सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
श्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2
वसुधा सब फूलै फलै, पृथ्वी अनंत अपार ।
गगन गर्ज जल थल भरै, दादू जै जै कार ।। 158 ।।
काला मुँह कर काल का, सांई सदा सुकाल ।
मेघ तुम्हारे घर घणां, बरसहु दीनदयाल ।। 159 ।।
इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम
तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा
धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं
मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य तृतीयो विरह का अंग सम्पूर्ण ।। अंग
3 ।। साखी 159 ।।
दादूराम
राम
सत्यराम
- 70 -
परिचय का अंग
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अथ परिचय का अंग ४
मंगलाचरण
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः।
वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥
दादू निरंतर पीव पाइया, तहँ पंखी उनमनि जाइ।
सप्तों मंडल भेदिया, अष्टैं रह्या समाइ ॥ 2 ॥
परमात्मा का स्वरूप
दादू निरंतर पीव पाइया, तहँ निगम न पहुँचे वेद।
तेज स्वरूपी पीव बसे, कोई बिरला जानैं भेद ॥ 3 ॥
परमेश्वर का निवास
दादू निरंतर पीव पाइया, तीन लोक भरपूर।
सब सेजों साँई बसै, लोक बतावैं दूर ॥ 4 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू निरंतर पीव पाइया, जहाँ आनन्द बारह मास।
हंस सौं परम हंस खेलै, तहँ सेवक स्वामी पास ॥ 5 ॥
दादू रंग भर खेलौं पीव सौं, तहँ बाजै बैन रसाल।
अकल पाट पर बैठा स्वामी, प्रेम पिलावै लाल ॥ 6 ॥
दादू रंग भर खेलौं पीव सौं, सेती दीनदयाल।
निसवासर नहिं तहँ बसै, मानसरोवर पाल ॥ 7 ॥
दादू रंग भर खेलौं पीव सौं, तहँ कबहुँ न होइ वियोग।
आदि पुरुष अन्तर मिल्या, कुछ पूरबले संयोग ॥ 8 ॥
दादू रंग भर खेलौं पीव सौं, तहँ बारह मास बसंत।
सेवग सदा आनन्द है, जुग जुग देखूँ कंत ॥ 9 ॥
भगवत् प्राप्ति का स्थान
दादू काया अन्तर पाइया, त्रिकुटी केरे तीर।
सहजैं आप लखाइया, व्याप्या सकल सरीर ॥ 10 ॥
दादू काया अंतर पाइया, निरन्तर निरधार।
सहजैं आप लखाइया, ऐसा समरथ सार ॥ 11 ॥
दादू काया अंतर पाइया, अनहद बैन बजाइ।
सहजैं आप लखाइया, शून्य मंडल में जाइ ॥ 12 ॥
दादू काया अंतर पाइया, सब देवन का देव।
सहजैं आप लखाइया, ऐसा अलख अभेव ॥ 13 ॥
सुख महिमा और फल
दादू भँवर कँवल रस बेधिया, सुख सरवर रस पीव।
तहँ हंसा मोती चुणै, पीव देखै सुख जीव ॥ 14 ॥
दादू भँवर कँवल रस बेधिया, गहे चरण कर हेत।
पीवजी परसत ही भया, रोम रोम सब श्वेत ॥ 15 ॥
दादू भँवर कँवल रस बेधिया, अनत न भरमै जाइ।
तहाँ बास बिलंबिया, मगन भया रस खाइ ॥ 16 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू भँवर कँवल रस बेधिया, गही जो पीव की ओट।
तहाँ दिल भँवरा रहै, कौण करै शिर चोट ॥ 17 ॥
परिचय जिज्ञासु उपदेश
दादू खोजि तहाँ पीव पाइये, सबद ऊपने पास।
तहाँ एक एकांत है, जहाँ ज्योति प्रकास ॥ 18 ॥
