासुदेवः स्वीयटीकां प्रश्रयेण समार्पिपत् ।
वासुदेव कृष्णः ।
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आमुख
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डा० हरिदत्त शास्त्री एम० ए० पी० एच० डी
संस्कृत वाङ् मय में स्मृतियों का अपना विशिष्ट स्थान है, भार-
तीय शासन व्यवस्था में, प्रत्यक्ष परोक्ष किसी न किसी रूप में ये अब
भी सहायक हैं ।
याज्ञवल्क्य स्मृति का प्रणयन याज्ञ वल्क्य महर्षि ने किया यह
सर्व विदित है । इस स्मृति पर मिताक्षरा टीका की सर्वाधिक प्रसिद्धि है ।
इसके प्रणेता विज्ञानेश्वर एवं अन्य कतिपय व्याख्याकारों का परिचय
यहाँ देना उचित ही होगा ।
विज्ञानेश्वर
इनके पिता का नाम पद्मनाभ भट्ट था । इनका
जन्म स्थान कल्याण पुर ( हैदराबाद ) था । विज्ञानेश्वर परमहंस
उत्तम के शिष्य थे, विक्रमादित्य देव या विक्रमार्क के ये समकालीन
थे क्यों कि इन्होंने उनका उल्लेख अपनी टीका के आरम्भ में किया है—
नासीदस्ति भविष्यति क्षिति तले कल्याण कल्प पुरम्
नो दृष्टः श्रुत एव वा क्षिति पतिः श्री विक्रमार्कोपमः
विज्ञानेश्वर पण्डितो न भजते किं चान्यदन्योपम—
श्चाकल्पं स्थिर मस्तु कल्प लतिका कल्प तदेतत्त्रयम् ॥
विज्ञानेश्वर लिखता है कि कल्याण पुर के समान अन्य कोई
नगर तो है और न 'होगा, और न विक्रमार्क की उपमा वाला अन्य कोई
विद्वज्जनप्रिय राजा ही है । इतना ही नहीं वह सुन्दर वक्ता एवं विद्वानों
के आश्चर्य की सीमा भी है—
स्रष्टा वाचां मधुर वपुषां विद्वदा श्चर्य सीम्नां
दातार्यानामतिशयजुषामर्थिसार्थार्थनीया
आच प्राचः समुद्रान्नत नृपति शिरोरत्न भा भा सुराङ्घ्रिः
पायादाचन्द्र तारं जगदिदमखिलं विक्रमादित्य देवः ॥
इनकी सुप्रसिद्ध कृति—'मिताक्षरा'— याज्ञवल्क्य स्मृति की
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( ४ )
टीका है। नाम से ही ज्ञात होता है कि यह एक संक्षिप्त विवरण
वाली रचना है, पूर्व मीमांसा के अनेक गूढ विषयों के विवेचन से
स्पष्ट होता है कि ये पूर्व मीमांसा के पूर्ण ज्ञाता थे। धर्मशास्त्र साहित्य
में इसका अनुपम स्थान हैं, पतञ्जलि कृत महाभाष्य, मम्मट कृत
काव्य प्रकाश, शङ्कर कृत भाष्य का जो सम्मान है वही मिताक्षरा
का है।
मिताक्षरा के विषय परिशीलन से ज्ञात होता है कि सहस्त्रों
वर्ष पूर्व के मतों का सार ग्रहण करके अपनी बुद्धि के ढांचे में ऐसा
ढाला जिसमे अनेक सिद्धान्तों का विकास हुआ। यह ग्रन्थ न केवल
याज्ञवल्क्य स्मृतिका एक भाष्य मात्र है अपितु यह एक स्मृति सम्बन्धी
निबन्ध है। मिताक्षरा में—प्रसहाय—विश्व रूप, मेधातिथि, श्रीकर,
भारुवि, तथा भाजदेव का नामोल्लेख है। पाणिनि—प्राभाकर का
नाम भी प्राप्त होता है।
देवणण भट्ट की स्मृति चन्द्रिका जिसकी रचना लग-भग १२००
ई० है, ने मिताक्षरा के सिद्धान्तों का उल्लेख किया है, लक्ष्मी धर के
कल्पतरु में विज्ञानेश्वर का नाम है इस ग्रन्थ की रचना १२ वीं.
