सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू निरंतर पीव पाइया, जहाँ आनन्द बारह मास।
हंस सौं परम हंस खेलै, तहँ सेवक स्वामी पास ॥ 5 ॥
दादू रंग भर खेलौं पीव सौं, तहँ बाजै बैन रसाल।
अकल पाट पर बैठा स्वामी, प्रेम पिलावै लाल ॥ 6 ॥
दादू रंग भर खेलौं पीव सौं, सेती दीनदयाल।
निसवासर नहिं तहँ बसै, मानसरोवर पाल ॥ 7 ॥
दादू रंग भर खेलौं पीव सौं, तहँ कबहुँ न होइ वियोग।
आदि पुरुष अन्तर मिल्या, कुछ पूरबले संयोग ॥ 8 ॥
दादू रंग भर खेलौं पीव सौं, तहँ बारह मास बसंत।
सेवग सदा आनन्द है, जुग जुग देखूँ कंत ॥ 9 ॥
भगवत् प्राप्ति का स्थान
दादू काया अन्तर पाइया, त्रिकुटी केरे तीर।
सहजैं आप लखाइया, व्याप्या सकल सरीर ॥ 10 ॥
दादू काया अंतर पाइया, निरन्तर निरधार।
सहजैं आप लखाइया, ऐसा समरथ सार ॥ 11 ॥
दादू काया अंतर पाइया, अनहद बैन बजाइ।
सहजैं आप लखाइया, शून्य मंडल में जाइ ॥ 12 ॥
दादू काया अंतर पाइया, सब देवन का देव।
सहजैं आप लखाइया, ऐसा अलख अभेव ॥ 13 ॥
सुख महिमा और फल
दादू भँवर कँवल रस बेधिया, सुख सरवर रस पीव।
तहँ हंसा मोती चुणै, पीव देखै सुख जीव ॥ 14 ॥
दादू भँवर कँवल रस बेधिया, गहे चरण कर हेत।
पीवजी परसत ही भया, रोम रोम सब श्वेत ॥ 15 ॥
दादू भँवर कँवल रस बेधिया, अनत न भरमै जाइ।
तहाँ बास बिलंबिया, मगन भया रस खाइ ॥ 16 ॥
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