दादू खोजि तहाँ पीव पाइये, जहाँ चन्द न ऊगे सूर।
निरंतर निर्धार है, तेज रह्या भरपूर ॥ 19 ॥
दादू खोजि तहाँ पीव पाइये, जहाँ बिन जिह्वा गुण गाइ।
तहँआदि पुरुष अलेख है, सहजैं रह्या समाइ ॥ 20 ॥
दादू खोजि तहाँ पीव पाइये, जहाँ अजरा अमर उमंग।
जरा मरण भौ भाजसी, राखै अपणे संग ॥ 21 ॥
जिज्ञासु उपदेश (सिंधी)
दादू गाफिल छो वतें, मंझेइ रबु निहारि।
मंझेइ पीव पाण जो, मंझेइ सु विचारि ॥ 22 ॥
दादू गाफिल छो वतें, आहे मंझि अलाह।
पिरी पांण जो पाण सैं, लहै सभोई साव ॥ 23 ॥
दादू गाफिल छो वतें, आहे मंझि मकान।
दरगह में दीवाण तत, पसेन बैठो पाण ॥ 24 ॥
दादू गाफिल छो वतें, अंदर पिरीं पसु।
तखत रबाणीं बीच मैं, पे तिन्हीं वसु ॥ 25 ॥
परिचय साक्षात्कार
हरि चिन्तामणि चिन्ततां, चिंता चित की जाइ।
चिंतामणि चित में मिल्या, तहँ दादू रह्या लुभाइ ॥ 26 ॥
घी सो घोट = आत्म अभ्यास
अपने नैनहुँ आप को, जब आतम देखै।
तहँ दादू परमात्मा, ताही को पेखै ॥ 27 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू बिन रसना जहँ बोलिये, तहँ अंतरयामी आप ।
बिन श्रवणहुँ सांई सुनै, जे कुछ कीजे जाप ॥ 28 ॥
परिचय जिज्ञासु उपदेश
ज्ञान लहर जहाँ थैं उठै, वाणी का परकास ।
अनुभव जहाँ थैं उपजे, शब्दैं किया निवास ॥ 29 ॥
सो घर सदा विचार का, तहाँ निरंजन वास ।
तहँ तूँ दादू खोजि ले, ब्रह्म जीव के पास ॥ 30 ॥
जहाँ तन मन का मूल है, उपजे ओंकार ।
अनहद सेझा शब्द का, आतम करै विचार ॥ 31 ॥
भाव भक्ति लै ऊपजै, सो ठाहर निज सार ।
तहँ दादू निधि पाइये, निरंतर निरधार ॥ 32 ॥
एक ठौर सूझै सदा, निकट निरन्तर ठाउँ ।
तहाँ निरंजन पूरि ले, अजरावर तिहिं नाउँ ॥ 33 ॥
साधु जन क्रीला करैं, सदा सुखी तिहिं गाँव ।
चलु दादू उस ठौर की, मैं बलिहारी जाँव ॥ 34 ॥
दादू पसु पिरंनि के, पेही मंझि कलूब ।
बैठो आहे बीच में, पाण जो महबूब ॥ 35 ॥
नैनहुँ वाला निरखि करि, दादू घालै हाथ ।
तब ही पावै रामधन, निकट निरंजन नाथ ॥ 36 ॥
नैनहुँ बिन सूझे नहीं, भूला कतहूँ जाइ ।
दादू धन पावै नहीं, आया मूल गँवाइ ॥ 37 ॥
परिचय लै लक्षण सहज
जहाँ आत्म तहाँ राम है, सकल रह्या भरपूर ।
अंतरगति लयौ लाइ रहु, दादू सेवक सूर ॥ 38 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
परिचय जिज्ञासु उपदेश
पहली लोचन दीजिये, पीछे ब्रह्म दिखाइ ।
दादू सूझै सार सब, सुख में रहे समाइ ॥ 39 ॥
आंधी के आनन्द हुआ, नैनहुँ सूझन लाग ।
दर्शन देखे पीव का, दादू मोटे भाग ॥ 40 ॥
दादू मिहीं महल बारीक है, गाँव न ठाँव न नाँव ।
तासों मन लागा रहै, मैं बलिहारी जाँव ॥ 41 ॥
दादू खेल्या चाहै प्रेम रस, आलम अंगि लगाइ ।
दूजे को ठाहर नहीं, पुहुप न गंध समाइ ॥ 42 ॥
नाहीं ह्वै करि नाम ले, कुछ न कहाई रे ।
साहिब जी की सेज पर, दादू जाई रे ॥ 43 ॥
जहाँ राम तहँ मैं नहीं, मैं तहँ नाहीं राम ।
दादू महल बारीक है, द्वै को नाहीं ठाम ॥ 44 ॥
मैं नाहीं तहँ मैं गया, एकै दूसर नाहीं ।
