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सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 504 में से

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पृष्ठ 75

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
परिचय जिज्ञासु उपदेश
पहली लोचन दीजिये, पीछे ब्रह्म दिखाइ ।
दादू सूझै सार सब, सुख में रहे समाइ ॥ 39 ॥
आंधी के आनन्द हुआ, नैनहुँ सूझन लाग ।
दर्शन देखे पीव का, दादू मोटे भाग ॥ 40 ॥
दादू मिहीं महल बारीक है, गाँव न ठाँव न नाँव ।
तासों मन लागा रहै, मैं बलिहारी जाँव ॥ 41 ॥
दादू खेल्या चाहै प्रेम रस, आलम अंगि लगाइ ।
दूजे को ठाहर नहीं, पुहुप न गंध समाइ ॥ 42 ॥
नाहीं ह्वै करि नाम ले, कुछ न कहाई रे ।
साहिब जी की सेज पर, दादू जाई रे ॥ 43 ॥
जहाँ राम तहँ मैं नहीं, मैं तहँ नाहीं राम ।
दादू महल बारीक है, द्वै को नाहीं ठाम ॥ 44 ॥
मैं नाहीं तहँ मैं गया, एकै दूसर नाहीं ।
नाहीं को ठाहर घणी, दादू निज घर माहिं ॥ 45 ॥
दादू मैं नाहीं तहँ मैं गया, आगे एक अलाव ।
दादू ऐसी बंदगी, दूजा नाहीं आव ॥ 46 ॥
दादू आपा जब लगै, तब लग दूजा होइ ।
जब यहु आपा मिट गया, तब दूजा नाहीं कोइ ॥ 47 ॥
दादू मैं नाहीं तब एक है, मैं आई तब दोइ ।
मैं तैं पड़दा मिट गया, तब ज्यूं था त्यूं ही होइ ॥ 48 ॥
दादू है को भय घणां, नाहीं को कुछ नाहीं ।
दादू नाहीं होइ रहु, अपणे साहिब माहिं ॥ 49 ॥
परिचय
दादू तीन शून्य आकार की, चौथी निर्गुण नाम ।
सहज शून्य में रमि रह्या, जहाँ तहाँ सब ठाम ॥ 50 ॥

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