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सर्वकोश
दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दायभाग (जीमूतवाहन - पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Dayabhaga of Jimutavahana with Hindi Commentary

जीमूतवाहन (टीकाकार: पं. वासुदेव कृष्ण चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished46 पृष्ठ

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आमुख
CC-0. Agamnigam Digital Preservation Foundation, Chandigarh
डा० हरिदत्त शास्त्री एम० ए० पी० एच० डी
संस्कृत वाङ् मय में स्मृतियों का अपना विशिष्ट स्थान है, भार-
तीय शासन व्यवस्था में, प्रत्यक्ष परोक्ष किसी न किसी रूप में ये अब
भी सहायक हैं ।
याज्ञवल्क्य स्मृति का प्रणयन याज्ञ वल्क्य महर्षि ने किया यह
सर्व विदित है । इस स्मृति पर मिताक्षरा टीका की सर्वाधिक प्रसिद्धि है ।
इसके प्रणेता विज्ञानेश्वर एवं अन्य कतिपय व्याख्याकारों का परिचय
यहाँ देना उचित ही होगा ।
विज्ञानेश्वर
इनके पिता का नाम पद्मनाभ भट्ट था । इनका
जन्म स्थान कल्याण पुर ( हैदराबाद ) था । विज्ञानेश्वर परमहंस
उत्तम के शिष्य थे, विक्रमादित्य देव या विक्रमार्क के ये समकालीन
थे क्यों कि इन्होंने उनका उल्लेख अपनी टीका के आरम्भ में किया है—
नासीदस्ति भविष्यति क्षिति तले कल्याण कल्प पुरम्
नो दृष्टः श्रुत एव वा क्षिति पतिः श्री विक्रमार्कोपमः
विज्ञानेश्वर पण्डितो न भजते किं चान्यदन्योपम—
श्चाकल्पं स्थिर मस्तु कल्प लतिका कल्प तदेतत्त्रयम् ॥
विज्ञानेश्वर लिखता है कि कल्याण पुर के समान अन्य कोई
नगर तो है और न 'होगा, और न विक्रमार्क की उपमा वाला अन्य कोई
विद्वज्जनप्रिय राजा ही है । इतना ही नहीं वह सुन्दर वक्ता एवं विद्वानों
के आश्चर्य की सीमा भी है—
स्रष्टा वाचां मधुर वपुषां विद्वदा श्चर्य सीम्नां
दातार्यानामतिशयजुषामर्थिसार्थार्थनीया
आच प्राचः समुद्रान्नत नृपति शिरोरत्न भा भा सुराङ्घ्रिः
पायादाचन्द्र तारं जगदिदमखिलं विक्रमादित्य देवः ॥
इनकी सुप्रसिद्ध कृति—'मिताक्षरा'— याज्ञवल्क्य स्मृति की