शताब्दी के मध्य मानी गई है। विश्वरूप मेधातिथि धारेश्वर के नाम
मिताक्षरा में हैं अतः यह १०५० के पश्चात तथा १२ई० के पूर्व लगभग
११२० की रचना मानी जा सकती है
१०७०—११०० ई० के मध्य अन्य प्रमाणों के अनुसार म
जाता है। विज्ञानेश्वर के अनेक भाष्य हुए जिसमें विश्वेश्वर—
पण्डित एवं बालम्भट्ट के नाम अति प्रसिद्ध हैं।
विश्वेश्वर भट्ट—द्रविड़ देश के निवासी थे। आधुनिक
कानून की बनारसी शाखा के विश्वेश्वर भट्ट एक नामी प्रा
लेखक माने जाते हैं। याज्ञवल्क्य की मिताक्षरापर इन्होंने सु
नामक टीका लिखी है—इसके अतिरिक्त इन्होंने—तिथिनि
स्मृति कौमुदी, स्मृति महार्णव, मदन पारि जात नामक ग्रन्थ
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थे । इनके आश्रय दाता—मदनपाल राजा थे ।
नन्द पण्डित
ये दक्षिण के मूल निवासी थे, पश्चात् बनारस में आकर रहे
थे । इन्होंने सहारन पुर के सहगिल कुल के परमानन्द के आग्रहपर--
श्राद्ध कल्पलता का महेन्द्र कुल के हरिवंश वर्मा के आग्रहपर स्मृति
सिन्धु, का एवं मधुरा के केशब नायक के आग्रहपर बैजयन्ती का
प्रणयन किया ।
पराशर स्मृति पर—विद्वन्मनोहरा, तथा मिताक्षरा पर
एक भाष्य लिखा जिसे प्रमिताक्षरा या प्रतीताक्षरा कहते है । कहीं कहीं
मिताक्षरा का खण्डन भी किया है । दत्तक मीमांसा के कारण इनकी
अत्यधिक प्रसिद्धि हुई । इनका रचना काल १५६५ से १६३० ई पर्यन्त
माना जाता है ।
बाल म्भट्टी
बालकृष्ण का ग्रन्थ ही बालम्भट्टी के नाम से प्रसिद्ध है ।
इनका काल १७३०-एवं १८२० ई के मध्य कहा जा सकता है ।
कतिपय विद्वान् इन्हें वैद्यनाथ पायगुण्डे (जो नागेश भट्ट के प्रसिद्ध
शिष्य थे) का पुत्र मानते हैं, पर अभी पूर्ण परिचय प्राप्त नहीं बालं-
भट्टी मिताक्षरा पर भाष्य है, किंवदन्ती है कि इसका प्रणयन लक्ष्मी
देवी ने किया । कुछ विद्वान् बालकृष्ण की माता का नाम लक्ष्मी
तथा वैद्यनाथ की रचना मानते हैं अतः इस विषय में अभी अधिक
नहीं लिखा जा सकता ।
अपरादित्य याअपरार्क—
याज्ञ वल्क्य की बिस्तृतटीका है, मिताक्षरा से इसका
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ग्राकार अधिक बड़ा है, ये जीमूत वाहन कुल में उत्पन्न राजाशिलाहार
अपरादित्य कहे जाते हैं । समय १०.-१२०० ई० के मध्य ।
शूलपाणि—
ने याज्ञ वल्क्य स्मृति पर दीपकलिका नामक टीका लिखी है
इनका समय १३१५—१४४० ई० ३० माना जाता है । साहु डियाल
ब्राह्मणों में इन्हें माना जाता है, इनकी दायभाग कृति में विभिन्न
ग्रन्थ कारों के नाम उपलब्ध होते हैं । ।
कुल्लूक भट्ट—
मनु स्मृति की प्रसिद्ध टीका मन्वर्थ मुक्तावली के रचयिता
कुल्लूक भट्ट हैं, इनका भाष्य संक्षिप्त, स्पष्ट एवं उद्देश्य पूर्ण कहा जा
सकता है । पूर्व व्याख्या कारों का कहीं कही उल्लेख करते हुए उनकी
कटु आलो चना भी की है । ये बंगाल के वारेन्द्र कुल में नन्दन निवासी