नाहीं को ठाहर घणी, दादू निज घर माहिं ॥ 45 ॥
दादू मैं नाहीं तहँ मैं गया, आगे एक अलाव ।
दादू ऐसी बंदगी, दूजा नाहीं आव ॥ 46 ॥
दादू आपा जब लगै, तब लग दूजा होइ ।
जब यहु आपा मिट गया, तब दूजा नाहीं कोइ ॥ 47 ॥
दादू मैं नाहीं तब एक है, मैं आई तब दोइ ।
मैं तैं पड़दा मिट गया, तब ज्यूं था त्यूं ही होइ ॥ 48 ॥
दादू है को भय घणां, नाहीं को कुछ नाहीं ।
दादू नाहीं होइ रहु, अपणे साहिब माहिं ॥ 49 ॥
परिचय
दादू तीन शून्य आकार की, चौथी निर्गुण नाम ।
सहज शून्य में रमि रह्या, जहाँ तहाँ सब ठाम ॥ 50 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
काया शून्य पंच का बासा, आत्म शून्य प्राण प्रकासा।
परम शून्य ब्रह्म सौं मेला, आगे दादू आप अकेला ॥ 51 ॥
पाँच तत्त्व के पांच हैं, आठ तत्त्व के आठ।
आठ तत्त्व का एक है, तहाँ निरंजन हाट ॥ 52 ॥
जहाँ मन माया ब्रह्म था, गुण इन्द्रिय आकार।
तहँ मन बिरचै सबनि थैं, रचि रहु सिरजनहार ॥ 53 ॥
दादू जहाँ थैं सब ऊपजै, चंद सूर आकाश।
पानी पवन पावक किये, धरती का प्रकाश ॥ 54 ॥
काल कर्म जीव ऊपजै, माया मन घट श्वास।
तहँ रहता रमता राम है, सहज शून्य सब पास ॥ 55 ॥
सहज शून्य सब ठौर है, सब घट सबही माहिं।
तहाँ निरंजन रम रह्या, कोई गुण व्यापै नाहीं ॥ 56 ॥
दादू तिस सरवर के तीर, सो हंसा मोती चुणैं।
पीवैं नीझर नीर, सो है हंसा सो सुणैं ॥ 57 ॥
दादू तिस सरवर के तीर, जप तप संयम कीजिये।
तहँ सनमुख सिरजनहार, प्रेम पिलावै पीजिये ॥ 58 ॥
दादू तिस सरवर के तीर, संगी सबै सुहावणे।
तहाँ बिन कर बाजै बैन, जिभ्या हीणे गावणे ॥ 59 ॥
दादू तिस सरवर के तीर, चरण कमल चित लाइया।
तहँ आदि निरंजन पीव, भाग हमारे आइया ॥ 60 ॥
दादू सहज सरोवर आतमा, हंसा करै कलोल।
सुख सागर सूभर भऱ्या, मुक्ताहल मन मोल ॥ 61 ॥
दादू हरि सरवर पूरण सबै, जित तित पाणी पीव।
जहाँ तहाँ जल अचंतां, गई तृषा सुख जीव ॥ 62 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
सुख सागर सूभर भर्या, उज्जवल निर्मल नीर।
प्यास बिना पीवै नहीं, दादू सागर तीर ॥ 63 ॥
शून्य सरोवर हंस मन, मोती आप अनंत।
दादू चुगि चुगि चंचुभरि, यौं जन जीवैं संत ॥ 64 ॥
शून्य सरोवर मीन मन, नीर निरंजन देव।
दादू यहु रस विलसिये, ऐसा अलख अभेव ॥ 65 ॥
शून्य सरोवर मन भँवर, तहाँ कमल करतार।
दादू परिमल पीजिए, सन्मुख सिरजनहार ॥ 66 ॥
शून्य सरोवर सहज का, तहँ मर जीवा मन।
दादू चुणि चुणि लेयगा, भीतर राम रतन ॥ 67 ॥
दादू मंझि सरोवर विमल जल, हंसा केलि करांहि।
मुक्ताहल मुक्ता चुगैं, तिहिं हंसा डर नांहि ॥ 68 ॥
अखंड सरोवर अथग जल, हंसा सरवर न्हाँहि।
निर्भय पायाआप घर, अब उड़ि अनत न जांहि ॥ 69 ॥
दादू दरिया प्रेम का, तामें झूलैं दोइ।
इक आतम परआतमा, एकमेक रस होइ ॥ 70 ॥
दादू हिण दरियाव, माणिक मंझेई।
डुबि डेई पाण मैं, डिठो हंजेई ॥ 71 ॥
परआतम सौं आत्मा, ज्यूँ हंस सरोवर मांहि।
हिलि मिलि खेलैं पीव सौं, दादू दूसर नांहि ॥ 72 ॥
दादू सरवर सहज का, तामें प्रेम तरंग।
