सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
पृष्ठ 74, कुल 504 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4
दादू बिन रसना जहँ बोलिये, तहँ अंतरयामी आप ।
बिन श्रवणहुँ सांई सुनै, जे कुछ कीजे जाप ॥ 28 ॥
परिचय जिज्ञासु उपदेश
ज्ञान लहर जहाँ थैं उठै, वाणी का परकास ।
अनुभव जहाँ थैं उपजे, शब्दैं किया निवास ॥ 29 ॥
सो घर सदा विचार का, तहाँ निरंजन वास ।
तहँ तूँ दादू खोजि ले, ब्रह्म जीव के पास ॥ 30 ॥
जहाँ तन मन का मूल है, उपजे ओंकार ।
अनहद सेझा शब्द का, आतम करै विचार ॥ 31 ॥
भाव भक्ति लै ऊपजै, सो ठाहर निज सार ।
तहँ दादू निधि पाइये, निरंतर निरधार ॥ 32 ॥
एक ठौर सूझै सदा, निकट निरन्तर ठाउँ ।
तहाँ निरंजन पूरि ले, अजरावर तिहिं नाउँ ॥ 33 ॥
साधु जन क्रीला करैं, सदा सुखी तिहिं गाँव ।
चलु दादू उस ठौर की, मैं बलिहारी जाँव ॥ 34 ॥
दादू पसु पिरंनि के, पेही मंझि कलूब ।
बैठो आहे बीच में, पाण जो महबूब ॥ 35 ॥
नैनहुँ वाला निरखि करि, दादू घालै हाथ ।
तब ही पावै रामधन, निकट निरंजन नाथ ॥ 36 ॥
नैनहुँ बिन सूझे नहीं, भूला कतहूँ जाइ ।
दादू धन पावै नहीं, आया मूल गँवाइ ॥ 37 ॥
परिचय लै लक्षण सहज
जहाँ आत्म तहाँ राम है, सकल रह्या भरपूर ।
अंतरगति लयौ लाइ रहु, दादू सेवक सूर ॥ 38 ॥
- 74 -