भट्ट दिवाकर के पुत्र कहे जाते हैं । पण्डितों की सन्निधि में यह भाष्य
वाराणसी में लिखा गया है जैसा कि निम्नलिखित श्लोक से स्पष्ट है ।
गौडे नन्दन वासिनाम्नि सुजनै र्वन्द्य वरेन्द्र यां कुले
श्री मद्भट्ट दिवाकरस्य तनयः कुल्लूक भट्टोऽभवत्
काश्यामउत्तर वाहि जन्हु तनया तीरे समं पण्डितै—
स्तेनेयं क्रियते हिताय विदुषां मन्वर्थ मुक्तावली ।।
मनु सर्वज्ञ हैं मैं अल्पज्ञ, तथापि अन्य टीका कारों के प्रसंग से
टीका लिखने का साहस कर रहा हूँ ।
सर्व ज्ञस्य मनो रसर्वविदपि व्याख्यामि यद्वाङ् मयं
युतया तद्बहुभिर्यतो मुनिवरैरेतद्वहुव्याहृतम्
तां व्याख्यामधुनातनैरपिकृतां न्याय्यां ब्रुवाणास्तमे
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भक्त्या मानव वाङ्मये भवभिदे भूयादशेषेश्वरः ॥
टीका कार सब शस्त्रों का ज्ञाता था—
मीमाँसे बहु सेवितासि सुहृदस्तर्काः समस्ताः स्थ मे
वेदान्ताः परमात्मबोध गुरवो यूयं मयोपासिताः
जाता व्याकरणानि बालसखिता युष्माभिरम्यर्थये
प्राप्तोऽयं समयो मनूक्त विवृतौ साहाय्यमालम्ब्यताम् ॥
मानव वृतावस्यां ज्ञे या व्याख्या नवा मयोद्भिन्ना
प्राचीनाः अभिरुचिरा व्याख्यातॄणामशेषाणाम् ॥
गोविन्द राजा
१०५०—११६० ई० के मध्य
इनके पिता का नाम माधव था । य गंगा किनारे के रहने वाले
थे । बनारस के राजा की तुलना कुछ लोग इन से करते थे उसका
पी. वी. काने महोदय ने खण्डन किया है, क्यों कि राजा क्षत्रिय थे ।
और गोविन्द राज ब्राह्मण ।
दाय भाग की विषय वस्तु—दाय की परिभाषा, पूर्वजों की
सम्पति पर पिता का प्रभाव या स्वत्व पिता या पिता मह की सम्पति
का विभाजन, पिता की मृत्यु के उपरान्त भाइयों में बंटवारा, स्त्री धन
की परिभाषा, श्रेणी करण एवं निक्षेपण, असमर्थता के कारण दाय
एवं बटवारे से कौन लोग पृथक् किये जा सकते हैं, पुत्र हीन के अधिकार
की विधि, गुप्त धन प्राप्त होने पर रिक्थाधि कारियों में वंट वारा
विभाजन प्रकाशन ।
मिताक्षरा दाय भाग से अनेक वैधर्म्य जीमूत वाहन कृत
दायभाग में उपलब्ध हैं । दायभाग में पैतृकसम्पत्ति पर जन्म से ही
अधिकार नहीं हैं ।
प्रथम खण्ड: पैतृक दाय-विभाजन एवं स्त्रीधन निरूपण
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विज्ञानेश्वर की देन—
विज्ञानेश्वर ने दाय को अप्रतिबन्ध तथा सप्रतिबन्ध नामक
२ भागों में बाँटा है तथा बल पूर्वक कहा है कि पुत्र पौत्र एवं प्रपौत्र
वसीयत पर अधिकार जन्म से ही पाते हैं, जीमूत वाहन के मतों के
सर्व था विरोध में है ।
इनके शिष्य का नाम नारायण था, मिताक्षरा में विभाजन
के ४ अवसर बताये गये हैं किन्तु नारायण ने केवल २ अवसरों की
चर्चा की है ! पिता की इच्छा, तथा पुत्र या पुत्रों की इच्छा
तथा पिता की इच्छा पर उसमें और पुत्रों में विभाजन हो सकता
है । पति के अधिकार पर विधवाका अधिकार हो जाता है चाहें पतिके