तहँ मन झूलै आत्मा, अपणे सांई संग ॥ 73 ॥
दादू देखौं निज पीव को, दूसर देखौं नांहि।
सबै दिसा सौं सोधि करि, पाया घट ही मांहि ॥ 74 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू देखौं निज पीव को, और न देखौं कोइ।
पूरा देखौं पीव को, बाहिर भीतर सोइ ॥ 75 ॥
दादू देखौं निज पीव को, देखत हि दुख जाइ।
हूँ तो देखौं पीव को, सब में रह्या समाइ ॥ 76 ॥
दादू देखौं निज पीव को, सोई देखन जोग।
परगट देखौं पीव को, कहाँ बतावैं लोग ॥ 77 ॥
परिचय जिज्ञासु उपदेश
दादू देखु दयालु को, सकल रह्या भरपूर।
रोम रोम में रमि रह्या, तूँ जनि जानै दूर ॥ 78 ॥
दादू देखु दयालु को, बाहरि भीतरि सोइ।
सब दिसि देखौं पीव को, दूसर नाहीं कोइ ॥ 79 ॥
दादू देखु दयालु को, सनमुख सांई सार।
जीधरि देखौं नैन भरि, तीधरि सिरजनहार ॥ 80 ॥
दादू देखु दयालु को, रोक रह्या सब ठौर।
घट घट मेरा सांइयाँ, तूँ जनि जानै और ॥ 81 ॥
उभै असमाव
तन मन नाहीं, मैं नहीं, नहीं माया, नहीं जीव।
दादू एकै देखिए, दह दिसि मेरा पीव ॥ 82 ॥
दादू पाणी मांहीं पैसि करि, देखै दृष्टि उघारि।
जलाबिंब सब भरि रह्या, ऐसा ब्रह्म विचारि ॥ 83 ॥
सदा लीन आनन्द में, सहज रूप सब ठौर।
दादू देखै एक को, दूजा नाहीं और ॥ 84 ॥
दादू जहाँ तहँ साथी संग है, मेरे सदा अनंद।
नैन बैन हिरदै रहै, पूरण परमानंद ॥ 85 ॥
जागत जगपति देखिये, पूरण परमानंद।
सोवत भी सांई मिलै, दादू अति आनन्द ॥ 86 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू दह दिश दीपक तेज के, बिन बाती बिन तेल।
चहुँ दिसि सूरज देखिये, दादू अद्भुत खेल ॥ 87 ॥
सूरज कोटि प्रकास है, रोम रोम की लार।
दादू ज्योति जगदीश की, अंत न आवै पार ॥ 88 ॥
ज्यों रवि एक आकाश है, ऐसे सकल भरपूर।
दादू तेज अनन्त है, अल्लह आली नूर ॥ 89 ॥
सूरज नहीं तहँ सूरज देख्या, चंद नहीं तहँ चन्दा।
तारे नहीं तहँ झिलमिल देख्या, दादू अति आनन्दा ॥ 90 ॥
बादल नहीं तहँ बरषत देख्या, शब्द नहीं गरजंदा।
बीज नहीं तहँ चमकत देख्या, दादू परमानन्दा ॥ 91 ॥
आत्म बेलीतरु
दादू जोति चमकै झिलमिलै, तेज पुंज प्रकाश।
अमृत झरै रस पीजिए, अमर बेलि आकाश ॥ 92 ॥
परिचय अंग
दादू अविनाशी अंग तेज का, ऐसा तत्त्व अनूप।
सो हम देख्या नैन भरि, सुन्दर सहज स्वरूप ॥ 93 ॥
परम तेज प्रगट भया, तहाँ मन रह्या समाइ।
दादू खेलै पीव सौं, नहीं आवै नहीं जाइ ॥ 94 ॥
निराधार निज देखिये, नैनहुँ लागा बन्द।
तहँ मन खेलै पीव सौं, दादू सदा आनन्द ॥ 95 ॥
आत्म बेलितरु
ऐसा एक अनूप फल, बीज बाकुला नांहि।
मीठा निर्मल एक रस, दादू नैनहुँ मांहि ॥ 96 ॥
परिचय
हीरे हीरे तेज के, सो निरखै त्रय लोइ।
कोइ इक देखै संत जन, और न देखै कोइ ॥ 97 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
नैन हमारे नूर मां, तहाँ रहै ल्यौ लाइ ।
दादू उस दीदार को, निसदिन निरखत जाइ ॥ 98 ॥
दादू नैनहुँ आगे देखिये, आत्म अंतर सोइ ।
तेज पुंज सब भरि रह्या, झिलमिल झिलमिल होइ ॥ 99 ॥
