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सर्वकोश
दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

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CC-0. Agamnigam Digital Presevation Foundation, Chandigarh
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टीका है। नाम से ही ज्ञात होता है कि यह एक संक्षिप्त विवरण
वाली रचना है, पूर्व मीमांसा के अनेक गूढ विषयों के विवेचन से
स्पष्ट होता है कि ये पूर्व मीमांसा के पूर्ण ज्ञाता थे। धर्मशास्त्र साहित्य
में इसका अनुपम स्थान हैं, पतञ्जलि कृत महाभाष्य, मम्मट कृत
काव्य प्रकाश, शङ्कर कृत भाष्य का जो सम्मान है वही मिताक्षरा
का है।
मिताक्षरा के विषय परिशीलन से ज्ञात होता है कि सहस्त्रों
वर्ष पूर्व के मतों का सार ग्रहण करके अपनी बुद्धि के ढांचे में ऐसा
ढाला जिसमे अनेक सिद्धान्तों का विकास हुआ। यह ग्रन्थ न केवल
याज्ञवल्क्य स्मृतिका एक भाष्य मात्र है अपितु यह एक स्मृति सम्बन्धी
निबन्ध है। मिताक्षरा में—प्रसहाय—विश्व रूप, मेधातिथि, श्रीकर,
भारुवि, तथा भाजदेव का नामोल्लेख है। पाणिनि—प्राभाकर का
नाम भी प्राप्त होता है।
देवणण भट्ट की स्मृति चन्द्रिका जिसकी रचना लग-भग १२००
ई० है, ने मिताक्षरा के सिद्धान्तों का उल्लेख किया है, लक्ष्मी धर के
कल्पतरु में विज्ञानेश्वर का नाम है इस ग्रन्थ की रचना १२ वीं.
शताब्दी के मध्य मानी गई है। विश्वरूप मेधातिथि धारेश्वर के नाम
मिताक्षरा में हैं अतः यह १०५० के पश्चात तथा १२ई० के पूर्व लगभग
११२० की रचना मानी जा सकती है
१०७०—११०० ई० के मध्य अन्य प्रमाणों के अनुसार म
जाता है। विज्ञानेश्वर के अनेक भाष्य हुए जिसमें विश्वेश्वर—
पण्डित एवं बालम्भट्ट के नाम अति प्रसिद्ध हैं।
विश्वेश्वर भट्ट—द्रविड़ देश के निवासी थे। आधुनिक
कानून की बनारसी शाखा के विश्वेश्वर भट्ट एक नामी प्रा
लेखक माने जाते हैं। याज्ञवल्क्य की मिताक्षरापर इन्होंने सु
नामक टीका लिखी है—इसके अतिरिक्त इन्होंने—तिथिनि
स्मृति कौमुदी, स्मृति महार्णव, मदन पारि जात नामक ग्रन्थ