भाई के साथ संयुक्त धन ही क्यों न हो, रिक्थाधिकार मृत व्यक्ति को
पिण्ड दान करने पर निर्भर करता है जीमूत वाहन का दायभाग,
बंगाल में अत्यधिक सम्मान प्राप्त कर चुका है इनका समय १०६०—
११३० के मध्य माना जाता है ।
मिताक्षरा की जी मूत वाहन ने आलोचना की है कहें तो
कोई अत्युक्ति नहीं ।
याज्ञवल्क्य स्मृति का समस्त भारत वर्ष के न्यायालयों में आज
भी सम्मान बना हुआ है यह इसके सर्वाधिक वैशिष्ट्य का द्योतक है ।
यह तो निर्विवाद है कि इनस्मृतियों में धर्म का विवेचन हुआ
है । धर्म एक ऐसा शब्द है जिसकी परिभाषा करना बड़ा कठिन है ।
वेद में धर्मन् शब्द का प्रयोग विशेषण या संज्ञा के रूप में आया है
धर्मन् शब्द, धृ धातु से बना है । जिसका तात्पर्य है धारण करना
आलम्बन देना, पालन करना, ऋग्वेद में यह शब्द पुल्लिंग तथा न०पुंसक
लिंग दोनों में ही व्यवहृत है ।
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१ अथर्व वेद में, धर्म शब्द का प्रयोग धार्मिक क्रिया संस्कार
करने से अर्जित गुण के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । ऐतरेय ब्राह्मण में धर्म
शब्द सकल धार्मिक कर्तव्य के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । २ छान्दोग्य के
अनुसार धर्म त्रिविध है, (१) यज्ञ-दान, अध्ययन । (२) तपस्या अर्थात्
तापस धर्म (३) ब्रह्मचर्य । यह धर्म शब्द आश्रमों के विलक्षण कर्तव्यों
की ओर संकेतित हैं । धर्म शब्द का अर्थ समय समय पर परिवर्तित
भी होता रहा है । सुप्रसिद्ध स्मृतिकार मनु ने वर्णधर्म-आश्रम धर्म-
वर्णाश्रम धर्म नैमित्तिक धर्म-गुण धर्म माने हैं ।
याज्ञवल्क्य आदि स्मृतिकारों ने भी धर्म के इस विकसित रूप
का विवेचन किया है । याज्ञवल्क्य की टीकाओं में विज्ञानेश्वर की
मिताक्षरा का सर्वत्र सम्मान है ।
विभिन्न परी क्षाओं में यह ग्रन्थ निर्धारित हैं, इसस्मृतिका
उपयोगी अंश दाय भाग है, बंगाल के भाग के अतिरिक्त अन्यत्र
भारतीय व्यवहार में इस मिताक्षरा का अत्यधिक आदर है ।
याज्ञ वल्क्य वैदिक ऋषि परंपरा में हैं । मिताक्षरा कार का
कथन है कि याज्ञ वल्क्य के किसी शिष्य ने धर्म शास्त्र को संक्षिप्त
करके कथनोपकथन के रूप में रखा है । याज्ञ वल्क्य स्मृति में १००६
श्लोक है । यह स्मृति मनुस्मृति से कलेवर में सूक्ष्म है । मनुस्मृति में
२७०० श्लोक है । यह स्मृति अनुष्टुप् छन्द में लिखी गई है । मिताक्षरा
कार ने याज्ञ वल्क्य की प्रतिभा का समुज्ज्वल रूप ही प्रदर्शित किया
है, दाय भाग में —
बंटवारा-इसका समय, विभाजन में स्त्री भाग, पिता मृत्यु
के बाद बँटवारा, विभाजन योग्य सम्पत्ति, पिता पुत्र का संयुक्त स्वा-
मित्व बारह प्रकार के पुत्र, शूद्रका अनौरस पुत्र, पुत्र हीन पिता के
१-अथ-६।६।१७
२-ऐत-ब्राः ७।१७
space between धन्य and वादस्य!