अनहद बाजे बाजिये, अमरापुरी निवास ।
जोति स्वरूपी जगमगै, कोइ निरखै निज दास ॥ 100 ॥
परम तेज तहँ मन रहे, परम नूर निज देखे ।
परम जोति तहँ आतम खेले, दादू जीवन लेखे ॥ 101 ॥
दादू जरै सु जोति स्वरूप है, जरै सु तेज अनंत ।
जरै सु झिलमिल नूर है, जरै सु पुंज रहंत ॥ 102 ॥
परिचय पति पहचान
सतगुरु अलख अलाह का, कहु कैसा है नूर ।
दादू बेहद हद नहीं, सकल रह्या भरपूर ॥ 103 ॥
वार पार नहिं नूर का, दादू तेज अनंत ।
कीमत नहीं करतार की, ऐसा है भगवंत ॥ 104 ॥
निरसंध नूर अपार है, तेज पुंज सब मांहि ।
दादू जोति अनंत है, आगो पीछो नांहि ॥ 105 ॥
खंड खंड निज ना भया, एकलस एकै नूर ।
ज्यूं था त्यूं ही तेज है, ज्योति रही भरपूर ॥ 106 ॥
परम तेज प्रकास है, परम नूर निवास ।
परम ज्योति आनन्द में, हंसा दादू दास ॥ 107 ॥
परिचय साक्षात्कार
नूर सरीखा नूर है, तेज सरीखा तेज ।
ज्योति सरीखी ज्योति है, दादू खेलै सेज ॥ 108 ॥
तेज पुंज की सुन्दरी, तेज पुंज का कंत ।
तेज पुंज की सेज पर, दादू बन्या बसंत ॥ 109 ॥
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पुहप प्रेम बरसै सदा, हरि जन खेलैं फाग।
ऐसा कौतुक देखिये, दादू मोटे भाग ॥ 110 ॥
परिचय रस
अमृतधारा देखिए, पारब्रह्म बरषंत।
तेज पुंज झिलमिल झरै, को साधु जन पीवंत ॥ 111 ॥
रस ही में रस बरषि है, धारा कोटि अनंत।
तहाँ मन निश्चल राखिये, दादू सदा बसंत ॥ 112 ॥
घन बादल बिन बरषि है, नीझर निर्मल धार।
दादू भीजै आत्मा, को साधु पीवनहार ॥ 113 ॥
ऐसा अचरज देखिया, बिन बादल बरषै मेह।
तहँ चित चातक है रह्या, दादू अधिक स्नेह ॥ 114 ॥
महारस मीठा पीजिये, अविगत अलख अनन्त।
दादू निर्मल देखिये, सहजैं सदा झरंत ॥ 115 ॥
परिचय कामधेनु
कामधेनु दुहि पीजिये, अकल अनुपम एक।
दादू पीवै प्रेम सौं, निर्मल धार अनेक ॥ 116 ॥
कामधेनु दुहि पीजिये, ताको लखै न कोइ।
दादू पीवै प्यास सौं, महारस मीठा सोइ ॥ 117 ॥
कामधेनु दुहि पीजिये, अलख रूप आनन्द।
दादू पीवै हेत सौं, सुखमन लागा बंद ॥ 118 ॥
कामधेनु दुहि पीजिये, अगम अगोचर जाइ।
दादू पीवै प्रीति सूं, तेज पुंज की गाइ ॥ 119 ॥
कामधेनु करतार है, अमृत सरवै सोइ।
दादू बछरा दूध को, पीवै तो सुख होइ ॥ 120 ॥
ऐसी एकै गाइ है, दूझै बारह मास।
सो सदा हमारे संग है, दादू आतम पास ॥ 121 ॥
श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
परिचय आत्मबली तरु
तरुवर साखा मूल बिन, धरती पर नांही ।
अविचल अमर अनंत फल, सो दादू खांही ॥ 122 ॥
तरुवर साखा मूल बिन, धर अंबर न्यारा ।
अविनाशी आनन्द फल, दादू का प्यारा ॥ 123 ॥
तरुवर साखा मूल बिन, रज बीरज रहिता ।
अजरा अमर अतीत फल, सो दादू गहिता ॥ 124 ॥
तरुवर साखा मूल बिन, उत्पति परलै नांहि ।
रहिता रमता राम फल, दादू नैनहुँ मांहि ॥ 125 ॥
प्राण तरुवर सुरति जड़, ब्रह्म भूमि ता मांहि ।
रस पीवै फूलै फलै, दादू सूखै नांहि ॥ 126 ॥
परिचय जिज्ञासु उपदेश (प्रश्न)
ब्रह्म सुनि तहँ क्या रहै ? आतम के अस्थान ?