Yes, धन्य वादस्य भाजनम् ॥ has a space between धन्य and वादस्य.
Now, let's look at the text before छात्राणां (or च्छात्राणां):
How many letters are there between विदु... and त्राणां?
Let's look at the print:
विदुषो or विदुषां?
There is:
वि दु षो (or षां)
Then a gap?
Then च छात्राणां?
Wait, look at the glyphs:
Is that च?
Wait, let's look at the couplet in the subhashita style:
Line 12-13:
दुर्बोधांयदतीव तद्विजहति स्पष्टार्थ मित्युक्तिभिः
Wait, look at Line 12:
दुर्बोधांयदतीव -> wait, is it दुर्बोधं यदतीव?
In the print:
दु र्बो धं य द ती व -> wait, is it दुर्बोधां or दुर्बोधं?
Look at दुर्बो: दु, र्बो (
दो शब्द
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श्री १०८ श्री श्रीवर शास्त्रि गुरु चरण कमले भ्यो नमः
बाचक वृन्द
याज्ञ वल्क्य स्मृति के दाय भाग का भारतवर्ष के अधिकांश
भाग में सम्मान है, भारतीय सांविधान इसी स्मृति की मिताक्षरा
टीका का अवलम्बन लेकर कतिपय गम्भीर विवादों का समाधान
करता है, आंग्ल शासकों ने भारतीय विवाह—दतकाधिकार आदि के
'कानून, बहुधा इसी के आधार पर बनाये थे।
दाय भाग में यद्यपि श्लोक संख्या ३४ है तथापि मिताक्षरा
कार का अभिप्राय लग-भग ४० पृष्ठों में पूर्ण हुआ है। मिताक्षरा की
भाषा प्रौढ़ एवं धर्म शास्त्रों के गहन मर्मों से परिपूर्ण है। धर्म शास्त्रा
चार्य परीक्षा में प्रविष्ट होते समय मेरा ध्यान इस ओर गया, परन्तु
उस समय यह कार्य पूर्ण न हुआ, गत वर्ष एम० ए० प्रथम वर्ष ( सं०
के छात्रों ने जब धर्म शास्त्र का प्रश्न पत्र लिया तब उनकी कठिनाई
का ध्यान रखकर इसकी हिन्दी टीका करने का विचार किया, यह
उसी विचार का पल्लवित रूप है।
यद्यपि यह हिन्दी टीका कई मास पूर्व लिखी जा चुकी थी
तथापि मुद्रण सम्बन्धी अव्यवस्था ने इसे अभी तक रोके रखा।
अकस्मात् श्री स्वामी जी महाराज ने इसे छात्रों की सुविधा
का ध्यान रखते हुए प्रोत्साहित किया यह उन्हीं की कृपा का फल है जो
इतनी शीघ्र प्रकाशित हो रही है।
इस साहाय्य के लिये मैं स्वामी जी से किन शब्दों में कृतज्ञता
प्रकट करूं नहीं जानता।
'मिताक्षरा सहित दाय भाग प्रकाशित करने का विचार था
परन्तु कतिपय मुद्रण सम्बन्धी अव्यवस्थाओं के कारण वह पूर्ण नहीं
हो पाया ।
भूमिका लेखक डा० हरिदत्त जी शास्त्री से निवेदन करने के
लिये मेरे पास मार्मिक शब्द नहीं हैं, उनकी असीम कृपा को व्यक्त
भी कैसे करूँ समझ में नहीं आता ।
अन्त में मैं प्रेस के अध्यक्ष श्री बैजनाथ जी दानी एवं कर्म
चारियों को भी धन्यवाद देकर विद्वानों से निवेदन करूंगा कि इसमें
यदि कोई त्रुटि रह गई हो वह मेरी समझें, जो ग्राह्य अंश अच्छा बन
गया हो मेरे गुरु जनों का आशीर्वाद समझ कर पढ़ें व मुझे उचित
परामर्श दें मैं उनका आभारी रहूँगा ।
गतश्रम टीला विदुषां वशंवदः
मथुरा वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी
रंगभरी एकादशी सम्वत् २०२२