काया अस्थल क्या बसै ? सतगुरु कहो सुजान ॥ 127 ॥
देह अध्यासियों के लक्षण (उत्तर)
काया के अस्थल रहैं, मन राजा पंच प्रधान ।
पच्चीस प्रकृति तीन गुण, आपा गर्व गुमान ॥ 128 ॥
आत्म जिज्ञासु के लक्षण
आतम के स्थान हैं, ज्ञान ध्यान विश्वास ।
सहज सील संतोष सत, भाव भक्ति निधि पास ॥ 129 ॥
ब्रह्मनिष्ठ के लक्षण
ब्रह्म शून्य तहँ ब्रह्म है, निरंजन निराकार ।
नूर तेज तहँ ज्योति है, दादू देखणहार ॥ 130 ॥
अबुल फज़ल के प्रश्न
मौजूद खबर, माबूद खबर, अरवाह खबर औजूद ।
मुकाम चिः चीज हस्त, दादनी सजूद ॥ 131 ॥
- 82 -
श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
औजूद मकामे हस्त - देह अध्यासी के लक्षण
नफ़्स गालिब किब्र काबिज, गुस्सः मनी एस्त ।
दुइ दरोग, हिर्स हुज्जत, नाम नेकी नेस्त ॥ 132 ॥
अरवाह मकामे हस्त - आत्मवादी के लक्षण
इश्क इबादत बंदगी, यगानगी इखलास ।
मिहर मुहब्बत, खैर खूबी, नाम नेकी पास ॥ 133 ॥
माबूद मकामे हस्त - ब्रह्मवादी के लक्षण
यके नूर खूबे खूबां, दीदनी हैरान ।
अजब चीज खुरदनी, पियालए मस्तान ॥ 134 ॥
मौजूद खबर (शरीयत - मंजिल)
हैवान आलम गुमराह गाफिल, अव्वल शरीयत पंद ।
हलाल हराम नेकी बदी, दर्से दानिशमंद ॥ 135 ॥
तरीकत मंजिल
कुल फारिग तर्क दुनिया, हररोज हरदम याद ।
अल्हः आली इश्क आशिक, दरूने फरियाद ॥ 136 ॥
मार्फत मंजिल
आब आतश अर्श कुर्सी, सूरते सुबहान ।
शिरर सिफ़्त करद बूद, मारफत मकाम ॥ 137 ॥
हकीकत मंजिल
हक हासिल नूर दीदम, करारे मकसूद ।
दीदार दरिया अरवाहे आमद, मौजूदे मौजूद ॥ 138 ॥
चारों मंजिलें
चहार मंजिल बयां गुप्तम, दस्त करदः बूद ।
पीरां मुरीदां खबर करदः, जां राहे माबूद ॥ 139 ॥
पहली प्राण पशु नर कीजे, साच झूठ संसार ।
नीति अनीति भला बुरा, शुभ अशुभ निरधार ॥ 140 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
सब तज देखि विचार कर, मेरा नाहीं कोइ।
अनुदिन राता राम सौं, भाव भक्ति रत होइ ॥ 141 ॥
दादू अंबर धरती सूर शशि, सांई, सब लै लावै अंग।
यश कीरति करुणा करै, तन मन लागा रंग ॥ 142 ॥
दादू परम तेज तहँ मैं गया, नैनहुँ देख्या आइ।
सुख संतोष पाया घणा, ज्योतिहिं ज्योति समाइ ॥ 143 ॥
अर्थ चार अस्थान का, गुरु सिष कह्या समझाइ।
मारग सिरजनहार का, भाग बड़े सो जाइ ॥ 144 ॥
नमाज सिजदा
अरवाहे सिजदा कुनंद, औजूद रा चि कार।
दादू नूर दादनी, आसिकां दीदार ॥ 145 ॥
आशिकां रहः कब्ज करदां, दिल वजां रफतंद।
अलह आले नूर दीदम, दिल है दादू बंद ॥ 146 ॥
आशिकां मस्ताने आलम, खुरदनी दीदार।
चंद दह चिः कार दादू, यारे मां दिलदार ॥ 147 ॥
ब्रह्म साक्षात्कार धारणा
दादू दया दयालु की, सो क्यों छानी होइ।
प्रेम पुलक मुलकत रहै, सदा सुहागनी सोइ ॥ 148 ॥
दादू बिगसि बिगसि दर्शन करै, पुलकि पुलकि रस पान।
मगन गलित माता रहै, अरस परस मिलि प्राण ॥ 149 ॥
दादू देखि देखि सुमिरण करै, देखि देखि लै लीन।
देखि देखि तन मन विलै, देखि देखि चित्त दीन ॥ 150 ॥
दादू निरखि निरखि निज नाम ले, निरखि निरखि रस पीव।
निरखि निरखि पिव कौं मिलै, निरखि निरखि सुख जीव ॥ 151 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
परिचय स्मरण नाम पारख लक्षण
तन सौं सुमिरण सब करैं, आत्म सुमिरण एक ।
आत्म आगै एक रस, दादू बड़ा विवेक ॥ 152 ॥
दादू माटी के मुकाम का, सब कोइ जाणै जाप ।
एक आध अरवाह का, बिरला आपै आप ॥ 153 ॥
दादू जब लग असथल देह का, तब लग सब व्यापै ।
निर्भय असथल आत्मा, आगै रस आपै ॥ 154 ॥
जब नांही सुरति शरीर की, बिसरै सब संसार ।
आतम न जाणैं आप को, तब एक रह्या निरधार ॥ 155 ॥
तन सौं सुमिरण कीजिये, जब लग तन नीका ।
आत्म सुमिरण ऊपजै, तब लागै फीका ॥
आगै आपैं आप है, तहाँ क्या जी का ।
दादू दूजा कहन को, नाहीं लघु टीका ॥ 156 ॥
परिचय अंग
चर्म दृष्टि देखै बहुत, आतम दृष्टि एक।
ब्रह्म दृष्टि परचै भया, तब दादू बैठा देख ॥ 157 ॥
ये ही नैनां देह के, ये ही आत्म होइ ।
ये ही नैनां ब्रह्म के, दादू पलटे दोइ ॥ 158 ॥
घट परचै सब घट लखै, प्राण परचै प्राण ।
ब्रह्म परचै पाइये, दादू है हैरान ॥ 159 ॥
सूक्ष्म सौंज अरचा बंदगी
दादू जल पाषाण ज्यों, सेवै सब संसार ।
दादू पाणी लूंण ज्यों, कोइ बिरला पूजणहार ॥ 160 ॥
नाम पारिख लक्षण
अलख नाम अंतर कहै, सब घट हरि हरि होइ ।
दादू पाणी लूण ज्यों, नाम कहीजे सोइ ॥ 161 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
लै लक्षण सहज
छाड़ै सुरति शरीर को, तेज पुंज में आइ।
दादू ऐसैं मिल रहै, ज्यों जल जलहि समाइ ॥ 162 ॥
सुरति रूप शरीर का, पीव के परसे होइ।
दादू तन मन एक रस, सुमिरण कहिये सोइ ॥ 163 ॥
राम कहत राम ही रह्या, आप विसर्जन होइ।
मन पवना पंचों विलै, दादू सुमिरण सोइ ॥ 164 ॥
जहँ आतम राम संभालिये, तहँ दूजा नांही और।
देही आगे अगम है, दादू सूक्ष्म ठौर ॥ 165 ॥
पर आतम सौं आतमा, ज्यों पाणी में लूंण।
दादू तन मन एक रस, तब दूजा कहिये कूंण ॥ 166 ॥
तन मन विलै यों कीजिये, ज्यों पाणी में लूंण।
जीव ब्रह्म एकै भया, तब दूजा कहिये कूंण ॥ 167 ॥
तन मन विलै यों कीजिये, ज्यों घृत लागे घाम।
आतम कमल तहँ बंदगी, जहँ दादू प्रकट राम ॥ 168 ॥
नख शिख स्मरण
कोमल कमल तहँ पैसि कर, जहाँ न देखै कोइ।
मन थिर सुमिरण कीजिये, तब दादू दर्शन होइ ॥ 169 ॥
नखसिख सब सुमिरण करैं, ऐसा कहिये जाप।
अन्तर बिगसै आत्मा, तब दादू प्रगटै आप ॥ 170 ॥
अंतरगत हरि हरि करे, तब मुख की हाजत नांहि।
सहजैं धुनि लागी रहै, दादू मन ही मांहि ॥ 171 ॥
दादू सहजैं सुमिरण होत है, रोम रोम रमि राम।
चित्त चहूँट्या चित्त सौं, यों लीजे हरि नाम ॥ 172 ॥
दादू सुमिरण सहज का, दीन्हा आप अनंत।
अरस परस उस एक सौं, खेलैं सदा बसंत ॥ 173 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू शब्द अनाहद हम सुन्या, नखसिख सकल शरीर ।
सब घट हरि हरि होत है, सहजैं ही मन थीर ॥ 174 ॥
हुण दिल लग्गा हिकसां, मे कूं येहा ताति ।
दादू कम्म खुदाय दे, बैठा डी है राति ॥ 175 ॥
दादू माला सब आकार की, कोई साधु सुमिरै राम ।
करणी कर तैं क्या किया, ऐसा तेरा नाम ॥ 176 ॥
सब घट मुख रसना करै, रटै राम का नाम ।
दादू पीवै रामरस, अगम अगोचर ठाम ॥ 177 ॥
दादू मन चित सुस्थिर कीजिये, तो नख सिख सुमिरण होइ ।
श्रवण नेत्र मुख नासिका, पंचों पूरे सोइ ॥ 178 ॥
साध महिमा
आतम आसन राम का, तहाँ बसै भगवान ।
दादू दोन्यूं परस्पर, हरि आतम का थान ॥ 179 ॥
राम जपै रुचि साधु को, साधु जपै रुचि राम ।
दादू दोनों एक टग, यहु आरम्भ यहु काम ॥ 180 ॥
जहाँ राम तहाँ संतजन, जहाँ साधु तहाँ राम ।
दादू दोन्यूं इकट्ठे, अरस परस विश्राम ॥ 181 ॥
दादू हरि साधु यों पाइये, अविगति के आराध ।
साधु संगति हरि मिलै, हरि संगति तैं साध ॥ 182 ॥
दादू राम नाम सौं मिलि रहै, मन के छाड़ि विकार ।
तो दिल ही माँहैं देखिये, दोनों का दीदार ॥ 183 ॥
साधु समाना राम में, राम रह्या भरपूर ।
दादू दोनों एक रस, क्यों कर कीजै दूर ॥ 184 ॥
सत्संग महात्म
दादू सेवक सांई का भया, तब सेवक का सब कोइ ।
सेवक सांई को मिल्या, तब सांई सरीखा होइ ॥ 185 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
मिश्री मांही मेल कर, मोल बिकाना बंस।
यों दादू महँगा भया, पारब्रह्म मिल हंस ॥ 186 ॥
मीठे मांही राखिये, सो काहे न मीठा होइ।
दादू मीठा हाथ ले, रस पीवै सब कोइ ॥ 187 ॥
सत्संगति-कुसंगति
मीठे सौं मीठा भया, खारे सौं खारा।
दादू ऐसा जीव है, यहु रंग हमारा ॥ 188 ॥
साध महिमा महात्म्य
मीठै मीठे कर लिये, मीठा मांही बाहि।
दादू मीठा ह्वै रह्या, मीठे मांहि समाहि ॥ 189 ॥
राम बिना किस काम का, नहीं कौड़ी का जीव।
सांई सरीखा ह्वै गया, दादू परसै पीव ॥ 190 ॥
पारिख अपारिख
हीरा कौड़ी ना लहै, मूरख हाथ गँवार।
पाया पारिख जौहरी, दादू मोल अपार ॥ 191 ॥
अंधे हीरा परखिया, कीया कौड़ी मोल।
दादू साधू जौहरी, हीरे मोल न तोल ॥ 192 ॥
साध महिमा
मीरां कीया महर सौं, परदे थैं लापर्द।
राखि लिया दीदार में, दादू भूला दर्द ॥ 193 ॥
दादू नैन बिन देखबा, अंग बिन पेखबा,
रसन बिन बोलबा ब्रह्म सेती।
श्रवण बिन सुनबा, चरण बिन चालबा,
चित्त बिन चिन्तबा, सहज एती ॥ 194 ॥
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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
पतिव्रत
दादू देख्या एक मन, सो मन सब ही मांहि।
तिहि मन सौं मन मानिया, दूजा भावै नांहि ॥ 195 ॥
पुरुष प्रकाशी
दादू जिहिं घट दीपक राम का, तिहिं घट तिमिर न होइ।
उस उजियारे ज्योति के, सब जग देखै सोइ ॥ 196 ॥
पतिव्रत
दादू दिल अरवाह का, सो अपणा ईमान।
सोई साबित राखिये, जहँ देखै रहमान ॥ 197 ॥
अल्लह आप ईमान है, दादू के दिल मांहि।
सोई साबित राखिये, दूजा कोई नांहि ॥ 198 ॥
प्राण पवन ज्यों पतला, काया करै कमाइ।
दादू सब संसार में, क्योंहि गह्या न जाइ ॥ 199 ॥
नूर तेज ज्यों जोति है, प्राण पिंड यो होइ।
दृष्टि मुष्टि आवै नहीं, साहिब के वश सोइ ॥ 200 ॥
काया सूक्ष्म कर मिलै, ऐसा कोई एक।
दादू आत्म ले मिलैं, ऐसे बहुत अनेक ॥ 201 ॥
सुन्दरी सुहाग
आडा आत्म तन धरै, आप रहै ता मांहि।
आपण खेलै आप सौं, जीवन सेती नांहि ॥ 202 ॥
अध्यात्म
दादू अनभै थैं आनन्द भया, पाया निर्गुण नांव।
निश्चल निर्मल निर्वाण पद, अगम अगोचर ठांव ॥ 203 ॥
दादू अनभै वाणी अगम को, ले गई संग लगाइ।
अगह गहै, अकह कहै, अभेद भेद लहाइ ॥ 204 ॥
जो कुछ बेद कुरान थैं, अगम अगोचर बात।
सो अनभै साचा कहै, यहु दादू अकह कहात ॥ 205 ॥
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